शॉर्ट नोट्स: G-7 और भारत की स्थिति।
Q - शॉर्ट नोट्स: G-7 और भारत की स्थिति।
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शॉर्ट नोट्स: G-7 और भारत की स्थिति
भूमिका
ग्रुप ऑफ सेवन (G-7) विश्व की सात प्रमुख उन्नत अर्थव्यवस्थाओं (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा और जापान) का एक अनौपचारिक अंतर-सरकारी मंच है, जो वैश्विक आर्थिक शासन, अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा और ऊर्जा नीतियों को दिशा प्रदान करता है।
G-7 में भारत की बढ़ती रणनीतिक प्रासंगिकता (कारण और प्रभाव)
'ग्लोबल साउथ' के नेतृत्वकर्ता के रूप में: G-7 देश यह स्वीकार कर चुके हैं कि विकासशील देशों की चिंताओं को संबोधित किए बिना वैश्विक समस्याओं का समाधान असंभव है। भारत ने G-7 मंच का उपयोग 'ग्लोबल साउथ' (Global South) की आवाज के रूप में किया है, जहाँ वह ऋण संकट, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा तथा न्यायसंगत जलवायु वित्त (Climate Finance) की मांग को दृढ़ता से उठाता है।
आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण (Supply Chain Resilience): कोविड-19 और भू-राजनीतिक तनावों के पश्चात G-7 देश चीन पर अपनी आर्थिक और तकनीकी निर्भरता को कम करने (De-risking) का प्रयास कर रहे हैं। भारत का विशाल बाजार, कुशल जनसांख्यिकी और 'मेक इन इंडिया' पहल इसे एक विश्वसनीय और पारदर्शी विकल्प बनाते हैं।
तकनीकी नवाचार और 'AI for All': आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उभरती तकनीकों के नियमन पर G-7 राष्ट्रों के मध्य गंभीर विमर्श जारी है। भारत का डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI) और उत्तरदायी AI का मॉडल इसे वैश्विक तकनीकी विमर्श के केंद्र में लाता है।
मेगा कनेक्टिविटी कॉरिडोर: G-7 के समर्थन से भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) जैसी परियोजनाएं भारत के रणनीतिक विस्तार और चीन की 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) को प्रतिसंतुलित करने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं।
भारत के समक्ष उपस्थित कूटनीतिक चुनौतियां
रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) का संतुलन: G-7 देश प्रायः रूस-यूक्रेन संघर्ष जैसे मुद्दों पर कड़े प्रतिबंधों की वकालत करते हैं।
भारत के लिए पश्चिमी देशों के साथ घनिष्ठता बढ़ाते हुए रूस जैसे पारंपरिक रणनीतिक साझेदारों के साथ संतुलन बनाए रखना एक जटिल कूटनीतिक कार्य है। आर्थिक संरक्षणवाद (Economic Protectionism): यद्यपि G-7 देश मुक्त व्यापार के पक्षधर हैं, परंतु यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) जैसी संरक्षणवादी नीतियां भारतीय निर्यातकों के लिए गंभीर बाधाएं उत्पन्न कर सकती हैं।
बिहार के संदर्भ में प्रासंगिकता और लाभ
वैश्विक कौशल भागीदारी (Global Skills Partnership): 2026 के G-7 सम्मेलन में भारत द्वारा प्रस्तावित इस साझेदारी का उद्देश्य विकसित देशों की वृद्ध होती आबादी को भारत के युवा कार्यबल से जोड़ना है।
चूँकि बिहार भारत के सर्वाधिक युवा राज्यों में से एक है, अतः राज्य के कुशल और अर्ध-कुशल कामगारों के लिए अंतर्राष्ट्रीय श्रम बाजार में गतिशीलता के नए अवसर सृजित होंगे। जलवायु वित्तपोषण का स्थानीयकरण: G-7 देशों द्वारा जलवायु परिवर्तन अनुकूलन (Climate Adaptation) हेतु दिए जा रहे वित्तीय और तकनीकी सहयोग का उपयोग बिहार के संदर्भ में कोसी-गंडक बेसिन में बाढ़ प्रबंधन, आपदा-रोधी अवसंरचना निर्माण तथा जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों (Climate-resilient agriculture) को विकसित करने में किया जा सकता है।
आगे की राह (Way Forward)
घरेलू सुधारों को गति: G-7 देशों से उच्च-स्तरीय तकनीकी और रक्षा निवेश आकर्षित करने के लिए भारत को अपनी बौद्धिक संपदा (IPR) व्यवस्था और व्यापार सुगमता (Ease of Doing Business) को और अधिक सुदृढ़ करना होगा।
संबद्धता का विस्तार: भारत को G-7 के साथ अपनी भागीदारी का उपयोग ब्रिक्स (BRICS) और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे गैर-पश्चिमी मंचों में अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिए एक 'भू-राजनीतिक सेतु' के रूप में करना चाहिए।
निष्कर्ष
G-7 मंच पर भारत की उपस्थिति 'नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था' के प्रति उसकी प्रतिबद्धता और 'वसुधैव कुटुम्बकम' के दर्शन का परिचायक है। एक परिपक्व होती शक्ति के रूप में, भारत न केवल वैश्विक उत्तर (Global North) के साथ रणनीतिक संबंध प्रगाढ़ कर रहा है, बल्कि समावेशी विकास और बहुपक्षीय शासन सुधारों की वकालत कर 21वीं सदी के वैश्विक विमर्श को भी सकारात्मक रूप से आकार दे रहा है।
क्या आपको लगता है कि G-7 के साथ बढ़ती वैचारिक घनिष्ठता भविष्य में गुटनिरपेक्षता (Non-alignment) की भारत की पारंपरिक विदेश नीति को पूर्णतः 'बहु-संरेखण' (Multi-alignment) में परिवर्तित कर देगी?
यह विश्लेषण G-7 शिखर सम्मेलन में ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधि के रूप में भारत की उभरती कूटनीतिक भूमिका और बहुध्रुवीय विश्व में इसकी रणनीतिक प्राथमिकताओं को विस्तार से स्पष्ट करता है।