हिमालयी क्षेत्र में बार-बार आने वाले भूकंपों और भूस्खलन के भूवैज्ञानिक कारणों की विवेचना करें।

 Q. हिमालयी क्षेत्र में बार-बार आने वाले भूकंपों और भूस्खलन के भूवैज्ञानिक कारणों की विवेचना करें।

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भारतीय उपमहाद्वीप का उत्तरी छोर, हिमालय, विश्व की सबसे नवीन और भूगर्भीय रूप से अस्थिर पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के आंकड़ों के अनुसार, भारत का लगभग 59% भूभाग भूकंपीय रूप से सक्रिय है, जिसमें संपूर्ण हिमालयी बेल्ट भूकंपीय ज़ोन IV और V (अति उच्च जोखिम वाले क्षेत्र) के अंतर्गत आती है। हाल के वर्षों में जोशीमठ भू-धंसाव, सिक्किम में तीस्ता नदी में आई अचानक बाढ़ (GLOF) और हिमाचल प्रदेश में विनाशकारी भूस्खलन जैसी घटनाएं इस क्षेत्र की तीव्र भूवैज्ञानिक संवेदनशीलता को स्पष्ट रूप से प्रमाणित करती हैं।

हिमालयी क्षेत्र में भूकंप के प्रमुख भूवैज्ञानिक कारण

हिमालय में भूकंपीय गतिविधियों की उच्च आवृत्ति के पीछे मुख्य रूप से विवर्तनिकी (Tectonic) प्रक्रियाएं उत्तरदायी हैं:

  • प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) का निरंतर प्रभाव: हिमालय की उत्पत्ति भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के अभिसरण (Convergence) का परिणाम है। भारतीय प्लेट लगभग 5 सेंटीमीटर प्रति वर्ष की दर से यूरेशियन प्लेट के नीचे खिसक रही है, जिससे इस क्षेत्र में भारी मात्रा में भूगर्भीय तनाव (Geological Strain) उत्पन्न होता है।

  • प्रमुख भ्रंश रेखाओं (Fault Lines) की उपस्थिति: भूवैज्ञानिक दबाव के कारण हिमालयी क्षेत्र कई प्रमुख फॉल्ट लाइनों से विभक्त है, जैसे- मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT), मेन बाउंड्री थ्रस्ट (MBT) और हिमालयन फ्रंटल थ्रस्ट (HFT)

  • प्रत्यास्थ प्रतिक्षेप (Elastic Rebound): भ्रंश रेखाओं के पास ऊर्जा का निरंतर संचय होता है। जब यह ऊर्जा चट्टानों की घर्षण और लचीलेपन की सीमा को पार कर जाती है, तो चट्टानें टूटती हैं और संचित ऊर्जा अचानक भूकंपीय तरंगों के रूप में मुक्त होती है।

भूस्खलन के प्रमुख भूवैज्ञानिक एवं संरचनात्मक कारण

भूस्खलन के लिए हिमालय की भूवैज्ञानिक संरचना और भौतिक भूगोल समान रूप से उत्तरदायी हैं:

  • चट्टानों की कमजोर प्रकृति: हिमालय एक नवीन वलित पर्वत (Young Fold Mountain) है। इसका निर्माण मुख्य रूप से अवसादी (Sedimentary) और अत्यधिक विक्षुब्ध कायांतरित चट्टानों से हुआ है। ये चट्टानें अभी भी संघनन (Consolidation) की प्रक्रिया में हैं, अत्यधिक भुरभुरी हैं और इनमें भ्रंश (Joints/Fractures) की अधिकता है।

  • तीव्र ढाल (Steep Gradient) और गुरुत्वाकर्षण: हिमालय की घाटियां अत्यधिक गहरी और ढलान तीव्र हैं। जब वर्षा या बर्फ पिघलने के कारण मिट्टी और चट्टानों के बीच जल का प्रवेश होता है, तो उनका 'शियर स्ट्रेस' (Shear Strength) कम हो जाता है, जिससे गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में भारी भूस्खलन होता है।

  • भूकंप-जनित भूस्खलन (Seismic Triggering): बार-बार आने वाले छोटे-बड़े भूकंप हिमालय के ढलानों की संरचनात्मक अखंडता (Structural Integrity) को कमजोर कर देते हैं, जिससे ढलानें अस्थिर हो जाती हैं और बिना भारी वर्षा के भी भूस्खलन की घटनाएं घटित होती हैं।

क्षेत्रीय प्रभाव एवं बहुआयामी चुनौतियां

हिमालयी क्षेत्र की भूवैज्ञानिक अस्थिरता का प्रभाव केवल पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह निचले मैदानी इलाकों के लिए भी गंभीर संकट उत्पन्न करता है:

  • मैदानी क्षेत्रों पर व्यापक प्रभाव: हिमालय में उत्पन्न होने वाले भूकंपों की ऊर्जा गंगा के जलोढ़ मैदानों में गंभीर संरचनात्मक खतरे (Liquefaction) उत्पन्न करती है। इसका सीधा और विनाशकारी प्रभाव पटना और बिहार के सभी जिलों पर पड़ता है, जो उच्च भूकंपीय जोखिम वाले क्षेत्रों में स्थित हैं। इसके अतिरिक्त, हिमालय में भूस्खलन के कारण नदियों के मार्ग अवरुद्ध होने से बनी कृत्रिम झीलों (Landslide Dammed Lakes) के अचानक टूटने से इन मैदानी जिलों में प्रलयंकारी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है।

  • मानवजनित उत्प्रेरक (Anthropogenic Catalysts): यद्यपि मूल कारण भूवैज्ञानिक हैं, परंतु अनियोजित शहरीकरण, बड़े जलविद्युत परियोजनाओं के लिए पहाड़ों में ब्लास्टिंग (जैसे- चारधाम मार्ग या तपोवन परियोजना) और वनों की कटाई ने ढलानों की प्राकृतिक जल-धारण क्षमता और स्थिरता को क्षीण कर दिया है।

आगे की राह

हिमालय की भूवैज्ञानिक वास्तविकताओं और विवर्तनिक गतिविधियों को रोका नहीं जा सकता, परंतु उनके प्रभावों को एक वैज्ञानिक और संस्थागत दृष्टिकोण से न्यून अवश्य किया जा सकता है:

  • सूक्ष्म-भूकंपीय ज़ोनिंग (Micro-Seismic Zonation): NDMA के दिशा-निर्देशों के अनुरूप पर्वतीय और मैदानी दोनों क्षेत्रों का वार्ड-स्तरीय भूवैज्ञानिक और सुभेद्यता मानचित्रण (Vulnerability Mapping) किया जाना चाहिए।

  • धारणीय अवसंरचना विकास: द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) और पर्यावरण विशेषज्ञों की सिफारिशों के आधार पर हिमालयी क्षेत्रों की 'वहन क्षमता' (Carrying Capacity) का कठोर वैज्ञानिक आकलन किए बिना किसी भी वृहद निर्माण को स्वीकृति नहीं दी जानी चाहिए।

  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (EWS): भूस्खलन और भूकंप के लिए इसरो (ISRO) के उपग्रह डेटा (SAR Interferometry) और सेंडाई फ्रेमवर्क (Sendai Framework for Disaster Risk Reduction) के लक्ष्यों को एकीकृत करते हुए रीयल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम स्थापित करना आवश्यक है।

विकास और पारिस्थितिकी के मध्य एक सामंजस्यपूर्ण संतुलन स्थापित करना ही वर्तमान की सबसे बड़ी आवश्यकता है। सतत विकास लक्ष्य (SDG 11 - संधारणीय शहर और समुदाय) तथा SDG 13 (जलवायु कार्रवाई) को केंद्र में रखकर ही हम इस अति-संवेदनशील तंत्र को संरक्षित कर सकते हैं और 'आपदा-मुक्त भारत 2047' के विजन को यथार्थ में परिवर्तित कर सकते हैं।

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