भारत में गरीबी और बेरोजगारी को मापने के तरीके क्या हैं? बिहार में बेरोजगारी दूर करने के उपाय सुझाएं।

 Q. भारत में गरीबी और बेरोजगारी को मापने के तरीके क्या हैं? बिहार में बेरोजगारी दूर करने के उपाय सुझाएं।

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भूमिका

गरीबी और बेरोजगारी किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए सर्वाधिक जटिल संरचनात्मक चुनौतियां हैं। जहां गरीबी मानव पूंजी के विकास को बाधित करती है, वहीं बेरोजगारी उपलब्ध मानव संसाधनों के इष्टतम उपयोग को रोककर जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) को जनसांख्यिकीय बोझ में बदल सकती है।

भारत में गरीबी और बेरोजगारी का मापन केवल सांख्यिकीय अभ्यास नहीं है, बल्कि यह संसाधनों के लक्षित वितरण (Targeted PDS, DBT) और नीति-निर्माण का मूलाधार है। हालिया नीति आयोग की 'राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक' (National MPI) रिपोर्ट और राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के 'आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण' (PLFS) ने इन दोनों मापदंडों के आकलन में नवीन और बहुआयामी दृष्टिकोण प्रस्तुत किए हैं।

भारत में गरीबी मापने के तरीके (Methods of Measuring Poverty)

ऐतिहासिक रूप से भारत में गरीबी का मापन 'निरपेक्ष गरीबी' (Absolute Poverty) के आधार पर किया जाता रहा है। वर्तमान में इसे मुख्यतः दो दृष्टिकोणों से मापा जाता है:

1. उपभोग व्यय आधारित मापन (Consumption Expenditure Approach)

भारत में आय के स्थान पर मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय (MPCE) को गरीबी मापने का आधार माना गया है, क्योंकि आय की तुलना में उपभोग का डेटा अधिक स्थिर और यथार्थवादी होता है।

  • तेंदुलकर समिति (2009): इस समिति ने कैलोरी आधारित पुरानी प्रणाली को त्यागकर शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और खाद्य व्यय को शामिल करते हुए एक नई गरीबी रेखा टोकरी (Poverty Line Basket - PLB) का निर्माण किया।

  • रंगराजन समिति (2014): इसने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए अलग-अलग पोषण संबंधी आवश्यकताओं (क्रमशः 2155 और 2090 कैलोरी/दिन) और गैर-खाद्य व्यय को आधार बनाकर गरीबी रेखा को पुनः परिभाषित किया।

2. बहुआयामी दृष्टिकोण (Multidimensional Approach)

  • नीति आयोग का राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक (National MPI): यह अल्कैर-फोस्टर (Alkire-Foster) पद्धति पर आधारित है। यह केवल आर्थिक अभाव को नहीं, बल्कि जीवन स्तर के समग्र अभाव को मापता है।

  • इसके तीन समान आयाम हैं: स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर, जिन्हें पोषण, बाल मृत्यु दर, स्कूली शिक्षा के वर्ष, पेयजल, स्वच्छता, बैंक खाते आदि जैसे 12 संकेतकों के माध्यम से मापा जाता है।

भारत में बेरोजगारी मापने के तरीके (Methods of Measuring Unemployment)

भारत में रोजगार और बेरोजगारी के आंकड़ों का प्राथमिक स्रोत सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के अधीन कार्य करने वाले NSO द्वारा जारी आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) है। NSO बेरोजगारी को मुख्य रूप से तीन स्थितियों (Statuses) के आधार पर मापता है:

1. सामान्य स्थिति (Usual Status - US)

  • इसमें संदर्भ अवधि सर्वेक्षण की तारीख से पूर्व के 365 दिन होती है।

  • यदि कोई व्यक्ति वर्ष के अधिकांश हिस्से (Major time criterion) में बेरोजगार रहा है और काम की तलाश में था, तो उसे 'सामान्य स्थिति' के तहत बेरोजगार माना जाता है। यह दीर्घकालिक (Chronic) बेरोजगारी को दर्शाता है।

2. वर्तमान साप्ताहिक स्थिति (Current Weekly Status - CWS)

  • इसमें संदर्भ अवधि सर्वेक्षण से ठीक पहले के 7 दिन होती है।

  • यदि किसी व्यक्ति को सप्ताह के किसी भी दिन 1 घंटे का भी लाभकारी कार्य नहीं मिला और वह काम के लिए उपलब्ध था, तो उसे CWS के तहत बेरोजगार माना जाता है।

3. वर्तमान दैनिक स्थिति (Current Daily Status - CDS)

  • यह रोजगार के अल्प-रोजगार (Underemployment) की सबसे सूक्ष्म तस्वीर प्रस्तुत करता है, जहां संदर्भ सप्ताह के प्रत्येक दिन की गतिविधि का रिकॉर्ड रखा जाता है। (यद्यपि PLFS रिपोर्टिंग में अब US और CWS को अधिक प्रमुखता दी जाती है)।

बिहार में बेरोजगारी दूर करने के रणनीतिक उपाय

बिहार आर्थिक सर्वेक्षण (2023-24) के अनुसार राज्य में कार्यबल की एक बड़ी आबादी युवा है। इस विशाल युवा शक्ति का नियोजन केवल पारम्परिक सरकारी नौकरियों से संभव नहीं है। इसके लिए एक विकेंद्रीकृत और बहुआयामी आर्थिक रणनीति की आवश्यकता है:

1. औद्योगिक विकेंद्रीकरण एवं सूक्ष्म-लघु उद्योग (MSMEs)

  • रोजगार सृजन को केवल राजधानी तक सीमित न रखकर, पटना और बिहार के सभी जिलों में एमएसएमई क्लस्टर विकसित किए जाने चाहिए।

  • कृषि-आधारित उद्योग (Agro-based Industries): चूंकि राज्य की अधिकांश आबादी कृषि पर निर्भर है, इसलिए पटना और बिहार के सभी जिलों के स्थानीय उत्पादों (जैसे- मखाना, शाही लीची, मक्का) के प्रसंस्करण हेतु मेगा फूड पार्क और कोल्ड चेन नेटवर्क स्थापित किए जाएं।

2. कौशल विकास और तकनीकी शिक्षा का आधुनिकीकरण

  • राज्य सरकार के 'सात निश्चय-2' के तहत 'युवा शक्ति-बिहार की प्रगति' कार्यक्रम को अधिक प्रासंगिक बनाया जाए।

  • 'कुशल युवा कार्यक्रम' (KYP) के पाठ्यक्रम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ड्रोन तकनीक, डेटा एंट्री और एग्री-टेक (Agri-tech) जैसे 21वीं सदी के कौशल को शामिल किया जाए, ताकि युवाओं को वैश्विक बाजार के अनुरूप तैयार किया जा सके।

3. सेवा क्षेत्र एवं आईटी कॉरिडोर (Service Sector & IT)

  • सेवा क्षेत्र में रोजगार की असीम संभावनाएं हैं। राज्य सरकार की बिहार आईटी नीति (IT Policy 2024) के प्रभावी क्रियान्वयन के माध्यम से बीपीओ (BPO), कॉल सेंटर और सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क्स का विस्तार राज्य के अन्य प्रमुख नगरों में किया जाना चाहिए।

4. पर्यटन क्षेत्र का विस्तार (Tourism Infrastructure)

  • बिहार ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। बोधगया, राजगीर, वैशाली और वाल्मीकि नगर के अलावा इको-टूरिज्म और 'रूरल टूरिज्म' सर्किट्स का विकास किया जाए। गाइड, हॉस्पिटैलिटी और परिवहन सेवाओं के माध्यम से बड़े पैमाने पर स्थानीय रोजगार का सृजन संभव है।

5. उद्यमिता और स्टार्टअप इकोसिस्टम (Entrepreneurship)

  • 'बिहार स्टार्टअप नीति' और 'मुख्यमंत्री उद्यमी योजना' के तहत ऋण वितरण को अधिक पारदर्शी और त्वरित बनाया जाए। प्लग-एंड-प्ले (Plug and Play) इन्फ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से युवा उद्यमियों को बिना भूमि विवाद के अपना व्यवसाय शुरू करने की सुविधा प्रदान की जाए।

निष्कर्ष

गरीबी और बेरोजगारी केवल आर्थिक आँकड़े नहीं हैं, बल्कि यह मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय से जुड़े विषय हैं। नीति आयोग का बहुआयामी गरीबी सूचकांक इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ सामाजिक अवसंरचना में निवेश अनिवार्य है।

आगे की राह (Way Forward): बिहार को अपनी जनसांख्यिकीय लाभांश का लाभ उठाने के लिए 'रोजगार मांगने वाले' (Job Seekers) युवाओं को 'रोजगार प्रदाता' (Job Creators) में बदलना होगा। यदि अवसंरचना विकास, पारदर्शी निवेश नीतियों और कृषि-प्रसंस्करण का एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र पटना सहित बिहार के सभी जिलों में समान रूप से लागू किया जाए, तो राज्य बेरोजगारी की चुनौती को परास्त कर 'विकसित बिहार' के संकल्प को साकार कर सकता है।

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