भारत में जल संकट के कारणों का विश्लेषण करें। क्या नदी जोड़ो परियोजना इसका स्थायी समाधान है?
Q. भारत में जल संकट के कारणों का विश्लेषण करें। क्या नदी जोड़ो परियोजना इसका स्थायी समाधान है?
Ans -
नीति आयोग द्वारा जारी समग्र जल प्रबंधन सूचकांक (CWMI) के अनुसार, भारत अपने इतिहास के सबसे गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है, जहाँ लगभग 60 करोड़ लोग उच्च से चरम जल तनाव की स्थिति में हैं। वैश्विक मीठे जल के संसाधनों का मात्र 4% भारत के पास है, जबकि यहाँ विश्व की 18% आबादी निवास करती है। जल संकट की यह स्थिति केवल प्राकृतिक नहीं है, बल्कि यह जनसांख्यिकीय दबाव, नीतिगत कमियों और जलवायु परिवर्तन का एक जटिल परिणाम है।
भारत में जल संकट के बहुआयामी कारण
जल संकट की प्रकृति को PESTLE (राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी, कानूनी और पर्यावरणीय) दृष्टिकोण के माध्यम से अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है:
1. नीतिगत एवं कृषि-आर्थिक कारण
असंतुलित कृषि पद्धतियाँ: भारत का लगभग 80-85% जल उपयोग कृषि क्षेत्र में होता है। जल-कमी वाले क्षेत्रों (जैसे महाराष्ट्र, पंजाब) में गन्ने और धान जैसी अत्यधिक जल-गहन (Water-intensive) फसलों की खेती ने भूजल स्तर को गंभीर रूप से गिरा दिया है।
सब्सिडी का दुष्चक्र: कृषि क्षेत्र में मुफ्त या अत्यधिक रियायती बिजली के प्रावधान ने भूजल के अंधाधुंध दोहन को प्रोत्साहित किया है।
2. पर्यावरणीय एवं भौगोलिक कारक
वर्षा का स्थानिक और कालिक असंतुलन: भारत में अधिकांश वर्षा मानसून के केवल 3-4 महीनों में और विशिष्ट क्षेत्रों तक सीमित रहती है।
जलवायु परिवर्तन: अल नीनो (El Niño) की बढ़ती आवृत्ति और ग्लेशियरों के पिघलने से नदी प्रणालियों के प्राकृतिक प्रवाह और मानसून के पैटर्न में अत्यधिक अनिश्चितता आ गई है।
3. संरचनात्मक एवं शहरीकरण की चुनौतियां
अपर्याप्त जल भंडारण: भारत की जल भंडारण क्षमता लगभग 30 दिनों की वर्षा के बराबर है, जो विकसित देशों (जैसे अमेरिका में 900 दिन) की तुलना में अत्यंत कम है।
जल निकायों का अतिक्रमण: अनियोजित शहरीकरण के कारण झीलों, तालाबों और आर्द्रभूमियों (Wetlands) का कंक्रीटीकरण हो गया है, जिससे भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) लगभग समाप्त हो गया है।
4. कानूनी एवं विधिक कमियां
भूजल स्वामित्व का मुद्दा: भारतीय सुखाधिकार अधिनियम (Indian Easement Act), 1882 के तहत भूजल को भूमि के स्वामित्व से जोड़ दिया गया है, जो जल को सार्वजनिक संपत्ति मानने के बजाय इसके अनियंत्रित निजी दोहन को कानूनी संरक्षण प्रदान करता है।
जल का राज्य सूची का विषय होना: संविधान की 7वीं अनुसूची के तहत जल मुख्य रूप से एक राज्य का विषय है, जिससे एकीकृत राष्ट्रीय जल नीति के निर्माण और क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न होती है (अनुच्छेद 262 केवल अंतर्राज्यीय विवादों तक सीमित है)।
नदी जोड़ो परियोजना (ILR): क्या यह स्थायी समाधान है?
राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (NPP) के तहत नदी जोड़ो परियोजना का उद्देश्य जल-आधिक्य वाले बेसिन (Surplus Basins) से जल-न्यून बेसिन (Deficit Basins) में पानी का स्थानांतरण करना है (जैसे- केन-बेतवा लिंक)। यद्यपि यह एक महत्वाकांक्षी समाधान प्रतीत होता है, परंतु इसके स्थायी होने पर गंभीर वैज्ञानिक और पारिस्थितिक प्रश्नचिह्न हैं।
परियोजना के संभावित लाभ
सूखे और बाढ़ का शमन: यह मानसून के दौरान अतिरिक्त जल को सूखाग्रस्त क्षेत्रों में मोड़ने का प्रयास करता है।
सिंचाई एवं ऊर्जा: इससे लाखों हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई क्षमता और जलविद्युत (Hydroelectricity) का उत्पादन संभव है।
परियोजना की सीमाएं और चुनौतियां (स्थायी समाधान क्यों नहीं?)
पारिस्थितिक और पर्यावरणीय विनाश: नदियों का अपना एक स्वतंत्र पारिस्थितिकी तंत्र होता है। जल के कृत्रिम हस्तांतरण से डेल्टा का क्षरण होगा और जैव विविधता नष्ट होगी। (उदाहरण: केन-बेतवा लिंक से पन्ना टाइगर रिज़र्व के एक बड़े हिस्से का जलमग्न होना)।
भौगोलिक और इंजीनियरिंग जटिलताएं: बाढ़ के दौरान नदियों में अत्यधिक गाद (Siltation) होती है। गंगा और कोसी बेसिन की बाढ़, जो पटना और बिहार के सभी जिलों को व्यापक रूप से प्रभावित करती है, केवल नहरों के माध्यम से मोड़ी नहीं जा सकती। जल के विशाल आयतन और गाद के कारण नहरें जल्द ही अवरुद्ध हो सकती हैं, जिससे तटीय क्षेत्रों में नए सिरे से बाढ़ का खतरा उत्पन्न होगा।
आर्थिक और सामाजिक लागत: लाखों लोगों का विस्थापन और पुनर्वास (R&R) एक बड़ा मानवीय संकट है। इसके साथ ही, इस महा-परियोजना की पूंजीगत लागत (Capital Cost) भारत के बजटीय संसाधनों पर भारी दबाव डालेगी।
अंतर्राज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय विवाद: 'सरप्लस' जल की परिभाषा को लेकर राज्यों में असहमति है। साथ ही, ब्रह्मपुत्र और गंगा बेसिन में हस्तक्षेप से बांग्लादेश और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों के साथ भू-राजनीतिक तनाव बढ़ सकता है।
आगे की राह
जल संकट का कोई एकल 'इंजीनियरिंग समाधान' नहीं हो सकता। मिहिर शाह समिति की सिफारिशों के अनुरूप, भारत को आपूर्ति-पक्ष प्रबंधन (Supply-side) के साथ-साथ 'मांग-पक्ष प्रबंधन' (Demand-side management) पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए:
जल उपयोग दक्षता: कृषि में सूक्ष्म-सिंचाई ('Per Drop More Crop') और इज़राइल की तर्ज पर अपशिष्ट जल के उपचार एवं पुन: उपयोग को अनिवार्य बनाना।
विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन: बड़े बांधों और नहरों के बजाय 'कैच द रेन' (Catch the Rain) अभियान के तहत स्थानीय स्तर पर वाटरशेड प्रबंधन, वर्षा जल संचयन और पारंपरिक जल निकायों का पुनरुद्धार।
संस्थागत सुधार: केंद्रीय जल आयोग (CWC) और केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) का विलय कर एक समग्र राष्ट्रीय जल आयोग (NWC) का गठन करना।
भारत को 'हाइड्रो-इंजीनियरिंग' के अहंकार से बाहर निकलकर पारिस्थितिक तंत्र आधारित दृष्टिकोण (Eco-centric approach) अपनाना होगा। सतत विकास लक्ष्य-6 (SDG-6: स्वच्छ जल और स्वच्छता) को प्राप्त करने तथा 'वसुधैव कुटुम्बकम' के दर्शन के अनुरूप जल को एक साझी वैश्विक संपदा मानने की आवश्यकता है। केवल विकेंद्रीकृत, समुदाय-संचालित और वैज्ञानिक जल प्रबंधन के माध्यम से ही हम 'जल-सुरक्षित नए भारत 2047' के विजन को साकार कर सकते हैं।