भारत-नेपाल संबंधों में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और हालिया सीमा विवादों के संदर्भ में चर्चा करें।
Q. भारत-नेपाल संबंधों में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और हालिया सीमा विवादों के संदर्भ में चर्चा करें।
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भारत-नेपाल संबंध: ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासत और हालिया सीमा विवादों का विश्लेषणात्मक मूल्यांकन
भारत और नेपाल के मध्य संबंध केवल दो संप्रभु राष्ट्रों के बीच के भू-राजनीतिक संबंध नहीं हैं, बल्कि ये साझी विरासत, भूगोल और 'रोटी-बेटी' के सदियों पुराने अटूट बंधनों पर आधारित हैं। इन संबंधों का संस्थागत और वैधानिक आधार 'भारत-नेपाल शांति और मित्रता संधि, 1950' है, जो दोनों देशों के नागरिकों को एक-दूसरे के राज्यक्षेत्र में निर्बाध आवाजाही, निवास और समान आर्थिक अवसर प्रदान करती है। हाल के वर्षों में सीमांकन के मुद्दों और बदलती भू-राजनीति ने इस ऐतिहासिक संबंधों के समक्ष नई कूटनीतिक चुनौतियां प्रस्तुत की हैं।
ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक अंतर्संबंध
भारत और नेपाल के संबंध राज्य-से-राज्य (State-to-State) होने से अधिक जन-से-जन (People-to-People) संपर्कों पर आधारित हैं:
सांस्कृतिक और धार्मिक समन्वय: दोनों देश हिंदू और बौद्ध धर्म की साझी विरासत साझा करते हैं। नेपाल के लुंबिनी (बुद्ध की जन्मस्थली) से लेकर भारत के बोधगया और सारनाथ तक, तथा नेपाल के जनकपुर से लेकर भारत के अयोध्या तक फैले रामायण और बुद्ध सर्किट इस सांस्कृतिक एकात्मकता के जीवंत प्रमाण हैं।
सैन्य सहयोग और विश्वास: भारतीय सेना में 'गोरखा रेजीमेंट' की ऐतिहासिक उपस्थिति दोनों देशों के बीच अद्वितीय रणनीतिक विश्वास को दर्शाती है। भारत नेपाल के सैन्य आधुनिकीकरण और प्रशिक्षण में सबसे बड़ा भागीदार है।
आर्थिक एकीकरण: भारत, नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का सबसे बड़ा स्रोत है। नेपाल का लगभग 98% पारगमन व्यापार (Transit Trade) भारत के बंदरगाहों के माध्यम से होता है।
हालिया सीमा विवाद: उत्पत्ति और आयाम
भारत और नेपाल के बीच लगभग 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है, जिसका 98% से अधिक हिस्सा सुलझा हुआ है। हालिया विवाद मुख्य रूप से कालापानी क्षेत्र को लेकर उत्पन्न हुआ।
विवाद की पृष्ठभूमि: विवाद का मूल एंग्लो-नेपाल युद्ध के बाद हस्ताक्षरित सुगौली की संधि (1816) की अलग-अलग व्याख्याओं में निहित है। इस संधि के अनुसार, महाकाली (काली) नदी भारत और नेपाल की पश्चिमी सीमा निर्धारित करती है।
कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा विवाद: भारत काली नदी का उद्गम लिपुलेख दर्रे के ठीक नीचे स्थित झरनों को मानता है, जबकि नेपाल दावा करता है कि नदी लिम्पियाधुरा से निकलती है, जो कालापानी के पश्चिम में है।
तात्कालिक कारण: वर्ष 2020 में भारत द्वारा कैलाश मानसरोवर यात्रा को सुगम बनाने के लिए धारचूला से लिपुलेख तक 80 किलोमीटर लंबी सड़क का उद्घाटन किया गया। इसके प्रत्युत्तर में नेपाल ने एक नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया, जिसमें कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाली भू-भाग (सुदूर-पश्चिम प्रांत का हिस्सा) के रूप में दर्शाया गया।
विवाद के मूल कारण और भू-राजनीतिक चुनौतियां
इस कूटनीतिक गतिरोध के पीछे केवल भौगोलिक असहमति नहीं, बल्कि क्षेत्रीय और घरेलू कारक भी उत्तरदायी हैं:
चीन का बढ़ता सामरिक प्रभाव: नेपाल की राजनीति और अर्थव्यवस्था में चीन का बढ़ता निवेश, विशेषकर बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के माध्यम से, भारत के पारंपरिक प्रभाव को चुनौती दे रहा है।
नेपाल की आंतरिक राजनीति: नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता के दौर में, घरेलू समर्थन जुटाने के लिए 'अति-राष्ट्रवाद' (Ultra-nationalism) और 'भारत-विरोध' (Anti-India sentiment) का प्रयोग राजनीतिक दलों द्वारा एक उपकरण के रूप में किया जाता है।
1950 की संधि की प्रासंगिकता पर प्रश्न: नेपाली जनमानस के एक वर्ग का मानना है कि 1950 की संधि असमान है और यह नेपाल की संप्रभुता को सीमित करती है, जिससे अविश्वास की भावना पनपती है।
बिहार के परिप्रेक्ष्य में प्रभाव और प्रासंगिकता
भारत-नेपाल की कुल सीमा में से 726 किलोमीटर सीमा अकेले बिहार साझा करता है। इस खुली सीमा का सीधा जनसांख्यिकीय, आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभाव पटना और बिहार के सभी जिलों पर व्यापक रूप से पड़ता है:
बाढ़ प्रबंधन (Flood Management): कोसी (बिहार का शोक), गंडक और बागमती जैसी प्रमुख नदियां नेपाल से निकलकर बिहार में प्रवेश करती हैं। नेपाल के साथ किसी भी कूटनीतिक गतिरोध से जल-प्रबंधन, बैराज संचालन और पूर्व-चेतावनी प्रणालियां बाधित होती हैं, जिसका सीधा खामियाजा पटना सहित पूरे राज्य के बुनियादी ढांचे और कृषि को भुगतना पड़ता है।
व्यापार और अर्थव्यवस्था: बिहार के सीमावर्ती क्षेत्रों की स्थानीय अर्थव्यवस्था सीमा-पार व्यापार पर अत्यधिक निर्भर है। कूटनीतिक तनाव से व्यापारिक आवाजाही प्रभावित होती है, जिससे राज्य के सीमांत बाजारों में आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है।
आंतरिक सुरक्षा (Internal Security): संबंधों में शिथिलता आने से खुली सीमा का लाभ उठाकर मानव तस्करी, हथियारों की तस्करी और जाली मुद्रा के प्रसार जैसी गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियां बढ़ती हैं, जो राज्य की कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा हैं।
आगे की राह (Way Forward)
भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद का समाधान शक्ति-प्रदर्शन के बजाय कूटनीतिक संवाद से ही संभव है:
संस्थागत संवाद तंत्र की बहाली: दोनों देशों को विदेश सचिव स्तर और 'संयुक्त सीमा कार्य समूह' (Joint Boundary Working Group) की बैठकों को अविलंब सक्रिय करना चाहिए।
प्रबुद्ध व्यक्ति समूह (EPG) की रिपोर्ट: भारत और नेपाल द्वारा गठित EPG की सिफारिशों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए, ताकि 1950 की संधि को 21वीं सदी की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुरूप प्रासंगिक बनाया जा सके।
'गुजराल सिद्धांत' (Gujral Doctrine) का पालन: भारत को अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों में 'गैर-पारस्परिकता' (Non-reciprocity) के सिद्धांत को अपनाते हुए, नेपाल की आधारभूत अवसंरचना (जैसे- अरुण-3 और पंचेश्वर जलविद्युत परियोजनाएं) के विकास में उदारतापूर्वक सहयोग करना चाहिए।
भारत और नेपाल का भविष्य एक-दूसरे से गुंथा हुआ है। 'विवादों के प्रबंधन' से आगे बढ़कर 'विवादों के स्थायी समाधान' की ओर बढ़ना आवश्यक है, ताकि 'पड़ोसी प्रथम' (Neighborhood First) नीति के वास्तविक लक्ष्यों को प्राप्त कर दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।