शॉर्ट नोट्सः आपदा प्रबंधन में समुदाय की भूमिका।

 Q. शॉर्ट नोट्सः आपदा प्रबंधन में समुदाय की भूमिका।

Ans - 

आपदा प्रबंधन की समकालीन प्रशासनिक और नीतिगत अवधारणा में 'समुदाय' (Community) केवल राहत का निष्क्रिय प्राप्तकर्ता (Passive Beneficiary) नहीं, बल्कि आपदा जोखिम न्यूनीकरण (Disaster Risk Reduction - DRR) का प्राथमिक हितधारक और 'प्रथम प्रतिक्रियाकर्ता' (First Responder) है। सेंडाई फ्रेमवर्क (2015-2030) और भारत की राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना (NDMP) में 'समुदाय-आधारित आपदा जोखिम प्रबंधन' (CBDRM) को केंद्रीय स्थान दिया गया है, क्योंकि किसी भी संस्थागत बल (जैसे NDRF या SDRF) के पहुँचने से पूर्व स्थानीय समुदाय ही आपदा का सीधा सामना करता है।

आपदा प्रबंधन चक्र में समुदाय की बहुआयामी भूमिका

आपदा प्रबंधन के तीनों प्रमुख चरणों (पूर्व, दौरान और पश्चात्) में समुदाय की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है:

  • आपदा पूर्व (तैयारी और जोखिम न्यूनीकरण):

    • संसाधन और सुभेद्यता मानचित्रण (Resource & Vulnerability Mapping): स्थानीय लोग अपने भौगोलिक क्षेत्र की कमजोरियों और उपलब्ध संसाधनों (जैसे- सुरक्षित ऊंचे स्थान, नाव, स्थानीय वैद्य) से भली-भांति परिचित होते हैं।

    • पूर्व-चेतावनी (Early Warning) का प्रसार: संचार के औपचारिक माध्यमों के बाधित होने पर पारंपरिक माध्यमों से अंतिम व्यक्ति तक चेतावनी पहुँचाना।

    • क्षमता निर्माण: पंचायत और ग्राम स्तर पर नियमित 'मॉक ड्रिल' के माध्यम से सामूहिक जागरूकता बढ़ाना।

  • आपदा के दौरान (त्वरित प्रतिक्रिया - Response):

    • खोज और बचाव (Search & Rescue): 'गोल्डन ऑवर' (Golden Hour) के दौरान मलबे से निकालना या बाढ़ में डूबते लोगों को बचाना स्थानीय युवाओं द्वारा ही संभव होता है।

    • प्राथमिक चिकित्सा और आश्रय प्रबंधन: घायलों को त्वरित मेडिकल सहायता प्रदान करना और अस्थायी राहत शिविरों (Relief Camps) में भोजन एवं स्वच्छता का प्रबंधन करना।

  • आपदा के पश्चात् (पुनर्वास और रिकवरी):

    • मनो-सामाजिक समर्थन (Psycho-social Support): आपदा के आघात (Trauma) से उबरने में सामुदायिक जुड़ाव और संवेदनशीलता सबसे कारगर होती है।

    • 'बिल्ड बैक बेटर' (Build Back Better): स्थानीय और पारंपरिक ज्ञान (Indigenous Knowledge) का उपयोग करते हुए आपदा-सहिष्णु आवासों (जैसे- भूकंप रोधी या बाढ़ प्रतिरोधी घर) का पुनर्निर्माण।

बिहार के विशेष संदर्भ में प्रासंगिकता और चुनौतियाँ

बिहार एक बहु-आपदा प्रवण (Multi-hazard prone) राज्य है, जहाँ उत्तर में विनाशकारी बाढ़ और दक्षिण में गंभीर सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है। इसके अतिरिक्त राज्य का एक बड़ा हिस्सा भूकंपीय ज़ोन IV और V में स्थित है।

  • सकारात्मक पहल: बिहार सरकार द्वारा 'आपदा मित्र' (Aapda Mitra) योजना और 'मुख्यमंत्री विद्यालय सुरक्षा कार्यक्रम' के माध्यम से जमीनी स्तर पर युवाओं और छात्रों का क्षमता निर्माण किया जा रहा है। बाढ़ के दौरान उत्तर बिहार में मल्लाह समुदाय की नावें और उनका स्थानीय तैराकी कौशल संस्थागत बलों की तुलना में सर्वाधिक जीवन रक्षक सिद्ध होता है।

  • विद्यमान चुनौतियाँ: वित्तीय और तकनीकी संसाधनों का भारी अभाव, आपदा के दौरान सामाजिक पदानुक्रम (जाति और लिंग आधारित भेदभाव) के कारण राहत सामग्री के वितरण में असमानता, और समुदाय में वैज्ञानिक आपदा साक्षरता (Disaster Literacy) की कमी मुख्य बाधाएं हैं।

आगे की राह

आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के उद्देश्यों को तब तक पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं किया जा सकता, जब तक कि विकेंद्रीकृत प्रणाली को सशक्त न किया जाए।

आपदा जोखिम न्यूनीकरण की इस संस्थागत प्रक्रिया को पूर्णतः प्रभावी बनाने के लिए यह नितांत आवश्यक है कि समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन मॉडल, स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण और संसाधन मानचित्रण को केवल कुछ सर्वाधिक संवेदनशील क्षेत्रों (जैसे उत्तर बिहार के बाढ़ ग्रस्त इलाके) तक सीमित न रखा जाए। एक सुदृढ़ और आपदा-सहिष्णु (Disaster-Resilient) इकोसिस्टम के निर्माण हेतु इस विकेंद्रीकृत ढांचे का विस्तार पटना और सभी बिहार के जिलों में समान रूप से किया जाना चाहिए। त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) और स्थानीय स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को 'आपदा प्रतिक्रिया कोष' के उपयोग में वित्तीय स्वायत्तता प्रदान कर एक सुरक्षित और आत्मनिर्भर समाज का निर्माण किया जा सकता है।

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