'जनसांख्यिकीय लाभांश' (Demographic Dividend) से आप क्या समझते हैं? बिहार इसे आर्थिक विकास में कैसे बदल सकता है?

 Q.  'जनसांख्यिकीय लाभांश' (Demographic Dividend) से आप क्या समझते हैं? बिहार इसे आर्थिक विकास में कैसे बदल सकता है?

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भूमिका

किसी भी राष्ट्र या राज्य के आर्थिक इतिहास में एक ऐसा कालखंड आता है, जब उसकी जनसांख्यिकीय संरचना (Demographic Structure) उसके तीव्र आर्थिक विकास का उत्प्रेरक बन जाती है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) के अनुसार, "जनसांख्यिकीय लाभांश वह आर्थिक विकास क्षमता है जो जनसंख्या की आयु संरचना में बदलाव के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती है, विशेष रूप से तब जब कार्यशील आयु वाली आबादी (15 से 64 वर्ष) का हिस्सा गैर-कार्यशील आयु (आश्रित) आबादी से बड़ा हो जाता है।"

वर्तमान में भारत अपने जनसांख्यिकीय लाभांश के स्वर्ण काल से गुजर रहा है, परंतु बिहार इस संक्रमण में एक अत्यंत विशिष्ट और निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। बिहार आर्थिक सर्वेक्षण (2023-24) और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के आंकड़ों के आलोक में, जहां दक्षिणी राज्यों में यह 'विंडो ऑफ ऑपर्चुनिटी' (Window of Opportunity) बंद होने के करीब है, वहीं बिहार में घटती कुल प्रजनन दर (TFR - 2.98) के कारण कार्यशील जनसंख्या का यह उभार अगले कुछ दशकों (2050 के दशक तक) तक बना रहेगा।

'जनसांख्यिकीय लाभांश' का अर्थ एवं गतिकी

जनसांख्यिकीय लाभांश केवल जनसंख्या वृद्धि नहीं है, बल्कि यह आयु-संरचना में होने वाला एक गुणात्मक और संरचनात्मक बदलाव है:

  • आश्रित अनुपात (Dependency Ratio) में गिरावट: जब जन्म दर में कमी आती है, तो 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों (आश्रितों) का अनुपात कम हो जाता है।

  • कार्यशील जनसंख्या (Working-Age Population) में वृद्धि: अर्थव्यवस्था में आश्रितों की तुलना में उत्पादक हाथों (15-59 या 15-64 वर्ष) की संख्या बढ़ जाती है।

  • बचत और निवेश में वृद्धि: कम आश्रितों के कारण परिवारों और राज्य की बचत (Savings) बढ़ती है, जिसे भौतिक और मानव पूंजी (Human Capital) के निर्माण में निवेश किया जा सकता है।

बिहार इसे आर्थिक विकास में कैसे बदल सकता है? (रणनीतिक रूपरेखा)

बिहार की लगभग 53% से अधिक आबादी 25 वर्ष से कम आयु की है। इस विशाल युवा शक्ति को आर्थिक वृद्धि के इंजन में बदलने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है:

1. मानव पूंजी निर्माण: शिक्षा और कौशल विकास (Education & Skilling)

जनसांख्यिकीय लाभांश स्वतः प्राप्त नहीं होता; अशिक्षित और अकुशल युवा आबादी 'लाभांश' के बजाय 'जनसांख्यिकीय आपदा' (Demographic Disaster) बन सकती है।

  • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुरूप राज्य में प्राथमिक और उच्च शिक्षा को रटंत विद्या (Rote Learning) से निकालकर विश्लेषणात्मक बनाना होगा।

  • बाजार-उन्मुख कौशल: राज्य सरकार के 'सात निश्चय-2' के अंतर्गत 'युवा शक्ति-बिहार की प्रगति' विजन को और धारदार बनाना होगा। 'कुशल युवा कार्यक्रम' (KYP) के पाठ्यक्रम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), कोडिंग, एग्री-टेक और प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग जैसे भविष्योन्मुखी (Futuristic) कौशल जोड़े जाने चाहिए।

2. औद्योगिक विकेंद्रीकरण एवं रोजगार सृजन (Job Creation)

विशाल कार्यबल को केवल कृषि क्षेत्र में खपाया नहीं जा सकता, क्योंकि वहाँ पहले ही प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment) व्याप्त है।

  • कृषि-प्रसंस्करण (Agro-Processing): बिहार के प्रचुर कृषि संसाधनों (मखाना, मक्का, लीची) का औद्योगिकीकरण कर ग्रामीण स्तर पर एमएसएमई (MSME) क्लस्टर विकसित किए जाएं।

  • गिग इकोनॉमी एवं आईटी क्षेत्र: बिहार आईटी नीति 2024 का लाभ उठाते हुए बीपीओ, डेटा सेंटर्स और सॉफ्टवेयर पार्क्स का विस्तार किया जाए, ताकि राज्य से होने वाले प्रतिभा पलायन (Brain Drain) को रोका जा सके।

3. स्वास्थ्य एवं पोषण अवसंरचना (Health & Nutrition)

एक अस्वस्थ कार्यबल कभी भी इष्टतम उत्पादकता नहीं दे सकता।

  • पोषण सुरक्षा: NFHS-5 के अनुसार बिहार में बच्चों के स्टंटिंग (Stunting) और महिलाओं में एनीमिया की दर चिंताजनक है। इसका सीधा प्रभाव उनके संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development) पर पड़ता है। 'पोषण अभियान' और 'समेकित बाल विकास सेवाओं' (ICDS) को तकनीकी निगरानी (Real-time monitoring) के साथ सुदृढ़ करना अनिवार्य है।

  • सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय: स्वास्थ्य अवसंरचना पर राज्य के बजट आवंटन को उत्तरोत्तर बढ़ाकर प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs/CHCs) को आधुनिक बनाना होगा।

4. महिला श्रम बल भागीदारी (Female Labor Force Participation)

कोई भी अर्थव्यवस्था अपनी आधी आबादी को घर में रखकर जनसांख्यिकीय लाभांश प्राप्त नहीं कर सकती।

  • महिला उद्यमिता: 'मुख्यमंत्री महिला उद्यमी योजना' जैसी पहलों का विस्तार कर महिलाओं को सूक्ष्म और लघु उद्योगों से जोड़ना।

  • 'जीविका' (JEEViKA) का उन्नयन: जीविका दीदियों के स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को केवल ऋण वितरण तक सीमित न रखकर, उन्हें आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स से जोड़कर उनके उत्पादों को वैश्विक बाजार उपलब्ध कराना।

आगे की राह (Way Forward)

इस जनसांख्यिकीय अवसर (Demographic Opportunity) का लाभ उठाने का समय बहुत सीमित है। बिहार को निम्नलिखित रणनीतिक कदम उठाने चाहिए:

  • डेटा संचालित नीति-निर्माण: नीति आयोग के तर्ज पर राज्य स्तरीय 'थिंक टैंक' का निर्माण हो, जो रोजगार और कौशल की वास्तविक समय (Real-time) मांग-आपूर्ति का मैपिंग कर सके।

  • निवेश का अनुकूलन (Ease of Doing Business): राज्य में कानून-व्यवस्था की सुदृढ़ता के साथ-साथ 'सिंगल विंडो क्लीयरेंस' प्रणाली को पूरी तरह से डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाए ताकि निजी निवेश (FDI और घरेलू) आकर्षित हो सके।

  • रिवर्स माइग्रेशन का प्रबंधन: प्रवासी श्रमिकों के कौशल की मैपिंग कर उन्हें राज्य के भीतर ही औद्योगिक पार्कों में नियोजित करने का संस्थागत ढांचा विकसित किया जाए।

निष्कर्ष

जनसांख्यिकीय लाभांश कोई शाश्वत स्थिति नहीं है, बल्कि यह एक सीमित 'समय की खिड़की' है। यदि बिहार इस जनसांख्यिकीय उभार के साथ उचित कौशल, स्वास्थ्य और पूंजी निवेश का तालमेल बैठाने में सफल रहता है, तो यह न केवल राज्य से गरीबी और पिछड़ेपन के दुष्चक्र को समाप्त करेगा, बल्कि बिहार को पूर्वी भारत के आर्थिक विकास का 'ग्रोथ इंजन' (Growth Engine) भी बना देगा। यह जनसांख्यिकीय शक्ति ही अंततः 'विकसित बिहार' के माध्यम से 'विकसित भारत @ 2047' के लक्ष्य की सबसे बड़ी संवाहक सिद्ध होगी।

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