विशेष राज्य का दर्जा (Special Category Status) क्या है? बिहार के लिए इस मांग के पीछे के तर्कों और इसके प्रभावों का विश्लेषण करें।

 Q. विशेष राज्य का दर्जा (Special Category Status) क्या है? बिहार के लिए इस मांग के पीछे के तर्कों और इसके प्रभावों का विश्लेषण करें।

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भूमिका

भारत के संघीय ढांचे में क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करना और संतुलित विकास सुनिश्चित करना राज्य और केंद्र दोनों का संवैधानिक दायित्व है। यद्यपि भारतीय संविधान में 'विशेष राज्य के दर्जे' (Special Category Status - SCS) का कोई प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है, किंतु संविधान के अनुच्छेद 275 (केंद्र द्वारा राज्यों को अनुदान) के अंतर्गत इस अवधारणा को मान्यता प्राप्त है।

इस व्यवस्था की शुरुआत वर्ष 1969 में 5वें वित्त आयोग की सिफारिशों और 'गाडगिल फॉर्मूला' के आधार पर की गई थी, जिसका उद्देश्य ऐतिहासिक और भौगोलिक रूप से पिछड़े राज्यों को मुख्यधारा के विकास में लाना था। वर्ष 2000 के राज्य पुनर्गठन के बाद से ही बिहार अपने गंभीर आर्थिक और अवसंरचनात्मक पिछड़ेपन के आधार पर इस दर्जे की निरंतर मांग कर रहा है।

विशेष राज्य का दर्जा (Special Category Status) क्या है?

विशेष राज्य का दर्जा केंद्र सरकार द्वारा उन राज्यों को दिया जाता है, जो भौगोलिक और सामाजिक-आर्थिक रूप से अत्यधिक प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC) ने इसके लिए निम्नलिखित मापदंड निर्धारित किए हैं:

  • पहाड़ी और दुर्गम भूभाग (Hilly and difficult terrain)।

  • सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण सीमावर्ती स्थिति (Strategic location along borders)।

  • कम जनसंख्या घनत्व या जनजातीय आबादी का बड़ा हिस्सा।

  • आर्थिक और अवसंरचनात्मक पिछड़ापन (Economic and infrastructural backwardness)।

  • राज्य वित्त की अव्यवहार्य प्रकृति (Non-viable nature of state finances)।

SCS के प्रमुख लाभ: इस दर्जे के तहत केंद्र प्रायोजित योजनाओं (Centrally Sponsored Schemes - CSS) में केंद्र और राज्य के वित्तपोषण का अनुपात 90:10 होता है, जबकि सामान्य राज्यों के लिए यह 60:40 या 70:30 होता है। इसके अतिरिक्त, राज्य में निजी निवेश आकर्षित करने के लिए उत्पाद शुल्क, कॉर्पोरेट टैक्स और सीमा शुल्क में विशेष छूट (Tax Holidays) का प्रावधान होता है।

बिहार के लिए इस मांग के पीछे के तर्क

यद्यपि बिहार NDC के सभी मानदंडों (जैसे पहाड़ी भूभाग या कम जनसंख्या घनत्व) को पूरा नहीं करता, फिर भी राज्य की विशिष्ट संरचनात्मक चुनौतियां इस मांग को अत्यंत तार्किक बनाती हैं:

1. ऐतिहासिक और नीतिगत वंचना (Historical Deprivation)

  • माल भाड़ा समानीकरण नीति (Freight Equalization Policy, 1952-1993): इस नीति ने बिहार के प्राकृतिक संसाधनों को अन्य राज्यों के लिए सस्ता कर दिया, जिससे राज्य स्थानीय औद्योगिकीकरण के प्रतिस्पर्धात्मक लाभ से वंचित रह गया।

  • वर्ष 2000 का विभाजन: राज्य के विभाजन के उपरांत अधिकांश खनिज संपदा और भारी उद्योग झारखंड में चले गए, जिससे बिहार मुख्यतः एक 'खनिज-विहीन और सीमित राजस्व वाला' कृषि प्रधान राज्य बन गया।

2. भौगोलिक एवं प्राकृतिक आपदाएं

  • राज्य का भूगोल इसकी अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डालता है। उत्तरी बिहार में नेपाल से आने वाली नदियों के कारण प्रतिवर्ष विनाशकारी बाढ़ आती है, जबकि दक्षिणी बिहार बार-बार सूखे की चपेट में रहता है। इससे न केवल कृषि नष्ट होती है, बल्कि प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये की आधारभूत संरचना को भी क्षति पहुँचती है।

3. आर्थिक और जनसांख्यिकीय दबाव

  • बिहार आर्थिक सर्वेक्षण (2023-24) के अनुसार, राज्य की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत की लगभग एक-तिहाई है।

  • देश में सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व (1,106 व्यक्ति/वर्ग किमी) के कारण राज्य के संसाधनों और भूमि पर अत्यधिक दबाव है। रघुराम राजन समिति (2013) ने भी अपने 'बहुआयामी सूचकांक' में बिहार को 'सबसे पिछड़े' (Least Developed) राज्यों की श्रेणी में रखा था।

विशेष राज्य का दर्जा मिलने के संभावित प्रभाव (Impacts)

यदि बिहार को SCS या इसके समतुल्य कोई विशेष पैकेज प्राप्त होता है, तो राज्य की अर्थव्यवस्था में एक आमूल-चूल संरचनात्मक परिवर्तन आ सकता है:

1. राजकोषीय विस्तार एवं अवसंरचनात्मक विकास (Fiscal Space)

  • योजनाओं में 90:10 के वित्तपोषण अनुपात से राज्य सरकार के सीमित राजस्व की बचत होगी। इस बची हुई पूंजी का उपयोग पटना और बिहार के सभी जिलों में विश्वस्तरीय स्वास्थ्य, शिक्षा और परिवहन अवसंरचना (सड़क, पुल, ग्रिड) के समेकित विकास के लिए किया जा सकेगा।

2. औद्योगिक निवेश और रोजगार सृजन

  • कर रियायतों (Tax Concessions) के कारण बड़े कॉर्पोरेट घराने राज्य में निवेश के लिए आकर्षित होंगे।

  • इससे पटना और बिहार के सभी जिलों में कृषि-प्रसंस्करण (Agro-processing), मखाना, मक्का और वस्त्र उद्योग के नए क्लस्टर्स स्थापित होंगे, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन होगा और प्रतिभा एवं श्रम का अंतर-राज्यीय पलायन (Brain Drain & Labor Migration) रुकेगा।

3. मानव पूंजी निर्माण (Human Capital Formation)

  • केंद्रीय अनुदान की अधिकता से राज्य सरकार 'सात निश्चय-2' और 'कृषि रोड मैप' जैसी अपनी विकासात्मक योजनाओं को और अधिक व्यापक रूप से लागू कर सकेगी, जिससे शिक्षा, कौशल विकास और कुपोषण उन्मूलन (पोषण अभियान) को गति मिलेगी।

विद्यमान चुनौतियाँ (Challenges)

  • वित्त आयोग की संस्तुतियां: 14वें और 15वें वित्त आयोग ने विशेष राज्य के दर्जे की अवधारणा को (पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों को छोड़कर) लगभग समाप्त कर दिया है। इसके एवज में राज्यों की केंद्रीय करों में हिस्सेदारी को 32% से बढ़ाकर 41% कर दिया गया है।

  • अन्य राज्यों की मांगें: यदि तकनीकी नियमों को शिथिल कर बिहार को यह दर्जा दिया जाता है, तो ओडिशा, आंध्र प्रदेश और झारखंड जैसे अन्य राज्य भी इसकी मांग तेज कर देंगे, जिससे केंद्र के राजकोष पर असहनीय दबाव पड़ेगा।

आगे की राह (Way Forward)

यह निर्विवाद सत्य है कि विकास के राष्ट्रीय सूचकांकों में सुधार तब तक संभव नहीं है, जब तक बिहार जैसी विशाल आबादी वाला राज्य पीछे छूटा रहेगा। 'सबका साथ, सबका विकास' और सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की भावना के अनुरूप, यदि वर्तमान संवैधानिक और तकनीकी ढांचे में विशेष राज्य का दर्जा देना संभव नहीं है, तो इसके वैकल्पिक समाधान खोजे जाने चाहिए।

केंद्र सरकार को नीति आयोग के माध्यम से बिहार के लिए एक दीर्घकालिक 'विशेष वित्तीय पैकेज' (Special Financial Package) और 'क्षेत्र-विशिष्ट अनुदान' (Sector-specific Grants) की रूपरेखा तैयार करनी चाहिए। बाढ़ प्रबंधन के लिए नेपाल के साथ उच्च स्तरीय कूटनीतिक समाधान और कृषि-उद्योगों हेतु 'टैक्स हॉलिडे' की विशेष व्यवस्था, बिहार को उसकी ऐतिहासिक और भौगोलिक बाधाओं से मुक्त कर 'विकसित भारत' के विकास इंजन के रूप में स्थापित कर सकती है।

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