शॉर्ट नोट्सः मौद्रिक नीति समिति (MPC)।
Q. शॉर्ट नोट्सः मौद्रिक नीति समिति (MPC)।
Ans -
मूल्य स्थिरता को बनाए रखने और आर्थिक विकास की गति को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से, भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 (वित्त अधिनियम 2016 द्वारा संशोधित) की धारा 45ZB के तहत मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee - MPC) का गठन किया गया था। उर्जित पटेल समिति की सिफारिशों पर आधारित यह एक वैधानिक (Statutory) निकाय है, जो भारत में पारदर्शी और जवाबदेह लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Flexible Inflation Targeting - FIT) ढांचे का संचालन करता है।
मौद्रिक नीति समिति (MPC) की संरचना और कार्यप्रणाली
MPC एक 6 सदस्यीय समिति है, जिसे नीतिगत निर्णय लेने में स्वायत्तता और विशेषज्ञता दोनों सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है:
संगठनात्मक ढांचा: इसमें 3 सदस्य रिज़र्व बैंक से (RBI गवर्नर पदेन अध्यक्ष, एक डिप्टी गवर्नर, और केंद्रीय बोर्ड द्वारा नामित एक अधिकारी) तथा 3 स्वतंत्र आर्थिक विशेषज्ञ भारत सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते हैं (कार्यकाल: 4 वर्ष, पुनर्नियुक्ति का पात्र नहीं)।
निर्णय प्रक्रिया: वर्ष में कम से कम चार बार इसकी बैठक अनिवार्य है। सभी निर्णय उपस्थित सदस्यों के बहुमत से लिए जाते हैं। टाई (Tie) होने की स्थिति में RBI गवर्नर को निर्णायक मत (Casting Vote) का अधिकार प्राप्त है।
पारदर्शिता: निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक बैठक के 14वें दिन मिनट्स (Minutes) प्रकाशित किए जाते हैं।
मुख्य कार्य और उद्देश्य
मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण: केंद्र सरकार द्वारा RBI के परामर्श से प्रत्येक पाँच वर्ष में मुद्रास्फीति का लक्ष्य निर्धारित किया जाता है। वर्तमान में यह 4% (±2% के बैंड के साथ, यानी 2% से 6% के बीच) है।
नीतिगत दरों का निर्धारण: विकास के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए, तरलता (Liquidity) को प्रबंधित करने के लिए रेपो दर (Repo Rate) जैसी प्रमुख ब्याज दरों का निर्धारण करना।
जवाबदेही: यदि मुद्रास्फीति लगातार तीन तिमाहियों तक निर्धारित लक्ष्य (2-6%) से बाहर रहती है, तो MPC को केंद्र सरकार को रिपोर्ट सौंपकर इसके कारण और सुधारात्मक उपाय बताने होते हैं।
बिहार के परिप्रेक्ष्य में मौद्रिक नीति का प्रभाव
यद्यपि मौद्रिक नीति का स्वरूप राष्ट्रीय होता है, किंतु इसके निर्णय राज्य-स्तरीय अर्थव्यवस्था, विशेषकर बिहार की ग्रामीण और असंगठित अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डालते हैं:
पूंजी प्रवाह और वित्तीय समावेशन: जब MPC आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए 'उदार रुख' (Accommodative Stance) अपनाते हुए ब्याज दरों में कटौती करती है, तो ऋण सस्ता हो जाता है। इससे पटना और सभी बिहार के जिलों में कृषि, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs), तथा पशुपालन क्षेत्रों में ऋण प्रवाह सुगम होता है, जो स्थानीय रोजगार सृजन के लिए महत्वपूर्ण है।
गरीबी और क्रय शक्ति पर प्रभाव: बिहार जैसे राज्य में एक बड़ी आबादी निम्न आय वर्ग और असंगठित क्षेत्र से है। उच्च मुद्रास्फीति को 'सबसे खराब कर' (Worst Tax) माना जाता है क्योंकि यह गरीबों की क्रय शक्ति को निगल जाती है। MPC द्वारा मुद्रास्फीति को 4% के लक्ष्य के भीतर रखना बिहार में खाद्य सुरक्षा और जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
ढांचागत निवेश: कम ब्याज दरें राज्य में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए संस्थागत वित्तपोषण को सस्ता बनाती हैं, जिससे अवसंरचनात्मक विकास को गति मिलती है।
आगे की राह
अपनी स्थापना के बाद से, मौद्रिक नीति समिति ने कोविड-19 महामारी के झटकों और भू-राजनीतिक तनावों (रूस-यूक्रेन संकट) के दौरान उत्पन्न 'स्टैगफ्लेशन' (Stagflation) के खतरे से भारतीय अर्थव्यवस्था को बचाने में एक प्रभावी ढाल का कार्य किया है।
आगे की राह के रूप में, MPC को भविष्योन्मुखी दृष्टिकोण अपनाते हुए आपूर्ति-श्रृंखला की बाधाओं के कारण उत्पन्न होने वाली कोर मुद्रास्फीति (Core Inflation) और आर्थिक विकास (Growth) के मध्य एक सूक्ष्म और व्यावहारिक संतुलन बनाए रखना होगा। इसके साथ ही, केंद्र और राज्य सरकारों की राजकोषीय नीति (Fiscal Policy) तथा RBI की मौद्रिक नीति में बेहतर समन्वय होना चाहिए, ताकि भारत और बिहार के समावेशी विकास का लक्ष्य बिना किसी बाधा के प्राप्त किया जा सके।