शॉर्ट नोट्स: जैविक खेती (Organic Farming)।
Q. शॉर्ट नोट्स: जैविक खेती (Organic Farming)।
Ans -
जैविक खेती (Organic Farming) एक कृषि-पारिस्थितिक (Agro-ecological) दृष्टिकोण है, जिसमें रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और आनुवंशिक रूप से संशोधित बीजों (GMOs) के प्रयोग को पूर्णतः त्यागकर प्राकृतिक संसाधनों (गोबर की खाद, केंचुआ खाद, फसल चक्र, जैविक कीट नियंत्रण) का उपयोग किया जाता है। हरित क्रांति के दीर्घकालिक दुष्परिणामों—जैसे मृदा क्षरण, भूजल प्रदूषण और जैव-विविधता के ह्रास—के समाधान के रूप में यह सतत कृषि (Sustainable Agriculture) का एक अनिवार्य अंग बन गई है।
जैविक खेती की आवश्यकता और बहुआयामी लाभ
मृदा स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी: रासायनिक खादों के अति-उपयोग से मिट्टी में जैविक कार्बन (Organic Carbon) और सूक्ष्मजीवों (Microbes) की कमी हो रही है। जैविक कृषि मृदा की प्राकृतिक उर्वरता को पुनर्जीवित करती है और जल धारण क्षमता को बढ़ाती है।
लागत न्यूनीकरण और आर्थिक स्थिरता: कृत्रिम उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता समाप्त होने से कृषि की इनपुट लागत (Input Cost) घटती है, जो ऋण के बोझ तले दबे छोटे और सीमांत किसानों के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी है।
मानव स्वास्थ्य और पोषण: यह खाद्य शृंखला में रसायनों के जैव-आवर्धन (Biomagnification) को रोककर विष-मुक्त, सुरक्षित और उच्च पोषण युक्त खाद्यान्न सुनिश्चित करती है।
प्रीमियम मूल्य प्राप्ति: अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू बाजारों में जैविक उत्पादों की भारी मांग है, जिससे किसानों को उनके उत्पादों का प्रीमियम मूल्य प्राप्त होता है।
जैविक कृषि के समक्ष विद्यमान चुनौतियाँ
संक्रमणकालीन उत्पादन में गिरावट: पारंपरिक रासायनिक कृषि से जैविक कृषि में बदलने के शुरुआती 2-3 वर्षों (Transition Period) में फसल की उपज में भारी गिरावट आती है, जिससे किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा प्रभावित होती है।
प्रमाणन की जटिलता: किसानों के लिए 'पार्टिसिपेटरी गारंटी सिस्टम' (PGS) और अन्य जैविक प्रमाणन (Organic Certification) प्राप्त करना एक महंगी, तकनीकी और समय लेने वाली प्रक्रिया है।
विपणन और आपूर्ति श्रृंखला: जैविक उत्पादों के लिए समर्पित कोल्ड चेन (Cold Chain), भंडारण और विशिष्ट बाजारों (Niche Markets) का ढांचागत अभाव है।
बिहार के परिप्रेक्ष्य में जैविक खेती: नीतियां और संभावनाएं
बिहार जैसे सघन कृषि वाले राज्य में जहाँ प्रति व्यक्ति कृषि भूमि अत्यंत कम है, जैविक खेती किसानों की आय दोगुनी करने का एक सशक्त माध्यम है।
जैविक कॉरिडोर (Organic Corridor): गंगा नदी की अविरलता और स्वच्छता बनाए रखने तथा किसानों को जैविक खेती से जोड़ने के लिए राज्य सरकार ने 'नमामि गंगे' परियोजना और कृषि विभाग के तहत गंगा किनारे के जिलों में 'जैविक कॉरिडोर' विकसित किया है।
चतुर्थ कृषि रोडमैप (2023-28): राज्य के नवीनतम कृषि रोडमैप में जलवायु अनुकूल कृषि (CRA) के साथ-साथ जैविक खेती को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इसके तहत केंचुआ खाद (Vermicompost) इकाइयों की स्थापना पर भारी अनुदान दिया जा रहा है।
समग्र विस्तार की आवश्यकता: जैविक उत्पादों के प्रमाणन, ब्रांडिंग (जैसे- 'बिहार जैविक ब्रांड') और विपणन की ढांचागत सुविधाओं को केवल गंगा के तटीय या कुछ विशिष्ट जिलों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। राज्य की कृषि-अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि जैविक खेती का संस्थागत बुनियादी ढांचा और आपूर्ति श्रृंखला का विस्तार पटना और सभी बिहार के जिलों में समान एवं विकेंद्रीकृत रूप से किया जाए।
आगे की राह
जैविक खेती केवल एक कृषि तकनीक नहीं, बल्कि पर्यावरण, मानव स्वास्थ्य और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुरक्षित करने का एक समग्र दर्शन है। इस संक्रमण को सफल बनाने के लिए यह आवश्यक है कि शुरुआती वर्षों में उपज में होने वाली कमी की भरपाई के लिए सरकार 'प्रत्यक्ष नकद अंतरण' (DBT) के माध्यम से कृषकों को वित्तीय सहायता प्रदान करे।
किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) और सहकारी समितियों को सुदृढ़ कर बिचौलियों की भूमिका को समाप्त किया जा सकता है। सतत विकास लक्ष्यों (SDG-2: शून्य भुखमरी और SDG-12: सतत उपभोग और उत्पादन) के अनुरूप, कृषि अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निवेश बढ़ाकर भारत और बिहार को वैश्विक जैविक बाजार में एक अग्रणी शक्ति के रूप में स्थापित किया जा सकता है।