'वन नेशन, वन इलेक्शन' (One Nation, One Election) की अवधारणा, इसके फायदे और लागू करने में आने वाली चुनौतियों का विश्लेषण करें।

 Q.  'वन नेशन, वन इलेक्शन' (One Nation, One Election) की अवधारणा, इसके फायदे और लागू करने में आने वाली चुनौतियों का विश्लेषण करें।

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'वन नेशन, वन इलेक्शन' (एक देश, एक चुनाव): अवधारणा, लाभ और चुनौतियां

भारतीय निर्वाचन प्रणाली विश्व की सबसे विशाल और जीवंत लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में से एक है। 'वन नेशन, वन इलेक्शन' (ONOE) का विचार भारत में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ संपन्न कराने की एक महत्वाकांक्षी सुधार पहल है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह कोई नई अवधारणा नहीं है; वर्ष 1952, 1957, 1962 और 1967 में देश में एक साथ चुनाव सफलतापूर्वक आयोजित किए गए थे। हालांकि, राज्यों में अनुच्छेद 356 के बार-बार प्रयोग और विधानसभाओं के समय-पूर्व भंग होने के कारण यह चक्र टूट गया।

हाल ही में पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित उच्च स्तरीय समिति (HLC) ने इस दिशा में अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपकर इस विमर्श को नीतिगत पटल पर पुनः स्थापित किया है।

'वन नेशन, वन इलेक्शन' की अवधारणा

इस अवधारणा का मूल उद्देश्य मतदाताओं को एक ही समय अवधि में केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के लिए मतदान करने की सुविधा प्रदान करना है। कोविंद समिति की सिफारिशों के अनुसार, इसे दो चरणों में लागू किया जा सकता है:

  • प्रथम चरण: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ संपन्न कराना।

  • द्वितीय चरण: पहले चरण के 100 दिनों के भीतर पंचायतों और नगर पालिकाओं (स्थानीय निकायों) के चुनाव आयोजित करना।

इस व्यवस्था को लागू करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 83 (संसद की अवधि), अनुच्छेद 85 (संसद का विघटन), अनुच्छेद 172 (राज्य विधानसभाओं की अवधि) और अनुच्छेद 174 (राज्य विधानसभाओं का विघटन) सहित जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में महत्वपूर्ण संशोधनों की आवश्यकता होगी।

संभावित लाभ और सकारात्मक पक्ष

एक देश-एक चुनाव के समर्थन में नीति आयोग और विधि आयोग ने कई ठोस तर्क प्रस्तुत किए हैं:

  • वित्तीय संसाधनों का अनुकूलन: भारत में चुनाव अत्यधिक खर्चीले हो गए हैं। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (CMS) के अनुसार, 2019 के लोकसभा चुनाव में लगभग 60,000 करोड़ रुपये खर्च हुए। एक साथ चुनाव कराने से सरकारी खजाने और राजनीतिक दलों, दोनों के व्यय में भारी कमी आएगी।

  • नीतिगत पंगुता (Policy Paralysis) की समाप्ति: बार-बार चुनाव होने से आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) लागू रहती है, जिससे नई विकास योजनाएं बाधित होती हैं। बिहार के संदर्भ में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है; एक विकासशील राज्य होने के नाते, बिहार में गरीबी उन्मूलन, कोसी-गंडक बेसिन में आधारभूत संरचना विकास और औद्योगिक निवेश जैसी निरंतर चलने वाली परियोजनाओं को चुनावी आचार संहिता के कारण अनावश्यक देरी का सामना करना पड़ता है।

  • प्रशासनिक और सुरक्षा दक्षता: चुनावों के दौरान केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) की भारी तैनाती होती है। साथ ही, शिक्षकों और सरकारी कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी में लगाने से शिक्षा व्यवस्था और सामान्य प्रशासन महीनों तक बाधित रहता है।

  • सामाजिक ध्रुवीकरण पर लगाम: निरंतर चुनावी माहौल में राजनीतिक दलों द्वारा अक्सर जातिगत और सांप्रदायिक भावनाओं को उभारा जाता है (विशेषकर बिहार और उत्तर प्रदेश के चुनावी परिदृश्य में)। एक साथ चुनाव इस स्थायी चुनावी मोड से मुक्ति दिला सकते हैं।

  • मतदाता थकान (Voter Fatigue) में कमी: बार-बार मतदान केंद्रों पर जाने से मतदाताओं में उदासीनता आती है। एकमुश्त मतदान से मतदान प्रतिशत (Voter Turnout) में वृद्धि होने की प्रबल संभावना है।

क्रियान्वयन में प्रमुख चुनौतियां

इस सुधार को धरातल पर उतारने में कई संवैधानिक, राजनीतिक और लॉजिस्टिक बाधाएं मौजूद हैं:

  • संघीय ढांचे (Federal Structure) पर प्रभाव: आलोचकों का तर्क है कि एक साथ चुनाव होने से राष्ट्रीय मुद्दे क्षेत्रीय मुद्दों पर हावी हो सकते हैं। इससे राष्ट्रीय पार्टियों को अनुचित लाभ मिल सकता है और क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व पर संकट उत्पन्न हो सकता है, जो संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) के खिलाफ माना जा सकता है।

  • असामयिक विघटन (Premature Dissolution) की समस्या: यदि कोई सरकार 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा करने से पहले ही अल्पमत में आ जाए (त्रिशंकु विधानसभा), तो क्या होगा? क्या पूरे देश में दोबारा चुनाव होंगे, या उस राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाएगा? यह लोकतांत्रिक सिद्धांतों के लिए एक बड़ी चुनौती है।

  • लॉजिस्टिक और अवसंरचनात्मक दबाव: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के अनुमानों के अनुसार, एक साथ चुनाव कराने के लिए लगभग 30 लाख EVM (VVPAT के साथ) की आवश्यकता होगी। इसके निर्माण और सुरक्षित भंडारण के लिए भारी प्रारंभिक निवेश और लॉजिस्टिक प्रबंधन की दरकार होगी।

  • लोकतांत्रिक जवाबदेही में कमी: बार-बार होने वाले चुनाव राजनेताओं को निरंतर जनता के प्रति जवाबदेह बनाए रखते हैं। चुनावों के बीच 5 साल का अंतराल इस सतत जवाबदेही को कम कर सकता है।

आगे की राह (Way Forward)

इस व्यापक चुनावी सुधार को लागू करने के लिए एक संतुलित और क्रमिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है:

  • रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव (Constructive Vote of No-Confidence): जर्मनी की तर्ज पर यह व्यवस्था की जा सकती है कि जब तक विपक्ष सदन में किसी वैकल्पिक सरकार का गठन सिद्ध न कर दे, तब तक मौजूदा सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित न किया जाए।

  • नियत अवधि की विधानसभाएं: शेष बचे कार्यकाल (Remainder of the term) के लिए चुनाव कराने का प्रावधान किया जा सकता है। यदि कोई विधानसभा बीच में भंग होती है, तो नए चुनाव केवल बचे हुए समय के लिए हों, ताकि अगला चुनाव राष्ट्रीय चक्र के साथ ही हो।

  • व्यापक राजनीतिक सर्वसम्मति: चूंकि इसके लिए संविधान संशोधनों (कम से कम आधे राज्यों के अनुसमर्थन के साथ) की आवश्यकता होगी, इसलिए केंद्र सरकार को सभी क्षेत्रीय दलों और हितधारकों के साथ एक 'सार्थक संवाद' स्थापित करना चाहिए।

भारत का लोकतांत्रिक ढांचा अत्यंत लचीला और परिपक्व है। 'वन नेशन, वन इलेक्शन' मात्र एक चुनावी प्रक्रिया का तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि यह सुशासन और विकास को गति देने का एक साधन बन सकता है। इसे लागू करने के लिए 'सहकारी संघवाद' (Cooperative Federalism) की भावना को सर्वोपरि रखते हुए, संवैधानिक मर्यादाओं और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के बीच एक सूक्ष्म संतुलन स्थापित करना अनिवार्य है।

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