सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) से जुड़े विवादों की चर्चा करें। न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता कैसे लाई जा सकती है?
Q. सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) से जुड़े विवादों की चर्चा करें। न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता कैसे लाई जा सकती है?
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भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(2) और अनुच्छेद 217 के तहत सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है। वर्तमान में यह प्रक्रिया 'कॉलेजियम प्रणाली' (Collegium System) द्वारा संचालित होती है। यह प्रणाली संविधान के मूल पाठ का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह 'थ्री जजेज़ केसेस' (Three Judges Cases - 1981, 1993, 1998) के माध्यम से विकसित एक 'न्यायिक नवाचार' (Judicial Innovation) है, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों का समूह नियुक्तियों और तबादलों का निर्णय लेता है। यद्यपि इसका मूल उद्देश्य कार्यपालिका के अनुचित हस्तक्षेप को रोककर 'न्यायिक स्वतंत्रता' (Judicial Independence) सुनिश्चित करना था, तथापि यह व्यवस्था अपनी कार्यप्रणाली के कारण निरंतर विवादों और आलोचनाओं के केंद्र में रही है।
कॉलेजियम प्रणाली से जुड़े प्रमुख विवाद
विश्व में भारत एकमात्र ऐसा प्रमुख लोकतांत्रिक देश है जहाँ "न्यायाधीश ही न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं" (Judges appointing judges)। इस प्रणाली के साथ निम्नलिखित गंभीर संरचनात्मक और व्यावहारिक विवाद जुड़े हुए हैं:
1. संवैधानिक शून्यता और शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) का उल्लंघन
संविधान के अनुच्छेद 124 में राष्ट्रपति को मुख्य न्यायाधीश से केवल 'परामर्श' (Consultation) करने का निर्देश दिया गया था। परंतु, द्वितीय न्यायाधीश मामले (1993) में सर्वोच्च न्यायालय ने 'परामर्श' की व्याख्या 'सहमति' (Concurrence) के रूप में की। आलोचकों और कार्यपालिका का तर्क है कि यह व्याख्या विधायिका की मंशा के विरुद्ध है और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन करती है।
2. अपारदर्शिता और जवाबदेही का पूर्ण अभाव
कॉलेजियम की बैठकें बंद कमरों में होती हैं। उम्मीदवारों के चयन का आधार, उनके मूल्यांकन के मापदंड, और किसी उम्मीदवार को अस्वीकृत करने के कारणों को सार्वजनिक नहीं किया जाता है। निर्णय-निर्माण प्रक्रिया में यह गोपनीयता 'लोकतांत्रिक जवाबदेही' (Democratic Accountability) के सिद्धांतों के सर्वथा प्रतिकूल है।
3. 'अंकल जज' सिंड्रोम और भाई-भतीजावाद (Nepotism)
विधि आयोग की 214वीं रिपोर्ट और न्यायपालिका के ही कई पूर्व न्यायाधीशों ने कॉलेजियम प्रणाली में व्याप्त भाई-भतीजावाद की ओर इशारा किया है। अक्सर यह आरोप लगता है कि नियुक्तियों में योग्यता (Merit) से अधिक व्यक्तिगत संबंधों और वरिष्ठ न्यायाधीशों के साथ निकटता को प्राथमिकता दी जाती है।
4. सामाजिक और क्षेत्रीय विविधता (Regional & Social Diversity) का अभाव
कॉलेजियम प्रणाली पर एक संभ्रांतवादी (Elitist) ढांचा होने का आरोप है, जिसमें महिलाओं, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), और अत्यंत पिछड़े वर्गों (OBC) का प्रतिनिधित्व अत्यंत नगण्य है।
बिहार के विशेष संदर्भ में मूल्यांकन: न्यायिक प्रणाली की प्रभावशीलता और आम जन का विश्वास तभी सुनिश्चित हो सकता है जब पटना और बिहार के सभी जिलों सहित देश के हर सुदूर क्षेत्र के लोगों को यह महसूस हो कि न्यायपालिका में उनके वर्ग और क्षेत्र का उचित प्रतिनिधित्व है। पटना उच्च न्यायालय सहित देश भर में लाखों लंबित मुकदमों का एक बड़ा कारण न्यायाधीशों के रिक्त पद हैं। एक बंद प्रणाली व्यापक प्रतिभा पूल (Talent Pool) को पहचानने में विफल रहती है, जिससे बिहार जैसे विविधतापूर्ण और घनी आबादी वाले राज्यों की न्यायिक आवश्यकताओं और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की अनदेखी होती है।
न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता लाने के उपाय
न्यायिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक जवाबदेही के मध्य संतुलन स्थापित करने के लिए कॉलेजियम प्रणाली में तत्काल और व्यापक सुधारों की आवश्यकता है:
1. प्रक्रिया ज्ञापन (Memorandum of Procedure - MoP) को अंतिम रूप देना
सर्वोच्च न्यायालय और केंद्र सरकार को मिलकर एक नया और स्पष्ट प्रक्रिया ज्ञापन (MoP) तैयार करना चाहिए। इसमें न्यायाधीशों की वरिष्ठता, योग्यता, सत्यनिष्ठा और पृष्ठभूमि की जांच के लिए स्पष्ट और पारदर्शी वस्तुनिष्ठ मानदंड (Objective Criteria) निर्धारित होने चाहिए।
2. एक स्वतंत्र 'सचिवालय' (Independent Secretariat) की स्थापना
कॉलेजियम की सहायता के लिए एक स्थायी सचिवालय की स्थापना की जानी चाहिए, जो संभावित उम्मीदवारों के न्यायिक रिकॉर्ड, उनके द्वारा दिए गए निर्णयों की गुणवत्ता और उनकी सत्यनिष्ठा का एक वैज्ञानिक डेटाबेस तैयार करे।
3. संशोधित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC 2.0) का विचार
यद्यपि 99वें संविधान संशोधन द्वारा लाए गए NJAC को सर्वोच्च न्यायालय ने चतुर्थ न्यायाधीश मामले (2015) में असंवैधानिक घोषित कर दिया था, परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि सुधार के मार्ग बंद हो गए हैं। कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच एक नया और संतुलित संस्थागत तंत्र (जिसमें न्यायपालिका का वर्चस्व तो हो, परंतु कार्यपालिका और नागरिक समाज की भी भागीदारी हो) विकसित करने पर विचार किया जाना चाहिए, जो ब्रिटेन के 'जुडिशियल अपॉइंटमेंट्स कमीशन' (JAC) की तर्ज पर कार्य करे।
4. सूचना के अधिकार (RTI) का तार्किक अनुप्रयोग
सुभाष चंद्र अग्रवाल वाद (2019) में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने स्वयं माना है कि CJI का कार्यालय RTI के दायरे में आता है। न्यायिक स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखते हुए, नियुक्तियों के प्रशासनिक कारणों और कॉलेजियम के प्रस्तावों (Resolutions) को तर्कसंगत सीमा तक सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
आगे की राह
कॉलेजियम प्रणाली के वास्तुकार रहे पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे.एस. वर्मा ने स्वयं एक बार टिप्पणी की थी कि उनके द्वारा निर्मित प्रणाली अपने उद्देश्यों में पूर्णतः सफल नहीं रही है और इसकी समीक्षा आवश्यक है।
भारतीय लोकतंत्र की सुदृढ़ता एक स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका पर टिकी है। न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया 'सीज़र की पत्नी' (Caesar's wife) की भांति संदेह से परे होनी चाहिए। न्यायपालिका को स्वयं पहल करते हुए अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं को पारदर्शी और समावेशी बनाना चाहिए। कार्यपालिका के साथ एक रचनात्मक और सहयोगात्मक विमर्श के माध्यम से ही एक ऐसी पारदर्शी नियुक्ति प्रणाली विकसित की जा सकती है, जो न केवल संवैधानिक मर्यादाओं की रक्षा करे, बल्कि भारत के अंतिम नागरिक तक न्याय की पहुँच सुनिश्चित कर सके।