भारत में स्टार्ट-अप इकोसिस्टम के विकास और अर्थव्यवस्था में इसके योगदान का मूल्यांकन करें।

 Q. भारत में स्टार्ट-अप इकोसिस्टम के विकास और अर्थव्यवस्था में इसके योगदान का मूल्यांकन करें।

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भारत में स्टार्ट-अप इकोसिस्टम का विकास और अर्थव्यवस्था में इसका योगदान

भूमिका

21वीं सदी की ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था में 'नवाचार' (Innovation) और 'उद्यमशीलता' (Entrepreneurship) आर्थिक विकास के प्रमुख वाहक बन गए हैं। वर्ष 2016 में भारत सरकार द्वारा आरंभ की गई 'स्टार्ट-अप इंडिया' (Startup India) पहल ने देश में उद्यमशीलता के एक नए युग का सूत्रपात किया। उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (DPIIT) के अद्यतन आंकड़ों के अनुसार, भारत वर्तमान में 1.14 लाख से अधिक मान्यता प्राप्त स्टार्ट-अप्स और 110 से अधिक 'यूनिकॉर्न' (Unicorns) के साथ विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्ट-अप इकोसिस्टम बन चुका है। यह रूपांतरण न केवल जनसांख्यिकीय लाभांश को भुनाने का माध्यम है, बल्कि यह 'आत्मनिर्भर भारत' की संकल्पना को भी साकार कर रहा है।

स्टार्ट-अप इकोसिस्टम के विकास के प्रमुख कारक (Drivers of Growth)

  • नीतिगत और संस्थागत समर्थन: सरकार द्वारा स्थापित 'फंड ऑफ फंड्स फॉर स्टार्टअप्स' (FFS), 'स्टार्टअप इंडिया सीड फंड स्कीम' (SISFS) और आयकर में छूट जैसे प्रावधानों ने प्रारंभिक चरण के उद्यमों को आवश्यक वित्तीय तरलता प्रदान की है।

  • डिजिटल अवसंरचना का विस्तार: 'डिजिटल इंडिया' अभियान, सस्ती इंटरनेट पहुंच और यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) जैसे डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे (DPI) ने टियर-2 और टियर-3 शहरों में नए बाजारों के द्वार खोले हैं।

  • जनसांख्यिकीय लाभांश: भारत की विशाल युवा आबादी (औसत आयु लगभग 28 वर्ष) पारंपरिक रोजगार की मानसिकता से बाहर निकलकर 'नौकरी प्रदाता' (Job Creator) की भूमिका अपना रही है।

  • वैश्विक निवेश और वेंचर कैपिटल: प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के उदारीकरण और वैश्विक निवेशकों (Angel Investors & Venture Capitalists) के विश्वास के कारण भारतीय स्टार्ट-अप्स में बड़े पैमाने पर विदेशी पूंजी का अंतर्वाह हुआ है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में स्टार्ट-अप्स का योगदान

  • व्यापक रोजगार सृजन: स्टार्ट-अप्स श्रम-गहन और पूंजी-गहन दोनों प्रकार के रोजगार अवसर पैदा कर रहे हैं। DPIIT की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय स्टार्ट-अप्स ने अब तक 12 लाख से अधिक प्रत्यक्ष रोजगार सृजित किए हैं। गिग इकॉनमी (Gig Economy) के माध्यम से अप्रत्यक्ष रोजगार का आंकड़ा इससे भी वृहद् है।

  • तकनीकी नवाचार और समस्या समाधान: एडटेक (EdTech), हेल्थटेक (HealthTech) और एग्रीटेक (AgriTech) क्षेत्रों में नवाचारों ने बुनियादी सेवाओं की पहुँच को सुगम बनाया है। उदाहरणार्थ, कृषि क्षेत्र में ड्रोन तकनीक और आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन ने किसानों की आय बढ़ाने में सहायता की है।

  • वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion): फिनटेक (FinTech) स्टार्ट-अप्स ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए ऋण पहुंच को आसान बनाया है और ग्रामीण भारत को मुख्यधारा की बैंकिंग अर्थव्यवस्था से जोड़ा है।

  • रक्षा एवं अंतरिक्ष क्षेत्र में आत्मनिर्भरता: अंतरिक्ष क्षेत्र के निजीकरण (IN-SPACe) के पश्चात् स्काईरूट एयरोस्पेस जैसी कंपनियों और रक्षा क्षेत्र में डिफेंस स्टार्ट-अप्स ने स्वदेशी तकनीक के विकास को गति दी है, जिससे आयात निर्भरता कम हो रही है।

बिहार के संदर्भ में स्टार्ट-अप इकोसिस्टम का विकास

बिहार, जो ऐतिहासिक रूप से कृषि और जनसांख्यिकी पर निर्भर रहा है, अब तेजी से उद्यमशीलता की ओर अग्रसर है:

  • बिहार स्टार्ट-अप नीति, 2022: इस नीति के अंतर्गत युवाओं को नवाचार हेतु 10 लाख रुपये तक की ब्याज मुक्त सीड फंडिंग (10 वर्षों के लिए) का प्रावधान है। महिलाओं, अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) और दिव्यांग उद्यमियों के लिए 5% से 15% तक अतिरिक्त अनुदान की व्यवस्था है।

  • विकेंद्रीकृत औद्योगिक विकास: राज्य में उद्यमशीलता अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। वर्तमान में पटना और बिहार के सभी जिलों में एग्रीटेक, मखाना प्रसंस्करण, हस्तशिल्प और ई-कॉमर्स से जुड़े स्टार्ट-अप्स का तेजी से विस्तार हो रहा है, जो स्थानीय संसाधनों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित कर रहे हैं।

  • संस्थागत इन्क्यूबेशन: पटना में स्थापित 'बी-हब' (B-Hub) और राज्य के विभिन्न इंजीनियरिंग तथा प्रबंधन संस्थानों में कार्यरत इन्क्यूबेशन केंद्र (Incubation Centers) युवाओं को मेंटरशिप, को-वर्किंग स्पेस और तकनीकी सहायता प्रदान कर रहे हैं।

वर्तमान चुनौतियाँ

  • फंडिंग विंटर (Funding Winter): हालिया वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक मंदी की आशंकाओं के कारण वेंचर कैपिटल निवेश में कमी आई है, जिससे कई स्टार्ट-अप्स को नकदी संकट का सामना करना पड़ रहा है।

  • नियामकीय अनुपालन (Regulatory Compliance): बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) के पंजीकरण में देरी और श्रम व कर कानूनों के जटिल अनुपालन छोटे स्टार्ट-अप्स के लिए बाधा उत्पन्न करते हैं।

  • बुनियादी ढांचे व मेंटरशिप का अभाव: महानगरों की तुलना में छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कुशल मानव संसाधन, तकनीकी अवसंरचना और अनुभवी मेंटर्स की भारी कमी है।

आगे की राह (Way Forward)

  1. घरेलू पूंजी का एकत्रीकरण: विदेशी निवेशकों पर निर्भरता कम करने के लिए बीमा कंपनियों और पेंशन फंडों (जैसे EPFO) को घरेलू स्टार्ट-अप्स में एक निश्चित सीमा तक निवेश करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

  2. शिक्षा के साथ एकीकरण: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 के प्रावधानों के अनुरूप स्कूली और विश्वविद्यालय स्तर पर 'अटल टिंकरिंग लैब्स' और शोध को बढ़ावा देकर उद्यमशीलता की संस्कृति विकसित की जानी चाहिए।

  3. अनुपालन का सरलीकरण: सिंगल विंडो क्लीयरेंस और स्व-प्रमाणन (Self-certification) के तंत्र को और अधिक मजबूत व पारदर्शी बनाया जाए।

निष्कर्ष

भारत का स्टार्ट-अप इकोसिस्टम देश की आर्थिक वृद्धि, तकनीकी संप्रभुता और जनसांख्यिकीय लाभांश के अभिसरण (Convergence) का उत्कृष्ट उदाहरण है। यदि नीतिगत स्तर पर वित्तपोषण की बाधाओं को दूर किया जाए और अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर निवेश बढ़ाया जाए, तो यह इकोसिस्टम न केवल 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को प्राप्त करने में, बल्कि 2047 तक भारत को एक 'विकसित राष्ट्र' के रूप में स्थापित करने में केंद्रीय भूमिका निभाएगा।

क्या आप मानते हैं कि 'फंडिंग विंटर' के इस दौर में स्टार्ट-अप्स को केवल मूल्यांकन (Valuation) के बजाय लाभप्रदता (Profitability) और टिकाऊ व्यवसाय मॉडल पर ध्यान केंद्रित करने के लिए विशेष रूप से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए?

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