समान नागरिक संहिता (UCC) क्या है? भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में इसे लागू करने के पक्ष और विपक्ष में तर्क दें।
Q. समान नागरिक संहिता (UCC) क्या है? भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में इसे लागू करने के पक्ष और विपक्ष में तर्क दें।
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समान नागरिक संहिता (UCC): अवधारणा एवं भारत जैसे बहुलवादी राष्ट्र में इसके विविध आयाम
भारत के संविधान के भाग IV में वर्णित राज्य के नीति निदेशक तत्वों (DPSP) के अंतर्गत अनुच्छेद 44 यह उद्घोषणा करता है कि राज्य भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code - UCC) सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। हाल के वर्षों में, उत्तराखंड राज्य द्वारा UCC विधेयक पारित करने और भारत के 22वें विधि आयोग द्वारा इस विषय पर नए सिरे से परामर्श प्रक्रिया आरंभ करने के कारण यह संवैधानिक प्रावधान राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ गया है।
समान नागरिक संहिता (UCC) क्या है?
समान नागरिक संहिता का तात्पर्य एक ऐसी एकीकृत कानूनी व्यवस्था से है, जो देश के सभी नागरिकों पर उनके धर्म, लिंग, जाति या संप्रदाय से निरपेक्ष रूप से समान रूप से लागू होती है।
दायरा (Scope): इसके अंतर्गत मुख्य रूप से व्यक्तिगत या सिविल मामले आते हैं, जिनमें विवाह, विवाह-विच्छेद (तलाक), भरण-पोषण (Alimony), विरासत (Inheritance), दत्तक ग्रहण (Adoption) और संपत्ति का उत्तराधिकार शामिल है।
वर्तमान स्थिति: वर्तमान में भारत में आपराधिक कानून (CrPC, IPC/BNS) सभी के लिए समान हैं, परंतु सिविल मामले अलग-अलग धार्मिक आस्थाओं पर आधारित 'पर्सनल लॉ' (जैसे- हिंदू विवाह अधिनियम 1955, मुस्लिम पर्सनल लॉ शरीयत एप्लीकेशन एक्ट 1937, भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम 1872) द्वारा निर्देशित होते हैं।
UCC लागू करने के पक्ष में तर्क (सकारात्मक आयाम)
UCC को लागू करने के समर्थकों द्वारा मुख्य रूप से संवैधानिक समानता और राष्ट्रीय एकीकरण को आधार बनाया जाता है:
लैंगिक न्याय और समानता की स्थापना
वर्तमान में कई धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों में महिलाओं को संपत्ति और विवाह के मामलों में पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त नहीं हैं। UCC लागू होने से अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध) का वास्तविक क्रियान्वयन हो सकेगा। शाह बानो वाद (1985) और सायरा बानो वाद (2017) में सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर बल दिया है ताकि महिलाओं को रूढ़िवादी प्रथाओं से मुक्ति मिल सके।
बिहार के संदर्भ में प्रभाव: यदि विरासत और संपत्ति के अधिकारों में एकरूपता आती है, तो पटना और बिहार के सभी जिलों में महिला सशक्तिकरण को अभूतपूर्व गति मिलेगी। राज्य सरकार की 'जीविका' और महिला उद्यमिता जैसी योजनाओं का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब महिलाओं के पास भूमि और संपत्ति का वैधानिक स्वामित्व होगा, जो वर्तमान में पितृसत्तात्मक पर्सनल लॉ के कारण बाधित होता है।
राष्ट्रीय एकीकरण और धर्मनिरपेक्षता
एस.आर. बोम्मई वाद (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने पंथनिरपेक्षता को संविधान का 'मूल ढांचा' (Basic Structure) घोषित किया है। एक पंथनिरपेक्ष राष्ट्र में राज्य का धर्म से कोई सीधा जुड़ाव नहीं होना चाहिए। कानून की दृष्टि में सभी नागरिक एक समान हैं, इसलिए नागरिक अधिकारों का निर्धारण धर्म के आधार पर करना धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के प्रतिकूल है। एक देश-एक कानून की व्यवस्था राष्ट्रीय अखंडता को सुदृढ़ करेगी।
कानूनी जटिलताओं का सरलीकरण
वर्तमान में न्यायपालिका को विभिन्न धार्मिक कानूनों की व्याख्या करने में अत्यधिक समय और संसाधनों का व्यय करना पड़ता है। एक एकीकृत संहिता (Codified Law) होने से कानूनी प्रक्रियाएं सरल होंगी और न्यायालयों पर मुकदमों का भारी बोझ (Pendency of Cases) कम होगा।
UCC लागू करने के विपक्ष में तर्क एवं चुनौतियां
भारत जैसी गहन सांस्कृतिक, भाषाई और धार्मिक विविधता वाले राष्ट्र में UCC को लागू करना एक अत्यंत जटिल प्रक्रिया है:
धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से संभावित टकराव
संविधान का अनुच्छेद 25 (अंतःकरण की और धर्म की अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता) अल्पसंख्यकों को अपने धार्मिक विश्वासों के अनुसार जीवन जीने की गारंटी देते हैं। आलोचकों का तर्क है कि UCC लागू करने से राज्य धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करेगा, जिससे अल्पसंख्यक समुदायों में अपनी पहचान खोने की असुरक्षा उत्पन्न हो सकती है।
बहुलवाद और सांस्कृतिक विविधता पर आघात
भारत की पहचान इसकी 'विविधता में एकता' है। 21वें विधि आयोग (2018) ने अपने परामर्श पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया था कि "समान नागरिक संहिता इस स्तर पर न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय है।" आयोग का मानना था कि सांस्कृतिक विविधता के साथ समझौता नहीं किया जा सकता और एकरूपता (Uniformity) अपने आप में हमेशा अच्छी नहीं होती।
जनजातीय अधिकारों और रूढ़िगत कानूनों (Customary Laws) पर प्रभाव
संविधान की छठी अनुसूची और अनुच्छेद 371 (A से I) के अंतर्गत पूर्वोत्तर राज्यों और विभिन्न जनजातीय समुदायों को उनके रूढ़िगत कानूनों और सामाजिक प्रथाओं के संरक्षण हेतु विशेष अधिकार प्रदान किए गए हैं। एक थोपी गई समान संहिता आदिवासी समुदायों के पारंपरिक सामाजिक ताने-बाने को नष्ट कर सकती है, जो प्रशासनिक दृष्टिकोण से घर्षण का कारण बनेगा।
आगे की राह (Way Forward)
संविधान सभा की बहसों के दौरान, डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने समान नागरिक संहिता को 'वांछनीय' अवश्य माना था, परंतु उन्होंने इसे तब तक स्वैच्छिक रखने का समर्थन किया था जब तक कि समाज मानसिक रूप से इसे स्वीकार करने के लिए तैयार न हो जाए।
इस दिशा में निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:
'बॉटम-अप' (Bottom-up) दृष्टिकोण: संपूर्ण देश पर अचानक एक कानून थोपने के बजाय, पहले सभी धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद कुरीतियों (जैसे- बाल विवाह, बहुविवाह, असमान उत्तराधिकार) को एक-एक करके संशोधित और संहिताबद्ध (Codify) किया जाना चाहिए।
लैंगिक समानता को प्राथमिकता: विधि निर्माताओं का मुख्य उद्देश्य केवल कानूनों में 'एकरूपता' (Uniformity) लाना नहीं होना चाहिए, बल्कि सभी व्यक्तिगत कानूनों को मानवाधिकारों और 'न्याय' (Justice) की कसौटी पर खरा बनाना होना चाहिए।
व्यापक आम सहमति: सरकार को धार्मिक गुरुओं, कानूनी विशेषज्ञों, नागरिक समाज और जनजातीय परिषदों के साथ एक व्यापक, पारदर्शी और सतत संवाद स्थापित करना चाहिए।
भारत का लोकतांत्रिक और संवैधानिक ढांचा इतना परिपक्व है कि वह विविधता का सम्मान करते हुए भी न्यायोचित समानता स्थापित कर सकता है। एक आदर्श समान नागरिक संहिता वह होगी जो बहुसंख्यकवाद की छाया से मुक्त हो और जो प्रत्येक नागरिक, विशेषकर महिलाओं को बिना उनकी धार्मिक पहचान मिटाए, समान अधिकार प्रदान करे।