भारतीय राजनीति में जाति, धर्म और धनबल की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।
Q. भारतीय राजनीति में जाति, धर्म और धनबल की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।
Ans -
भारतीय लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा और जीवंत लोकतंत्र है, जिसकी नींव 'सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार' (अनुच्छेद 326) और राजनीतिक समानता पर आधारित है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय संविधान निर्माताओं ने एक धर्मनिरपेक्ष, समतामूलक और पारदर्शी राजनीतिक व्यवस्था की परिकल्पना की थी। परंतु, पिछले सात दशकों की चुनावी राजनीति का यथार्थ यह है कि जाति (Caste), धर्म (Religion) और धनबल (Money Power) ने चुनाव प्रक्रिया और राजनीतिक विमर्श को गहराई से प्रभावित और कई मामलों में विकृत किया है।
भारतीय राजनीति में जाति, धर्म और धनबल की भूमिका
इन तीनों कारकों ने भारतीय राजव्यवस्था में एक जटिल गठजोड़ का निर्माण किया है, जिसका आलोचनात्मक मूल्यांकन निम्नलिखित उप-शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है:
1. राजनीति में जाति की भूमिका (Role of Caste)
भारतीय समाज में जाति एक कठोर सामाजिक वास्तविकता है, जो अब राजनीतिक लामबंदी (Political Mobilization) का सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री रजनी कोठारी ने इसे "राजनीति का जातिकरण" (Casteisation of Politics) कहा है।
सकारात्मक प्रभाव: 1990 के दशक में मंडल आयोग के लागू होने के पश्चात, जातिगत गोलबंदी ने हाशिए के वर्गों (OBC, EBC, और दलितों) में राजनीतिक चेतना का प्रसार किया और उन्हें सत्ता में 'समानुपातिक हिस्सेदारी' प्रदान कर लोकतांत्रिक आधार को व्यापक बनाया।
नकारात्मक प्रभाव: आज टिकटों का वितरण, मंत्रिमंडल का गठन और चुनावी रणनीतियां उम्मीदवार की योग्यता के बजाय 'जातिगत समीकरणों' (Caste Arithmetic) पर तय होती हैं। इससे विकास और सुशासन के मुद्दे गौण हो जाते हैं।
बिहार का संदर्भ: बिहार के राजनीतिक इतिहास में जातिगत समीकरण अत्यंत प्रभावी रहे हैं। हालिया 'जाति-आधारित गणना' (Caste-based Survey) ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व की एक नई वैधानिक बहस को जन्म दिया है। परंतु, राज्य के समग्र और दीर्घकालिक औद्योगिक विकास के लिए यह अनिवार्य है कि चुनावी विमर्श केवल जातिगत अस्मिता तक सीमित न रहे, बल्कि पटना और बिहार के सभी जिलों के समान, समावेशी और ढांचागत विकास पर केंद्रित हो।
2. राजनीति में धर्म की भूमिका (Role of Religion)
एस.आर. बोम्मई वाद (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने 'धर्मनिरपेक्षता' (Secularism) को संविधान का मूल ढांचा (Basic Structure) घोषित किया था। इसके बावजूद, चुनाव जीतने के लिए धार्मिक ध्रुवीकरण (Religious Polarization) का धड़ल्ले से उपयोग हो रहा है।
भ्रष्ट आचरण: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 की धारा 123(3) के तहत धर्म, मूलवंश, जाति या समुदाय के आधार पर वोट मांगना एक 'भ्रष्ट आचरण' (Corrupt Practice) है। फिर भी, चुनाव प्रचार में धार्मिक प्रतीकों, स्थानों और भड़काऊ भाषणों का प्रत्यक्ष या परोक्ष उपयोग लगातार देखा जाता है।
लोकतांत्रिक ताने-बाने पर आघात: धार्मिक राजनीति अक्सर 'बहुसंख्यकवाद' (Majoritarianism) और अल्पसंख्यक अलगाव को जन्म देती है, जो एक समतामूलक समाज के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा है।
3. राजनीति में धनबल की भूमिका (Role of Money Power)
धनबल ने भारतीय लोकतंत्र को 'धनिकतंत्र' (Plutocracy) में बदलने का गंभीर खतरा उत्पन्न कर दिया है, जहाँ चुनाव लड़ना आम नागरिक की पहुंच से बाहर होता जा रहा है।
अपराधीकरण और भ्रष्टाचार का दुष्चक्र: चुनावी वित्तपोषण (Electoral Funding) में अपारदर्शिता नीतिगत भ्रष्टाचार (Crony Capitalism) को जन्म देती है। वोहरा समिति (1993) ने राजनेताओं, अपराधियों और नौकरशाही के गठजोड़ को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया था।
संस्थागत विफलता: एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्टें निरंतर चुनाव में करोड़पति उम्मीदवारों और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले विधायकों/सांसदों के बढ़ते वर्चस्व को उजागर करती हैं। हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपारदर्शी 'चुनावी बांड योजना' (Electoral Bonds Scheme) को असंवैधानिक घोषित करना धनबल के प्रभाव को कम करने की दिशा में एक ऐतिहासिक न्यायिक प्रहार है।
आगे की राह
जाति, धर्म और धनबल का यह विषैला गठजोड़ न केवल 'सुशासन' (Good Governance) को बाधित करता है, बल्कि योग्य, ईमानदार और विजनरी उम्मीदवारों के लिए राजनीति के दरवाजे बंद कर देता है। इस स्थिति में सुधार के लिए निम्नलिखित कदम अपरिहार्य हैं:
चुनावी वित्तपोषण में सुधार: इंद्रजीत गुप्ता समिति (1998) और विधि आयोग की सिफारिशों के आधार पर 'चुनावों की राज्य द्वारा फंडिंग' (State Funding of Elections) के विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए, ताकि राजनीतिक दलों की कॉर्पोरेट चंदे पर निर्भरता कम हो।
चुनाव आयोग का सुदृढ़ीकरण: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द करने और आदर्श आचार संहिता (MCC) के उल्लंघन पर दंडात्मक कार्रवाई करने की अधिक शक्तियां मिलनी चाहिए।
आंतरिक लोकतंत्र (Intra-party Democracy): राजनीतिक दलों के भीतर जवाबदेही और टिकट वितरण में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सख्त कानूनी ढांचा बनाया जाना चाहिए।
डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने संविधान सभा में चेतावनी दी थी कि "राजनीतिक समानता तब तक अर्थहीन है, जब तक सामाजिक और आर्थिक असमानता बनी रहेगी।" एक परिपक्व लोकतंत्र के रूप में भारत को पहचान और धन की राजनीति से आगे बढ़कर नीतियों, शिक्षा, रोजगार और विकास की राजनीति को स्थापित करना होगा, तभी हम एक वास्तविक और सुदृढ़ 'गणतंत्र' का निर्माण कर सकेंगे।