सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) की भारतीय अर्थव्यवस्था में भूमिका और उनके सामने आने वाली चुनौतियों की चर्चा करें।
Q. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) की भारतीय अर्थव्यवस्था में भूमिका और उनके सामने आने वाली चुनौतियों की चर्चा करें।
Ans -
भूमिका
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ और इसके सामाजिक-आर्थिक विकास के 'ग्रोथ इंजन' (Growth Engine) माने जाते हैं। MSME विकास अधिनियम, 2006 (वर्ष 2020 में निवेश और टर्नओवर के आधार पर संशोधित) के तहत वर्गीकृत यह क्षेत्र, कृषि के बाद रोजगार सृजन का देश का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है।
आंकड़ों के अनुसार, MSME क्षेत्र देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 30%, विनिर्माण उत्पादन में 45% और कुल निर्यात में 40% से अधिक का योगदान देता है। देश में कार्यशील लगभग 6.3 करोड़ MSME इकाइयां भारत की आर्थिक सुदृढ़ता और आत्मनिर्भरता का मुख्य आधार हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था में MSME की बहुआयामी भूमिका
भारतीय अर्थव्यवस्था के संरचनात्मक विकास में इस क्षेत्र का योगदान अत्यंत व्यापक है:
विशाल रोजगार सृजन (Employment Generation): यह क्षेत्र 11 करोड़ से अधिक लोगों को आजीविका प्रदान करता है। बड़े और भारी उद्योगों की तुलना में यहाँ प्रति इकाई पूंजी निवेश पर रोजगार सृजन की दर कहीं अधिक (Capital-efficient) है।
समावेशी विकास (Inclusive Growth): MSME क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 51%) ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में स्थित है। यह धन के विकेंद्रीकरण, महिला सशक्तिकरण और क्षेत्रीय असंतुलन (Regional Imbalance) को कम करने में अत्यंत प्रभावी है।
औद्योगिक मूल्य श्रृंखला का आधार (Ancillary Units): ये उद्यम बड़े कॉर्पोरेट और सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) के लिए सहायक इकाइयों के रूप में कार्य करते हैं तथा उन्हें कच्चे माल और मध्यवर्ती उत्पाद (Intermediate goods) की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं।
निर्यात प्रोत्साहन एवं विदेशी मुद्रा अर्जन: देश के कुल निर्यात में लगभग आधी हिस्सेदारी MSME की है। रत्न एवं आभूषण, चमड़ा उत्पाद, खेल के सामान और परिधान जैसे निर्यातोन्मुखी क्षेत्रों में इनका प्रभुत्व है।
नवाचार एवं स्थानीय कौशल को प्रोत्साहन: यह 'मेक इन इंडिया' के विजन को धरातल पर उतारते हुए स्थानीय कारीगरों, पारंपरिक कलाओं (जैसे- खादी, हस्तशिल्प) और नवीन एग्री-स्टार्टअप्स को वैश्विक बाजार तक पहुँचाता है।
बिहार के विशेष संदर्भ में MSME का रणनीतिक महत्व
खनिज संसाधनों के अभाव और उच्च जनसंख्या घनत्व वाले बिहार में बड़े पैमाने पर भारी उद्योगों की गुंजाइश सीमित है। ऐसे में पटना और बिहार के सभी जिलों में कृषि-प्रसंस्करण (Agro-processing), हथकरघा, चमड़ा और खाद्य प्रसंस्करण (मखाना, मक्का) आधारित MSME क्लस्टर्स की स्थापना ही राज्य के आर्थिक कायाकल्प का सबसे व्यावहारिक विकल्प है। यह राज्य की विशाल युवा आबादी (जनसांख्यिकीय लाभांश) को स्थानीय स्तर पर रोजगार देकर प्रतिभा एवं श्रम के पलायन (Migration) को रोकने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
MSME क्षेत्र के समक्ष विद्यमान प्रमुख चुनौतियाँ
अत्यधिक संभावनाओं के बावजूद यह क्षेत्र कई संरचनात्मक और संस्थागत बाधाओं का सामना कर रहा है:
संस्थागत साख और वित्त का अभाव (Credit Gap): यू.के. सिन्हा समिति (RBI) की रिपोर्ट के अनुसार, MSME क्षेत्र में 20 से 25 लाख करोड़ रुपये का एक विशाल 'क्रेडिट गैप' विद्यमान है। पर्याप्त संपार्श्विक (Collateral) की कमी और कठोर बैंकिंग नियमों के कारण अधिकांश सूक्ष्म उद्यम आज भी अनौपचारिक ऋणदाताओं (साहूकारों) के उच्च ब्याज जाल पर निर्भर हैं।
तकनीकी पिछड़ापन (Technological Obsolescence): पूंजीगत सीमाओं के कारण ये उद्यम अनुसंधान एवं विकास (R&D) और स्वचालन (Automation) में निवेश नहीं कर पाते, जिससे वैश्विक बाजार (विशेषकर चीन और आसियान देशों) की तुलना में उनकी उत्पादन लागत अधिक और प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो जाती है।
अवसंरचनात्मक बाधाएं (Infrastructural Bottlenecks): निर्बाध विद्युत आपूर्ति की कमी, वेयरहाउसिंग का अभाव और उच्च लॉजिस्टिक्स लागत इन उद्यमों के लाभ मार्जिन को अत्यंत सीमित कर देती है।
विपणन और आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियाँ (Marketing Challenges): ई-कॉमर्स और डिजिटल अर्थव्यवस्था के वर्तमान दौर में भी अधिकांश छोटे उद्यमियों की डिजिटल साक्षरता और बाजार बुद्धिमत्ता (Market Intelligence) तक पहुँच अत्यंत सीमित है।
विनियामक अनुपालन (Regulatory Hurdles): पर्यावरण क्लीयरेंस, जटिल श्रम कानून और कराधान (GST) की फाइलिंग प्रक्रियाएं छोटे उद्यमियों के लिए एक बड़ा प्रशासनिक और अनुपालन बोझ (Compliance Burden) उत्पन्न करती हैं।
आगे की राह (Way Forward) एवं निष्कर्ष
MSME क्षेत्र को सुदृढ़ करने हेतु सरकार ने 'उद्यम पोर्टल' (Udyam Portal) के माध्यम से पंजीकरण को सरल बनाने, 'ट्रेड्स' (TReDS) प्लेटफॉर्म के जरिए तरलता सुनिश्चित करने और 'पीएम विश्वकर्मा योजना' जैसी सकारात्मक पहलें की हैं।
इन सुधारों को अधिक प्रभावी बनाने हेतु कुछ रणनीतिक कदम उठाए जाने चाहिए:
वित्तपोषण में नवाचार: क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट (CGTMSE) के दायरे को बढ़ाकर फिनटेक (FinTech) कंपनियों के माध्यम से नकद-प्रवाह आधारित (Cash-flow based) ऋण प्रणाली को प्रोत्साहित किया जाए।
समग्र क्लस्टर विकास: 'प्लग-एंड-प्ले' (Plug and Play) इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित किए जाएं, ताकि उद्यमी भूमि अधिग्रहण के विवादों में फंसे बिना उत्पादन शुरू कर सकें।
स्थानीय एकीकरण: पटना और बिहार के सभी जिलों में 'एक जिला, एक उत्पाद' (ODOP) और 'मुख्यमंत्री उद्यमी योजना' के प्रभावी अभिसरण (Convergence) से सूक्ष्म उद्यमों को निर्यात-सक्षम बनाया जाए।
यदि MSME क्षेत्र की क्षमता का पूर्ण दोहन कर उसे वैश्विक मूल्य श्रृंखला (Global Value Chain) के साथ निर्बाध रूप से जोड़ दिया जाए, तो यह न केवल भारत की $5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का आधारस्तंभ बनेगा, बल्कि 2047 तक 'विकसित भारत' के लक्ष्य की प्राप्ति का मुख्य वाहक भी सिद्ध होगा।