रक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की 'मेक इन इंडिया' पहल (DRDO की उपलब्धियां) का आलोचनात्मक परीक्षण करें।
Q. रक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की 'मेक इन इंडिया' पहल (DRDO की उपलब्धियां) का आलोचनात्मक परीक्षण करें।
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भूमिका
भारत की संप्रभुता, रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने में रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता एक अनिवार्य तत्व है। 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान के तहत, भारत सरकार ने रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) 2020, रक्षा औद्योगिक गलियारों के निर्माण और 'सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियों' (Positive Indigenisation Lists) जैसी नीतियों के माध्यम से रक्षा प्रौद्योगिकी के स्वदेशीकरण को तीव्र किया है।
वर्तमान परिदृश्य में, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के तकनीकी नेतृत्व और मेक इन इंडिया की नीतियों के परिणामस्वरूप वित्त वर्ष 2023-24 में भारत का रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड ₹1.27 लाख करोड़ और रक्षा निर्यात ₹21,083 करोड़ के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है।
रक्षा प्रौद्योगिकी में 'मेक इन इंडिया': DRDO की युगांतरकारी उपलब्धियां
DRDO ने विदेशी निर्भरता को कम करते हुए थल, जल और नभ में सशस्त्र बलों की मारक क्षमता को अभूतपूर्व विस्तार दिया है:
1. सामरिक मिसाइल और वायु रक्षा प्रणालियां
अग्नि (Agni) और पृथ्वी (Prithvi) शृंखला: 'अग्नि-V' (ICBM) के सफल परीक्षण और MIRV (Multiple Independently Targetable Re-entry Vehicle) तकनीक ('मिशन दिव्यास्त्र') के विकास ने भारत को वैश्विक सामरिक शक्तियों के समकक्ष खड़ा किया है।
ब्रह्मोस (BrahMos): यह सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल भारत-रूस संयुक्त उद्यम के तहत 'मेक इन इंडिया' का उत्कृष्ट निर्यात मॉडल है, जिसे हाल ही में फिलीपींस को निर्यात किया गया है।
आकाश (Akash) और BMD: 'आकाश' वायु रक्षा प्रणाली और स्वदेशी बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) प्रणाली ने भारतीय हवाई सुरक्षा ग्रिड को अभेद्य बनाया है।
2. एयरोनॉटिक्स और एविएशन
LCA तेजस (Tejas): 4.5 पीढ़ी का यह हल्का स्वदेशी लड़ाकू विमान भारतीय वायुसेना की रीढ़ बन रहा है।
हवाई पूर्व-चेतावनी प्रणाली (AEW&C): 'नेत्रा' (Netra) जैसे स्वदेशी राडार सिस्टम ने सीमा पार निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसका प्रमाण बालाकोट एयर स्ट्राइक के दौरान इसके सफल उपयोग में मिलता है।
3. नौसैन्य और तोपखाना (आर्टिलरी) प्रणालियां
पिनॉका (Pinaka) MBRL और ATAGS: 'एडवांस टोड आर्टिलरी गन सिस्टम' (ATAGS) का सफल परीक्षण और पिनॉका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर प्रणाली का उत्पादन रक्षा विनिर्माण में बड़ी सफलताएं हैं।
प्रोजेक्ट 75 और INS अरिहंत: DRDO ने स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी INS अरिहंत के लिए नाभिकीय रिएक्टर तथा कलावरी श्रेणी की पनडुब्बियों के लिए AIP (Air Independent Propulsion) तकनीक विकसित कर नौसेना की मारक क्षमता में वृद्धि की है।
4. बिहार के संदर्भ में रक्षा उत्पादन की प्रासंगिकता
'मेक इन इंडिया' के तहत रक्षा उत्पादन का विकेंद्रीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। रक्षा मंत्रालय के अधीन आयुध निर्माणी नालंदा (राजगीर) इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है, जहां स्वदेशी और उन्नत तोपों (जैसे बोफोर्स) के लिए अति-महत्वपूर्ण बाइ-मॉड्यूलर चार्ज सिस्टम (BMCS) का उत्पादन किया जा रहा है।
आलोचनात्मक परीक्षण: चुनौतियां और संरचनात्मक कमियां
DRDO की ऐतिहासिक सफलताओं के बावजूद, 'मेक इन इंडिया' के रक्षा आयाम में कई गंभीर संरचनात्मक बाधाएं विद्यमान हैं, जिनका समालोचनात्मक मूल्यांकन आवश्यक है:
1. क्रिटिकल (अति-महत्वपूर्ण) तकनीकों में विदेशी निर्भरता
भारत आज भी लड़ाकू विमानों के जेट इंजन (जैसे कावेरी इंजन प्रोजेक्ट का आशानुरूप सफल न होना), स्मार्ट म्युनिशंस के एक्टिव सीकर (Active Seekers), और उन्नत सेमीकंडक्टर चिप्स के लिए अमेरिका, रूस और फ्रांस पर निर्भर है। भारत में अनेक रक्षा उपकरणों का 'सिस्टम इंटीग्रेशन' (असेम्बलिंग) तो हो रहा है, परंतु उसकी 'कोर तकनीक' अभी भी आयातित है।
2. अनुसंधान और विकास (R&D) में सीमित निवेश
भारत के कुल रक्षा बजट में अनुसंधान एवं विकास का हिस्सा तुलनात्मक रूप से निम्न (लगभग 5-6%) है। वैश्विक शक्तियां उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग, ड्रोन स्वार्मिंग (Drone Swarming) और हाइपरसोनिक हथियारों पर भारी निवेश कर रही हैं, जहां भारत के प्रयास अभी विकास के प्रारंभिक चरण में हैं।
3. समय और लागत की अधिकता (Time and Cost Overruns)
DRDO की कार्यप्रणाली में प्रशासनिक जटिलताओं और लालफीताशाही के कारण LCA तेजस और अर्जुन मेन बैटल टैंक (MBT) जैसे रणनीतिक प्रोजेक्ट्स में दशकों का विलंब हुआ। इस विलंब के कारण जब तक स्वदेशी तकनीक सेना को सौंपी जाती है, तब तक सामरिक परिवेश में वह पुरानी (Obsolete) प्रतीत होने लगती है।
4. सशस्त्र बलों और उत्पादकों के बीच समन्वय का अभाव
अक्सर रक्षा बलों द्वारा 'जनरल स्टाफ क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट्स' (GSQRs) को इतना उच्च और जटिल निर्धारित कर दिया जाता है कि DRDO अथवा घरेलू उद्योग के लिए उसे तय समय-सीमा में विकसित करना लगभग असंभव हो जाता है।
आगे की राह
रक्षा उत्पादन में 'मेक इन इंडिया' को पूर्ण यथार्थ स्वरूप प्रदान करने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है:
निजी क्षेत्र की वृहद भागीदारी: रक्षा क्षेत्र को केवल DRDO और सार्वजनिक उपक्रमों (DPSUs) तक सीमित न रखकर, iDEX (Innovations for Defence Excellence) के माध्यम से निजी उद्यमों और स्टार्ट-अप्स को रक्षा निर्माण के केंद्र में लाना चाहिए।
अकादमिक जुड़ाव (Academia-Industry Linkage): उन्नत रक्षा अनुसंधान में IIT पटना जैसे प्रमुख तकनीकी संस्थानों को सक्रिय भागीदार बनाना चाहिए, जिससे रक्षा R&D का एक सुदृढ़ इकोसिस्टम तैयार हो सके।
DRDO का पुनर्गठन: रक्षा संबंधी संसदीय स्थायी समितियों और रामराव समिति (Rama Rao Committee) की सिफारिशों के अनुरूप DRDO का पुनर्गठन कर उसे अधिक जवाबदेह, विकेंद्रीकृत और केवल अति-महत्वपूर्ण 'कोर' तकनीकों पर केंद्रित किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
रक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में 'मेक इन इंडिया' केवल एक आर्थिक पहल नहीं, बल्कि भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) का सर्वप्रमुख आधार है। DRDO ने मिसाइल प्रौद्योगिकी से लेकर आर्टिलरी तक भारत को एक सशक्त राष्ट्र बनाने में अमूल्य योगदान दिया है, परंतु जेट इंजन और क्रिटिकल इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में स्वदेशी क्षमता का निर्माण अभी शेष है। R&D बजट में वृद्धि, निजी क्षेत्र के साथ सह-उत्पादन और संस्थागत सुधारों के माध्यम से भारत आगामी दशक में दुनिया के सबसे बड़े रक्षा आयातक की छवि से बाहर निकलकर, वैश्विक स्तर पर एक मजबूत 'नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर' (Net Security Provider) के रूप में स्थापित हो सकता है।