शॉर्ट नोट्सः प्रभावती देवी का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान।
Q. शॉर्ट नोट्सः प्रभावती देवी का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान।
Ans -
प्रभावती देवी: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और महिला सशक्तिकरण की पुरोधा
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में, विशेषकर बिहार के संदर्भ में, प्रभावती देवी का नाम केवल एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में नहीं, बल्कि गांधीवादी आदर्शों के मूर्तरूप और महिला सशक्तिकरण की एक सशक्त धुरी के रूप में दर्ज है। जयप्रकाश नारायण की धर्मपत्नी होने के साथ-साथ उनका अपना एक स्वतंत्र और प्रखर राजनीतिक व्यक्तित्व था, जिसका वैचारिक निर्माण महात्मा गांधी के सान्निध्य में साबरमती आश्रम में हुआ। उन्होंने बिहार की महिलाओं को घर की चारदीवारी से निकालकर राष्ट्रवाद की मुख्यधारा से जोड़ने में एक उत्प्रेरक की भूमिका निभाई।
स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक जागरण में प्रमुख योगदान
प्रभावती देवी का योगदान केवल राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं था; यह सामाजिक सुधार, रचनात्मक कार्यों और आर्थिक स्वावलंबन का एक बहुआयामी मॉडल था:
गांधीवादी दर्शन और वैचारिक प्रशिक्षण: विवाह के उपरांत वे गांधीजी के साबरमती आश्रम चली गईं, जहां उन्होंने ब्रह्मचर्य, खादी और छुआछूत निवारण को अपने जीवन का आधार बनाया। वे कस्तूरबा गांधी और कमला नेहरू के अत्यंत निकट रहीं, जिसने उन्हें राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक रणनीतियों और महिला संगठन के कौशल से परिचित कराया।
राष्ट्रीय आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी: 1930 के दशक के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान उन्होंने महिलाओं को विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार और शराब की दुकानों पर शांतिपूर्ण धरने के लिए संगठित किया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में जब शीर्ष नेतृत्व को गिरफ्तार कर लिया गया, तब प्रभावती देवी ने जन-जागरण और रैलियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।
महिला चरखा समिति की स्थापना: महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने और सीधे स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ने के लिए उन्होंने 'महिला चरखा समिति' की स्थापना की। इस समिति ने पटना और बिहार के सभी जिलों में महिलाओं को चरखा कातने और खादी वस्त्र निर्माण के लिए प्रेरित किया। यह पहल औपनिवेशिक आर्थिक शोषण के विरुद्ध स्वदेशी आंदोलन का एक अत्यंत प्रभावी हथियार सिद्ध हुई।
सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार: उन्होंने पर्दा प्रथा और अस्पृश्यता जैसी गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ मुखर अभियान चलाया। उनका मानना था कि सामाजिक बेड़ियों में जकड़ी हुई महिलाएं कभी भी एक स्वतंत्र राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकतीं।
स्वतंत्रता उपरांत राष्ट्र निर्माण में भूमिका
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात, सत्ता और दलगत राजनीति से पूर्णतः विरक्त होकर, प्रभावती देवी ने अपना जीवन आचार्य विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण के सर्वोदय (Sarvodaya) तथा भूदान आंदोलन (Bhoodan Movement) को समर्पित कर दिया। उन्होंने भूमिहीनों के अधिकारों, कृषि सुधारों और ग्राम स्वराज्य के लिए पूरे देश में व्यापक पदयात्राएं कीं।
ऐतिहासिक मूल्यांकन और आगे की राह
प्रभावती देवी का जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि भारत की स्वतंत्रता केवल पुरुष नेतृत्व या राजनीतिक संधियों का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसमें आधी आबादी के मूक लेकिन दृढ़ त्याग की भी समान हिस्सेदारी थी। उनका संघर्ष व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से परे, राष्ट्र और समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान को समर्पित था।
आगे की राह: वर्तमान प्रशासनिक परिप्रेक्ष्य में, बिहार सरकार की 'जीविका' (Jeevika) जैसी महिला सशक्तिकरण पहलों में प्रभावती देवी के स्वावलंबन मॉडल की प्रासंगिकता आज भी जीवंत है। राज्य के नीति-निर्माण में महिलाओं के आर्थिक समावेशन और पंचायती राज संस्थाओं (73वें संविधान संशोधन) में उनकी नेतृत्व क्षमता को और अधिक सुदृढ़ करना ही उनके प्रति सच्ची ऐतिहासिक श्रद्धांजलि होगी। इसके अतिरिक्त, बिहार के शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में उनके रचनात्मक और स्वतंत्र योगदान को प्रमुखता से शामिल किया जाना चाहिए, ताकि भावी पीढ़ियां उनके प्रशासनिक कौशल और त्याग से निरंतर प्रेरणा ले सकें।