जलवायु परिवर्तन के कारण चक्रवातों की आवृत्ति और तीव्रता में हो रही वृद्धि का तटीय क्षेत्रों पर प्रभाव बताएं।
Q. जलवायु परिवर्तन के कारण चक्रवातों की आवृत्ति और तीव्रता में हो रही वृद्धि का तटीय क्षेत्रों पर प्रभाव बताएं।
अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC) की छठी आकलन रिपोर्ट (AR6) ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि वैश्विक तापन (Global Warming) के कारण महासागरों के तापमान में अभूतपूर्व वृद्धि हो रही है। इस ऊष्मीय ऊर्जा के संचय के परिणामस्वरूप बंगाल की खाड़ी और अरब सागर, दोनों ही क्षेत्रों में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों (Tropical Cyclones) की आवृत्ति, तीव्रता और स्थायित्व में चिंताजनक वृद्धि दर्ज की गई है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि हाल के दशकों में 'अत्यंत गंभीर चक्रवाती तूफानों' (Extremely Severe Cyclonic Storms) का अनुपात बढ़ा है।
जलवायु परिवर्तन और चक्रवातों की बढ़ती तीव्रता के मुख्य कारण
समुद्री सतह के तापमान (SST) में वृद्धि: चक्रवातों के निर्माण के लिए 26.5°C से अधिक तापमान आदर्श माना जाता है। जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्री सतह का तापमान लगातार इस सीमा को पार कर रहा है, जो चक्रवातों को अतिरिक्त गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) प्रदान करता है।
समुद्री जलस्तर में वृद्धि (Sea Level Rise): पिघलते ग्लेशियरों के कारण समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, जिससे चक्रवातों के दौरान उठने वाली तूफानी लहरें (Storm Surges) अधिक ऊँची और विनाशकारी हो गई हैं।
महासागरीय अम्लीकरण (Ocean Acidification): यह समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को कमजोर करता है, जिससे प्रवाल भित्तियों (Coral Reefs) जैसे प्राकृतिक तटीय अवरोध नष्ट हो रहे हैं।
तटीय क्षेत्रों पर प्रभाव
चक्रवातों की बढ़ती मारक क्षमता तटीय राज्यों के लिए बहुआयामी संकट उत्पन्न कर रही है:
1. आर्थिक एवं अवसंरचनात्मक विनाश
बुनियादी ढांचे की क्षति: तेज हवाओं और समुद्री लहरों के कारण बंदरगाह, पावर ग्रिड, तटीय राजमार्ग और संचार नेटवर्क बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाते हैं।
आर्थिक झटके: विश्व बैंक के अनुसार, प्राकृतिक आपदाओं के कारण भारत को प्रतिवर्ष अरबों डॉलर का नुकसान होता है, जिसमें चक्रवातों की बड़ी हिस्सेदारी है।
2. कृषि एवं पर्यावरणीय प्रभाव
खारे पानी का प्रवेश (Saltwater Intrusion): तूफानी लहरों के कारण समुद्र का खारा पानी तटीय कृषि भूमि और मीठे पानी के जलभृतों (Aquifers) में प्रवेश कर जाता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता दीर्घकाल के लिए समाप्त हो जाती है।
तटीय अपरदन (Coastal Erosion): तीव्र लहरें तटरेखा को काटती हैं, जिससे मैंग्रोव वनों और तटीय जैव विविधता का क्षरण होता है।
3. सामाजिक एवं जनसांख्यिकीय संकट
जलवायु शरणार्थी (Climate Refugees): बार-बार आने वाले चक्रवातों के कारण तटीय समुदायों (विशेषकर मछुआरों) को अपना मूल स्थान छोड़ने के लिए विवश होना पड़ता है, जिससे शहरी क्षेत्रों पर जनसांख्यिकीय दबाव बढ़ता है।
स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां: जलजमाव के कारण हैजा, टाइफाइड और डेंगू जैसी जलजनित एवं कीटजनित बीमारियों का प्रकोप तेज हो जाता है।
बिहार के संदर्भ में परोक्ष प्रभाव
यद्यपि बिहार एक भू-आबद्ध (Landlocked) राज्य है, तथापि बंगाल की खाड़ी में उठने वाले तीव्र चक्रवातों (जैसे- यास, अम्फान) के अवशिष्ट प्रभाव (Remnant Effects) राज्य के मौसम तंत्र को प्रत्यक्ष रूप से बाधित करते हैं। चक्रवातीय दबाव के कारण पटना और बिहार के सभी जिलों में बेमौसम और अत्यधिक भारी वर्षा होती है। इससे न केवल शहरी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है, बल्कि रबी और खरीफ की खड़ी फसलों को भारी नुकसान पहुँचता है, जो राज्य की कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रहार है।
आगे की राह (Way Forward)
इस बढ़ती जलवायु चुनौती से निपटने के लिए एक सक्रिय और बहुआयामी आपदा प्रबंधन रणनीति की आवश्यकता है:
प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (EWS) का सुदृढ़ीकरण: INCOIS और IMD के सहयोग से सटीक और स्थान-विशिष्ट (Location-specific) पूर्वानुमान प्रणाली को अंतिम छोर (Last-mile connectivity) तक पहुँचाना।
प्रकृति-आधारित समाधान (Nature-based Solutions): केंद्र सरकार की मिष्टी (MISHTI) योजना के तहत तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव वनों का सघन रोपण, जो प्राकृतिक 'शॉक एब्जॉर्बर' के रूप में कार्य करते हैं।
जलवायु-अनुकूल अवसंरचना: तटीय नियमन क्षेत्र (CRZ) के दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन और CDRI (Coalition for Disaster Resilient Infrastructure) के मानकों के अनुरूप निर्माण कार्य सुनिश्चित करना।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के दिशा-निर्देशों और सेंडाई फ्रेमवर्क (Sendai Framework) के लक्ष्यों को एकीकृत करके ही हम तटीय और अंतर्देशीय क्षेत्रों को जलवायु परिवर्तन के इस बढ़ते खतरे से सुरक्षित कर सकते हैं। आपदा राहत से अधिक 'आपदा न्यूनीकरण' (Disaster Mitigation) पर निवेश वर्तमान समय की प्रशासनिक प्राथमिकता होनी चाहिए।