बिहार में जाति-आधारित गणना (Caste Census) के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रभावों का आलोचनात्मक विश्लेषण करें।
Q. बिहार में जाति-आधारित गणना (Caste Census) के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रभावों का आलोचनात्मक विश्लेषण करें।
Ans -
भारतीय प्रशासनिक और सामाजिक-राजनीतिक इतिहास में बिहार सरकार द्वारा वर्ष 2023 में संपन्न 'जाति-आधारित गणना' (Caste-based Survey) एक युगांतरकारी कदम है। वर्ष 1931 के बाद यह पहली बार है जब किसी राज्य ने अपनी जनसंख्या के सामाजिक, आर्थिक और जनांकिकीय (Demographic) प्रोफाइल का इतना विस्तृत और वैज्ञानिक डेटाबेस तैयार किया है। संविधान के अनुच्छेद 340 (पिछड़े वर्गों की दशाओं के अन्वेषण) और अनुच्छेद 38 (कल्याणकारी राज्य की स्थापना) के दर्शन से प्रेरित यह गणना केवल आंकड़ों का संकलन नहीं है, बल्कि यह 'समानता और सामाजिक न्याय' (Social Justice) के नीतिगत लक्ष्यों को यथार्थ के धरातल पर उतारने का एक वैधानिक आधार है।
जाति-आधारित गणना के बहुआयामी प्रभाव
इस गणना ने दशकों से चली आ रही पारंपरिक नीतियों के स्वरूप को चुनौती दी है। इसके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रभावों का सूक्ष्म और आलोचनात्मक विश्लेषण निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है:
1. सामाजिक प्रभाव (Social Impacts)
वंचित वर्गों की दृश्यता (Visibility of Marginalized): गणना के आंकड़ों के अनुसार, अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC - 36.01%) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC - 27.12%) मिलाकर राज्य की लगभग 63% आबादी का निर्माण करते हैं। इसने सामाजिक पदानुक्रम (Social Hierarchy) में सबसे निचले पायदान पर खड़े, परंतु सांख्यिकीय रूप से अदृश्य वर्गों को एक स्पष्ट वैधानिक पहचान प्रदान की है।
नीतियों का समावेशन (Inclusive Policy Making): इस डेटा ने नीति-निर्माण में 'वन साइज फिट्स ऑल' (One Size Fits All) दृष्टिकोण को अप्रासंगिक बना दिया है। अब कल्याणकारी नीतियां अनुमानों पर नहीं, बल्कि वस्तुनिष्ठ यथार्थ पर आधारित होंगी।
2. आर्थिक प्रभाव (Economic Impacts)
आर्थिक विषमता का प्रकटीकरण: गणना के आर्थिक आंकड़ों ने एक कठोर वास्तविकता को उजागर किया है कि राज्य के लगभग 34.13% परिवार (सभी जातियों में) प्रतिमाह ₹6,000 से कम आय पर जीवन यापन कर रहे हैं। यह 'बहुआयामी गरीबी' (Multidimensional Poverty) की जमीनी हकीकत को दर्शाता है।
लक्षित संसाधन आवंटन (Targeted Resource Allocation): यह डेटा सरकार को सूक्ष्म स्तर पर (Micro-level) गरीबी उन्मूलन और आजीविका कार्यक्रमों को लागू करने में सक्षम बनाएगा। राज्य के समग्र और संतुलित आर्थिक विकास के लिए यह नितांत आवश्यक है कि आधारभूत संरचना, औद्योगीकरण और रोजगार के अवसरों का विस्तार केवल राजधानी तक सीमित न रहे, बल्कि संसाधनों का यह विकेंद्रीकरण पटना और सभी बिहार के जिलों में समान रूप से सुनिश्चित किया जाए।
बजटीय प्राथमिकताओं का पुनर्निर्धारण: राज्य सरकार के 'सात निश्चय' जैसी योजनाओं और नीति आयोग के विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए यह प्रामाणिक डेटा संसाधनों के वैज्ञानिक वितरण में अत्यंत सहायक सिद्ध होगा।
3. राजनीतिक प्रभाव (Political Impacts)
आरक्षण की सीमा और वैधानिक विमर्श: इन आंकड़ों के आधार पर बिहार विधानमंडल ने राज्य की सेवाओं और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का दायरा 50% से बढ़ाकर 75% कर दिया। यद्यपि, इसे पटना उच्च न्यायालय द्वारा इंद्रा साहनी वाद (1992) में निर्धारित 50% की सीमा के उल्लंघन के आधार पर निरस्त कर दिया गया है, परंतु इसने पूरे देश में आरक्षण की सीमा (Ceiling) को लेकर एक वृहद संवैधानिक बहस छेड़ दी है।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व का पुनर्संतुलन: यह गणना 'जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी' के राजनीतिक विमर्श को वैधानिकता प्रदान करती है। यह भविष्य में राजनीतिक दलों को नेतृत्व और टिकट वितरण में अत्यंत पिछड़े वर्गों (EBCs) और महादलितों को अधिक प्रतिनिधित्व देने के लिए विवश करेगा।
आलोचनात्मक मूल्यांकन और विद्यमान चुनौतियां
इस ऐतिहासिक कदम के अनेक सकारात्मक पहलू होने के बावजूद, इसके संभावित नकारात्मक प्रभावों का मूल्यांकन भी आवश्यक है:
जातीय पहचान का सुदृढ़ीकरण: आलोचकों का तर्क है कि यह प्रक्रिया समाज में जातीय विभाजनों (Caste Cleavages) और पहचान की राजनीति को और गहरा कर सकती है, जो डॉ. बी.आर. अंबेडकर के 'जाति के विनाश' (Annihilation of Caste) के स्वप्न के सर्वथा प्रतिकूल है।
तुष्टिकरण और लोकलुभावनवाद (Populism): एक बड़ी चुनौती यह है कि यदि इस डेटा का उपयोग केवल चुनावी लाभ और वोट-बैंक की राजनीति के लिए किया गया, तो राज्य का मूल विकासात्मक एजेंडा (जैसे—गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य अवसंरचना और उद्योग) हाशिए पर जा सकता है।
डेटा की सटीकता पर विवाद: कुछ उप-जातियों और समुदायों द्वारा उनकी वास्तविक संख्या को कम आंकने के आरोप सामने आए हैं, जो भविष्य में प्रशासनिक असंतोष और कानूनी विवादों (Litigations) को जन्म दे सकते हैं।
आगे की राह
बिहार की जाति-आधारित गणना शासन को 'डेटा-संचालित' (Data-driven Governance) बनाने की दिशा में एक साहसिक, ऐतिहासिक और आवश्यक हस्तक्षेप है। यह केवल एक राजनीतिक उपकरण नहीं है, बल्कि नीति-निर्माताओं के लिए समाज का एक यथार्थवादी 'दर्पण' है।
लोकतंत्र की परिपक्वता इसमें निहित है कि इस वैज्ञानिक डेटाबेस का उपयोग 'पहचान और विभाजन की राजनीति' को भड़काने के बजाय 'विकास की राजनीति' (Politics of Development) को साधने के लिए किया जाए। सरकार की प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि इन आंकड़ों के आधार पर कौशल विकास (Skill Development), उद्यमशीलता और लक्षित कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का आर्थिक उत्थान सुनिश्चित किया जाए, ताकि बिहार एक समतामूलक, न्यायपूर्ण और आत्मनिर्भर राज्य के रूप में स्थापित हो सके।