शॉर्ट नोट्स: गिग इकॉनमी (Gig Economy)।

 Q. शॉर्ट नोट्स: गिग इकॉनमी (Gig Economy)।

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गिग अर्थव्यवस्था (Gig Economy) श्रम बाज़ार की एक ऐसी आधुनिक व्यवस्था है, जिसमें पारंपरिक, दीर्घकालिक और पूर्णकालिक रोजगार के स्थान पर अस्थायी, लचीले, और स्वतंत्र अनुबंध आधारित (Contractual/Freelance) कार्य को प्राथमिकता दी जाती है। यह मुख्य रूप से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आधारित है।

हाल ही में नीति आयोग द्वारा जारी 'इंडियाज बूमिंग गिग एंड प्लेटफॉर्म इकॉनमी' (India's Booming Gig and Platform Economy) रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वर्तमान में लगभग 77 लाख श्रमिक इस क्षेत्र से जुड़े हैं, जिनके वर्ष 2029-30 तक बढ़कर 2.35 करोड़ (कुल कार्यबल का 4.1%) होने का अनुमान है।

गिग इकॉनमी के उद्भव और विकास के कारक

  • डिजिटल अवसंरचना का विस्तार: सस्ते इंटरनेट, स्मार्टफोन की व्यापक पहुंच और ऐप-आधारित एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म्स (जैसे- Uber, Zomato, Urban Company) के उदय ने कार्य की प्रकृति को बदल दिया है।

  • कार्य का लचीलापन (Flexibility): यह युवाओं और महिलाओं को कार्य के घंटों (Working hours) और स्थान के चयन में स्वायत्तता प्रदान करता है।

  • औद्योगिक मांग: स्टार्टअप्स और कॉर्पोरेट जगत द्वारा अपनी निश्चित परिचालन लागत (Fixed Operational Cost) को कम करने के लिए प्रोजेक्ट-आधारित 'फ्रीलांसर्स' की नियुक्ति पर जोर दिया जा रहा है।

  • कोविड-19 महामारी का प्रभाव: महामारी के दौरान 'वर्क फ्रॉम होम' और दूरस्थ कार्य (Remote working) की संस्कृति ने गिग इकॉनमी को एक संरचनात्मक गति प्रदान की।

गिग अर्थव्यवस्था से जुड़ी प्रमुख चुनौतियाँ

यद्यपि यह क्षेत्र रोजगार सृजन का एक महत्वपूर्ण इंजन है, लेकिन इसमें कई ढांचागत और विधिक खामियां विद्यमान हैं:

  • विधिक अस्पष्टता और श्रम अधिकार: गिग प्लेटफॉर्म्स श्रमिकों को 'कर्मचारी' (Employees) के बजाय 'स्वतंत्र ठेकेदार' (Independent Contractors) या 'पार्टनर' मानते हैं। इसके परिणामस्वरूप वे न्यूनतम मजदूरी और औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत कानूनी संरक्षण से बाहर हो जाते हैं।

  • सामाजिक सुरक्षा का नितांत अभाव: इन श्रमिकों को स्वास्थ्य बीमा, भविष्य निधि (EPF), मातृत्व लाभ और सवेतन अवकाश (Paid leaves) जैसी बुनियादी सामाजिक सुरक्षा प्राप्त नहीं होती है।

  • एल्गोरिथम आधारित शोषण: कार्य का आवंटन, आय और रेटिंग पूरी तरह से अपारदर्शी एल्गोरिदम (Algorithmic Control) पर निर्भर होते हैं, जिससे आय में भारी अनिश्चितता बनी रहती है।

बिहार के परिप्रेक्ष्य में गिग इकॉनमी की प्रासंगिकता

बिहार जैसे राज्य के लिए, जहाँ तीव्र जनसंख्या वृद्धि और रोजगार के सीमित औद्योगिक अवसर एक बड़ी चुनौती हैं, गिग इकॉनमी 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' (जनसांख्यिकीय लाभांश) के दोहन का एक त्वरित माध्यम बन सकती है। श्रम पलायन (Labour Migration) को रोकने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि ई-कॉमर्स, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क, टेलीमेडिसिन और कृषि-संबद्ध डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का विकेंद्रीकरण किया जाए।

राज्य के आर्थिक नीति-निर्माताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि डिजिटल रोजगार और प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था का यह विस्तार केवल चंद बड़े शहरी केंद्रों तक ही सीमित न रहे, बल्कि बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ करते हुए इसका सुचारू संचालन पटना और सभी बिहार के जिलों में समान रूप से सुनिश्चित किया जाए। इससे स्थानीय स्तर पर सूक्ष्म-रोजगार (Micro-entrepreneurship) को बढ़ावा मिलेगा और क्षेत्रीय आर्थिक विषमता कम होगी।

आगे की राह

गिग अर्थव्यवस्था 21वीं सदी के वैश्विक और भारतीय श्रम बाज़ार का एक अपरिहार्य सत्य है। इस क्षेत्र को टिकाऊ बनाने के लिए नवाचार और श्रम कल्याण के बीच संतुलन स्थापित करना होगा।

इस दिशा में केंद्र सरकार द्वारा पारित सामाजिक सुरक्षा संहिता (Code on Social Security), 2020 के प्रावधानों को त्वरित गति से लागू किया जाना चाहिए, जो गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को पहली बार वैधानिक मान्यता देता है। इसके अतिरिक्त, 'ई-श्रम पोर्टल' (e-Shram Portal) पर शत-प्रतिशत पंजीकरण सुनिश्चित करने के साथ-साथ, राजस्थान सरकार द्वारा हाल ही में पेश किए गए 'गिग वर्कर्स (पंजीकरण और कल्याण) अधिनियम' की तर्ज पर अन्य राज्यों (विशेषकर बिहार) को भी एक समर्पित कल्याण कोष और संस्थागत नियामक ढांचा तैयार करना चाहिए। इससे आर्थिक विकास के साथ-साथ समावेशी विकास (Inclusive Development) का लक्ष्य भी साकार होगा।

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