शॉर्ट नोट्सः विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भारत के कृषि हित।
Q. शॉर्ट नोट्सः विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भारत के कृषि हित।
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शॉर्ट नोट्स: विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भारत के कृषि हित
भूमिका
विश्व व्यापार संगठन (WTO) की बहुपक्षीय व्यापार वार्ताओं में कृषि क्षेत्र भारत की कूटनीतिक और आर्थिक रणनीति के केंद्र में स्थित है। भारत के लिए कृषि केवल एक वाणिज्यिक या व्यापारिक गतिविधि नहीं है, बल्कि यह देश की लगभग आधी आबादी की आजीविका और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 के तहत करोड़ों नागरिकों की खाद्य सुरक्षा का मूल आधार है। WTO के कृषि पर समझौते (Agreement on Agriculture - AoA) के ऐतिहासिक प्रावधान विकसित देशों की ओर झुके हुए हैं, जिन्हें विकासशील देशों की वर्तमान सामाजिक-आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप संशोधित कराना भारत का प्रमुख और रणनीतिक लक्ष्य रहा है।
WTO में भारत के प्रमुख कृषि हित एवं चिंताएं
भारत द्वारा WTO मंच (विशेषकर हालिया मंत्रिस्तरीय सम्मेलनों) पर निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं को दृढ़ता से उठाया गया है:
सार्वजनिक खाद्यान्न भंडारण (Public Stockholding - PSH):
भारत न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के माध्यम से किसानों से खाद्यान्न खरीदकर लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) का संचालन करता है।
WTO के नियमों के अनुसार, इस प्रकार की मूल्य समर्थन सब्सिडी 'एम्बर बॉक्स' (Amber Box) के अंतर्गत आती है, जिसकी सीमा कृषि उत्पादन के कुल मूल्य के 10% (De-minimis limit) तक निर्धारित है।
भारत का मुख्य तर्क यह है कि इस 10% सीमा की गणना 1986-88 के संदर्भ मूल्यों (Reference Prices) पर आधारित है, जो वर्तमान मुद्रास्फीति को देखते हुए पूर्णतः अतार्किक है। भारत बाली मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (2013) में प्राप्त 'शांति खंड' (Peace Clause) के स्थान पर इसका एक स्थायी वैधानिक समाधान (Permanent Solution) चाहता है।
विशेष सुरक्षा तंत्र (Special Safeguard Mechanism - SSM):
वैश्विक बाजार में विकसित देशों द्वारा भारी सब्सिडी प्राप्त कृषि उत्पादों के सस्ते डंपिंग (Dumping) या आयात में अचानक वृद्धि होने की स्थिति में, भारत घरेलू किसानों को बचाने के लिए आयात शुल्क (Tariff) बढ़ाने के अधिकार की मांग करता है।
मत्स्य पालन सब्सिडी (Fisheries Subsidies):
'अवैध, गैर-रिपोर्टेड और अनियमित' (IUU) मछली पकड़ने पर वैश्विक प्रतिबंध के समर्थन के साथ-साथ, भारत अपने विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में पारंपरिक और छोटे मछुआरों को दी जाने वाली सब्सिडी के संरक्षण की वकालत करता है।
बिहार के संदर्भ में प्रासंगिकता और प्रभाव
एक कृषि-प्रधान राज्य होने के कारण, WTO की कृषि नीतियां बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं:
खाद्य सुरक्षा और MSP का महत्व: TPDS और खाद्यान्न सुरक्षा जाल का निर्बाध संचालन पटना और बिहार के सभी जिलों में खाद्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने तथा गरीबी उन्मूलन के लिए अत्यंत आवश्यक है। WTO के दबाव में यदि MSP व्यवस्था कमजोर होती है, तो राज्य के 80% से अधिक छोटे एवं सीमांत किसान सीधे तौर पर प्रभावित होंगे।
कृषि निर्यात की संभावनाएं: यदि WTO के मंच पर न्यायसंगत निर्यात नीतियां स्थापित होती हैं, तो राज्य के कृषि उत्पादों—जैसे मखाना, मक्का, और भौगोलिक संकेतक (GI) प्राप्त शाही लीची एवं जर्दालू आम—को वैश्विक बाजार में अत्यधिक प्रतिस्पर्धी बनाया जा सकता है।
आगे की राह (Way Forward)
'ग्रीन बॉक्स' सब्सिडी का अधिकतम उपयोग: भारत को अपने कृषि बजट का एक बड़ा हिस्सा अनुसंधान, अवसंरचना विकास और सिंचाई (जो WTO के 'ग्रीन बॉक्स' में आते हैं और जिन पर कोई सीमा नहीं है) की ओर मोड़ना चाहिए।
समान विचारधारा वाले देशों का गठबंधन: भारत को G-33 और ब्रिक्स (BRICS) जैसे विकासशील देशों के समूहों के साथ मिलकर वैश्विक कृषि व्यापार नियमों के लोकतंत्रीकरण के लिए दबाव बढ़ाना जारी रखना चाहिए।
अंतिम विचार
वैश्विक व्यापार के बदलते प्रतिमानों और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच, भारत को 'ग्लोबल साउथ' (Global South) का सशक्त नेतृत्व करते हुए WTO वार्ताओं में अपने कृषि हितों की हर हाल में रक्षा करनी चाहिए। कृषि नीतियों में स्वायत्तता केवल व्यापारिक घाटे या मुनाफे का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह एक कल्याणकारी राज्य की अपनी जनता के प्रति संवैधानिक प्रतिबद्धता का अभिन्न अंग है।
क्या आप मानते हैं कि WTO में कृषि सब्सिडी से जुड़े विवादों का दीर्घकालिक समाधान खोजने के लिए, विकासशील देशों को प्रत्यक्ष मूल्य समर्थन के बजाय 'स्मार्ट कृषि' (Smart Agriculture) और जलवायु-अनुकूल तकनीकों के विकास पर अपना ध्यान और संसाधन केंद्रित करना चाहिए?