'क्षेत्रवाद' (Regionalism) भारतीय राष्ट्रवाद के लिए एक खतरा है या लोकतंत्र को मजबूत करने का साधन ? तर्क सहित उत्तर दें।
Q. 'क्षेत्रवाद' (Regionalism) भारतीय राष्ट्रवाद के लिए एक खतरा है या लोकतंत्र को मजबूत करने का साधन ? तर्क सहित उत्तर दें।
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भारतीय राजव्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में 'क्षेत्रवाद' (Regionalism) एक ऐसी विचारधारा है जो किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र के निवासियों में भाषा, संस्कृति, इतिहास या आर्थिक हितों की समानता के आधार पर उत्पन्न होती है। स्वतंत्रता के पश्चात से ही भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण राष्ट्र में क्षेत्रवाद और राष्ट्रवाद के अंतर्संबंधों पर गहन संवैधानिक और राजनीतिक विमर्श होता रहा है। समाजशास्त्रियों और राजनीति विज्ञानियों के अनुसार, क्षेत्रवाद और राष्ट्रवाद सदैव परस्पर विरोधी (Mutually Exclusive) नहीं होते। इसका यथार्थ मूल्यांकन इसके स्वरूप—सकारात्मक (विकासात्मक और सांस्कृतिक) या नकारात्मक (अलगाववादी और उग्र)—पर निर्भर करता है।
क्षेत्रवाद: राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय अखंडता के लिए एक खतरा
जब क्षेत्रीय अस्मिता राष्ट्रीय पहचान पर हावी होने का प्रयास करती है, तो यह राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में गंभीर बाधाएं उत्पन्न करती है। इसके नकारात्मक प्रभावों को निम्नलिखित बिंदुओं में देखा जा सकता है:
1. 'भूमिपुत्र' की अवधारणा (Son of the Soil Doctrine) और प्रवासियों पर हमले
संकीर्ण क्षेत्रीय अस्मिता अक्सर अन्य राज्यों के लोगों के प्रति घृणा और असहिष्णुता को जन्म देती है। महाराष्ट्र, गुजरात या असम जैसे राज्यों में बिहार और उत्तर प्रदेश के प्रवासी श्रमिकों पर हुए हिंसक हमले इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। यह प्रवृत्तियां सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) और (e) (देश के किसी भी भाग में निर्बाध आवागमन और निवास की स्वतंत्रता) का घोर उल्लंघन हैं।
2. अलगाववादी और विघटनकारी प्रवृत्तियां (Secessionist Tendencies)
जब क्षेत्रवाद चरम रूप धारण करता है, तो यह देश की संप्रभुता को चुनौती देता है। 1960 के दशक में द्रविड़ नाडु की मांग, पंजाब में खालिस्तान आंदोलन, और पूर्वोत्तर भारत (जैसे असम और नागालैंड) में उग्रवाद ऐसे कड़वे सत्य हैं जिन्होंने राष्ट्रवाद और अनुच्छेद 1 (भारत, राज्यों का एक संघ है) की मूल भावना को गहरी चोट पहुंचाई है।
3. अंतर-राज्यीय विवादों का राजनीतिकरण (Inter-State Disputes)
तीव्र क्षेत्रीय राजनीति के कारण राज्यों के मध्य नदी जल और सीमा विवाद सुलझने के बजाय और अधिक जटिल हो जाते हैं। कावेरी नदी जल विवाद या महाराष्ट्र-कर्नाटक के बीच बेलगावी सीमा विवाद इसके प्रमुख उदाहरण हैं। राजनीतिक दल वोट-बैंक ध्रुवीकरण के लिए इन मुद्दों का उपयोग करते हैं, जिससे राष्ट्रीय संसाधनों का इष्टतम उपयोग बाधित होता है।
क्षेत्रवाद: लोकतंत्र को सुदृढ़ करने का एक सशक्त साधन
सकारात्मक दृष्टि से, क्षेत्रवाद भारत के 'असममित संघवाद' (Asymmetrical Federalism) को जीवंत बनाता है और लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को गहराई प्रदान करता है:
1. भाषाई और सांस्कृतिक विविधता का संरक्षण
राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 (States Reorganisation Act 1956) के माध्यम से भाषाई आधार पर राज्यों के निर्माण ने भारत को विखंडित होने से बचाया (श्रीलंका या पूर्व पाकिस्तान के विपरीत, जहां भाषा थोपने से राष्ट्र का विभाजन हुआ)। इसने क्षेत्रीय आकांक्षाओं को मुख्यधारा में शामिल कर लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति प्रदान की। अनुच्छेद 371 (A से J) के तहत नागालैंड, मिजोरम आदि के लिए विशेष प्रावधान क्षेत्रीय पहचान को संरक्षित कर उन्हें भारत संघ में जोड़े रखने का एक उत्कृष्ट साधन सिद्ध हुए हैं।
2. ऐतिहासिक पिछड़ेपन के विरुद्ध आवाज और संतुलित विकास
सकारात्मक क्षेत्रवाद अक्सर आर्थिक वंचना के विरुद्ध एक लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया होता है। बिहार का संदर्भ: बिहार सरकार द्वारा निरंतर की जाने वाली 'विशेष राज्य के दर्जे' (Special Category Status) की मांग कोई राष्ट्र-विरोधी कदम नहीं है, बल्कि यह केंद्र की विकासात्मक नीतियों में राज्य की उचित और न्यायपूर्ण हिस्सेदारी सुनिश्चित करने का प्रयास है। इस क्षेत्रीय मांग का मुख्य उद्देश्य केवल राजधानी तक सीमित न रहकर पटना और बिहार के सभी जिलों के लिए बाढ़ नियंत्रण, औद्योगिक निवेश, आधारभूत संरचना और समावेशी विकास सुनिश्चित कर राज्य को राष्ट्रीय मुख्यधारा में समान स्तर पर लाना है।
3. सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का विस्तार
क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के उदय ने केंद्र की 'एकदलीय कार्यपालिका' की तानाशाही पर अंकुश लगाया है। जब क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय गठबंधन (Coalition Governments) का हिस्सा बनते हैं, तो स्थानीय और परिधीय (Peripheral) मुद्दे सीधे संसद के पटल तक पहुंचते हैं। ऐतिहासिक एस.आर. बोम्मई वाद (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने संघवाद को संविधान का 'बुनियादी ढांचा' (Basic Structure) माना, जिसे स्वस्थ क्षेत्रीय अस्मिता ही मजबूत करती है।
आगे की राह
विख्यात विद्वान रजनी कोठारी के अनुसार, "भारत में क्षेत्रवाद राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया का विरोधी नहीं, बल्कि उसका एक आवश्यक अंग है।" क्षेत्रीय आकांक्षाओं को दबाना लोकतंत्र के लिए घातक हो सकता है, परंतु उन्हें राष्ट्र-विरोधी शक्तियों के हाथों में खेलने से रोकना भी राज्य का प्राथमिक दायित्व है।
भविष्य की लोकतांत्रिक यात्रा में यह आवश्यक है कि 'बॉटम-अप' (Bottom-up) विकास मॉडल को अपनाया जाए। नीति आयोग (NITI Aayog) द्वारा संचालित 'आकांक्षी जिला कार्यक्रम' (Aspirational Districts Programme) क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने की दिशा में एक सटीक कदम है। इसके साथ ही, अनुच्छेद 263 के तहत स्थापित अंतर-राज्य परिषद (Inter-State Council) को अधिक सक्रिय किया जाना चाहिए ताकि क्षेत्रीय विवादों का समाधान संवाद के माध्यम से हो सके।
'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' का लक्ष्य तभी साकार होगा, जब प्रत्येक क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक और विकासात्मक आकांक्षाओं को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से एकीकृत किया जाएगा। राष्ट्रवाद की इमारत तभी मजबूत हो सकती है, जब उसके नीचे क्षेत्रीय विकास और स्वाभिमान की नींव सुदृढ़ हो।