शॉर्ट नोट्सः मुंडा विद्रोह का 'उलगुलान' स्वरूप।
Q. शॉर्ट नोट्सः मुंडा विद्रोह का 'उलगुलान' स्वरूप।
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मुंडा विद्रोह का 'उलगुलान' स्वरूप: जनजातीय अस्मिता और जल, जंगल, जमीन का महासंग्राम
भारतीय औपनिवेशिक इतिहास में 19वीं शताब्दी के अंत (1899-1900) में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुआ मुंडा विद्रोह केवल एक स्थानीय कृषक असंतोष नहीं था, बल्कि यह ब्रिटिश साम्राज्यवाद और सामंती शोषण के विरुद्ध एक सर्वांगीण 'उलगुलान' (महाविद्रोह या Great Tumult) था। तत्कालीन अखंड बिहार के छोटानागपुर पठार में उठा यह तूफान जनजातीय अस्मिता, धार्मिक शुद्धिकरण और 'जल, जंगल, जमीन' के संप्रभु अधिकारों की पुनर्बहाली का सबसे प्रखर और सुसंगठित सशस्त्र संघर्ष था।
उलगुलान का वैचारिक आधार और स्वरूप
मुंडा विद्रोह का 'उलगुलान' स्वरूप इसे पूर्ववर्ती जनजातीय विद्रोहों (जैसे कोल या संथाल विद्रोह) से अधिक व्यापक और वैचारिक रूप से परिपक्व बनाता है। इसकी प्रकृति को निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत समझा जा सकता है:
मसीहाई नेतृत्व (Messianic Leadership): बिरसा मुंडा ने स्वयं को 'धरती आबा' (जगत पिता) घोषित किया। उन्होंने इस संघर्ष को केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि ईश्वरीय आदेश (बोंगा की परिकल्पना) से प्रेरित एक पवित्र युद्ध का स्वरूप दिया, जिसने मुंडाओं में अभूतपूर्व आत्मविश्वास और निर्भयता का संचार किया।
सर्वांगीण क्रांति का स्वरूप: यह उलगुलान एक साथ तीन मोर्चों पर लड़ा जा रहा था—
आर्थिक मोर्चा: खूंटकट्टी (सामूहिक भू-स्वामित्व) व्यवस्था की पुनर्बहाली और बेठ-बेगारी (मजबूर श्रम) का अंत।
सामाजिक-धार्मिक मोर्चा: मिशनरियों के प्रभाव का विरोध और 'बिरसैत' (Birsait) संप्रदाय के माध्यम से एकेश्वरवाद, मद्यपान निषेध और आत्म-शुद्धिकरण पर बल।
राजनीतिक मोर्चा: 'दिकुओं' (बाहरी शोषकों— जमींदार, साहूकार, ठेकेदार) और ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंककर 'मुंडा राज' की स्थापना करना।
संगठनात्मक ढांचा और छापामार युद्ध: उलगुलान उग्र और हिंसक था। इसमें पारंपरिक हथियारों (तीर-धनुष, भाले) के साथ डोंबारी बुरु (Dombari Buru) की पहाड़ियों को केंद्र बनाकर छापामार (Guerrilla) रणनीति का उपयोग किया गया।
व्यापक जन-भागीदारी: इस महाविद्रोह में महिलाओं की प्रत्यक्ष और सक्रिय भागीदारी (जैसे गया मुंडा की पत्नी माकी मुंडा का संघर्ष) इसके व्यापक और समावेशी स्वरूप को प्रमाणित करती है।
उलगुलान के कारण और ब्रिटिश दमन
मुंडाओं का यह महाविद्रोह औपनिवेशिक भू-राजस्व नीतियों और प्रशासनिक घुसपैठ का प्रत्यक्ष परिणाम था:
खूंटकट्टी व्यवस्था का विनाश: सदियों पुरानी सामूहिक कृषि व्यवस्था को व्यक्तिगत संपत्ति में बदलकर जमींदारों द्वारा भारी लगान थोपा गया।
कानूनी और प्रशासनिक शोषण: ब्रिटिश न्यायालयों और पुलिस तंत्र ने मुंडाओं को न्याय देने के बजाय दिकुओं (साहूकारों) का संरक्षण किया, जिससे शांतिपूर्ण समाधान के सभी मार्ग अवरुद्ध हो गए।
अंततः ब्रिटिश सेना द्वारा आधुनिक आग्नेयास्त्रों का उपयोग कर इस विद्रोह का बर्बरतापूर्वक दमन किया गया और 9 जून 1900 को रांची जेल में बिरसा मुंडा की शहादत हुई।
ऐतिहासिक प्रभाव और बिहार के परिप्रेक्ष्य में महत्व
यद्यपि उलगुलान को सैन्य बल से कुचल दिया गया, परंतु इसके दूरगामी प्रशासनिक और विधायी परिणाम अत्यंत प्रभावशाली रहे:
छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act), 1908: ब्रिटिश सरकार को जनजातीय अधिकारों के समक्ष झुकना पड़ा। इस अधिनियम ने खूंटकट्टी अधिकारों को कानूनी मान्यता प्रदान की और जनजातीय भूमि के गैर-जनजातियों (दिकुओं) को हस्तांतरण पर कड़ी रोक लगा दी।
बेठ-बेगारी का उन्मूलन: कानूनी रूप से जबरन श्रम को प्रतिबंधित कर दिया गया।
व्यापक राजनीतिक चेतना: मुंडा उलगुलान से उत्पन्न औपनिवेशिक विरोधी चेतना केवल छोटानागपुर के जनजातीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं रही। इसके अप्रत्यक्ष प्रभाव ने कालक्रम में पटना और बिहार के सभी जिलों में उभरने वाले किसान आंदोलनों (जैसे स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में) को भी शोषक वर्ग के विरुद्ध मुखर होने की वैचारिक प्रेरणा दी।
आगे की राह
मुंडा उलगुलान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित वर्गों के प्रतिरोध का एक स्वर्णिम अध्याय है। वर्तमान लोकतांत्रिक और प्रशासनिक व्यवस्था में 'उलगुलान' के मूल संदेश की प्रासंगिकता आज भी कायम है। जनजातीय क्षेत्रों के विकास के लिए यह अनिवार्य है कि संविधान की पांचवीं अनुसूची (Fifth Schedule), पेसा अधिनियम (PESA Act, 1996) और वन अधिकार अधिनियम, 2006 का अक्षरशः पालन किया जाए। नीति-निर्माण में 'आर्थिक विकास' और 'जनजातीय सांस्कृतिक अस्मिता' के मध्य एक संवेदनशील संतुलन स्थापित करना ही 'धरती आबा' बिरसा मुंडा के उलगुलान के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।