विश्व में महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) के वितरण और भारत की ऊर्जा सुरक्षा में उनके महत्व पर चर्चा करें।

 Q. विश्व में महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) के वितरण और भारत की ऊर्जा सुरक्षा में उनके महत्व पर चर्चा करें।

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अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की नवीनतम 'ग्लोबल क्रिटिकल मिनरल्स आउटलुक 2026' रिपोर्ट स्पष्ट रूप से चेतावनी देती है कि वैश्विक ऊर्जा संक्रमण जीवाश्म ईंधन-आधारित प्रणाली से 'खनिज-गहन' (Mineral-intensive) प्रणाली की ओर तेजी से स्थानांतरित हो रहा है। महत्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals) वे धात्विक या अधात्विक तत्व हैं (जैसे- लिथियम, कोबाल्ट, दुर्लभ मृदा तत्व), जो आधुनिक प्रौद्योगिकियों, हरित ऊर्जा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपरिहार्य हैं, परंतु जिनकी आपूर्ति श्रृंखला में उच्च भू-राजनीतिक जोखिम विद्यमान है। भारत सरकार ने ऐसे 30 खनिजों की सूची जारी की है जो देश की आर्थिक और सामरिक संप्रभुता के लिए नितांत आवश्यक हैं।

विश्व में महत्वपूर्ण खनिजों का वितरण और भू-राजनीतिक संकेंद्रण

महत्वपूर्ण खनिजों का वैश्विक वितरण अत्यधिक असमान और कुछ विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों तक सीमित है:

  • खनन संकेंद्रण (Mining Concentration):

    • लिथियम (Lithium): इसका सर्वाधिक खनन 'लिथियम त्रिकोण' (चिली, अर्जेंटीना, बोलीविया) और ऑस्ट्रेलिया में होता है।

    • कोबाल्ट (Cobalt): वैश्विक आपूर्ति का लगभग 70% केवल कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) से आता है।

    • निकल (Nickel): इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया इसके सबसे बड़े उत्पादक हैं।

    • दुर्लभ मृदा तत्व (Rare Earth Elements - REEs): इसके खनन में चीन का लगभग निर्विवाद वर्चस्व है।

  • प्रसंस्करण एकाधिकार (Processing & Refining Monopoly): IEA के अनुसार, खनन से अधिक चिंताजनक स्थिति खनिजों के प्रसंस्करण की है। तांबा, लिथियम, कोबाल्ट और REEs को रिफाइन करने में चीन की हिस्सेदारी 60% से 90% के मध्य है। यह एकाधिकार वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को अत्यंत सुभेद्य (Vulnerable) बनाता है।

भारत की ऊर्जा सुरक्षा में महत्वपूर्ण खनिजों का सामरिक महत्व

भारत के 'पंचामृत' (Panchamrit) लक्ष्यों (2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता) और 2070 तक 'नेट जीरो' (Net Zero) उत्सर्जन प्रतिबद्धता को प्राप्त करने के लिए ये खनिज रीढ़ की हड्डी के समान हैं:

  • स्वच्छ ऊर्जा अवसंरचना (Clean Energy Infrastructure): सौर पीवी (Solar PV) पैनलों के निर्माण के लिए सिलिकॉन, गैलियम और टेल्यूरियम आवश्यक हैं। वहीं, पवन ऊर्जा टरबाइनों के 'स्थायी चुंबक' (Permanent Magnets) के लिए नियोडिमियम (एक REE) अपरिहार्य है।

  • ई-मोबिलिटी और ऊर्जा भंडारण (E-Mobility & Grid Storage): देश में इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) की पैठ बढ़ाने के लिए लिथियम-आयन बैटरी का बड़े पैमाने पर उत्पादन आवश्यक है, जिसके लिए लिथियम, कोबाल्ट, निकल और ग्रेफाइट की निर्बाध आपूर्ति चाहिए।

  • विद्युत ग्रिड का आधुनिकीकरण: नवीकरणीय ऊर्जा को मुख्य ग्रिड से जोड़ने और स्मार्ट ग्रिड के विकास के लिए तांबे (Copper) और एल्युमिनियम की भारी मांग है।

  • आयात निर्भरता से मुक्ति: ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ केवल ऊर्जा की निरंतरता नहीं, बल्कि सामरिक स्वायत्तता है। आयातित पेट्रोलियम पर निर्भरता को कम करने के लिए, भारत को खनिज-आधारित ऊर्जा अर्थव्यवस्था में आत्मनिर्भर बनना ही होगा।

बहुआयामी चुनौतियां (PESTLE विश्लेषण)

  • राजनीतिक (Political): चीन द्वारा गैलियम, जर्मेनियम और हाल ही में एंटीमनी जैसे खनिजों के निर्यात पर कड़े नियंत्रण लागू करना यह दर्शाता है कि खनिजों का रणनीतिक 'हथियारीकरण' (Weaponization) हो रहा है।

  • आर्थिक (Economic): भारत वर्तमान में लिथियम, कोबाल्ट और REEs के लिए लगभग पूर्णतः आयात पर निर्भर है, जो देश के आयात बिल और चालू खाता घाटे को बढ़ाता है।

  • तकनीकी (Technological): यद्यपि हाल ही में भारत (जम्मू-कश्मीर और कर्नाटक) में लिथियम के भंडार खोजे गए हैं, परंतु भारत के पास कच्चे अयस्क को 'बैटरी-ग्रेड' रसायनों में उच्च-स्तरीय परिष्कृत (High-purity refining) करने की उन्नत तकनीक का अभाव है।

  • पर्यावरणीय (Environmental): इन खनिजों का खनन अत्यधिक जल-सघन है और इससे पारिस्थितिक क्षरण तथा भूजल प्रदूषण का गंभीर खतरा बना रहता है।

आगे की राह (Way Forward)

खनिज सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक आक्रामक और बहु-आयामी रणनीति की आवश्यकता है:

  • राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन (National Critical Mineral Mission): हाल ही में भारत सरकार द्वारा शुरू किए गए इस मिशन के तहत 2030-31 तक 1,200 घरेलू अन्वेषण परियोजनाओं को पूरा करने और खनिज प्रसंस्करण क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है।

  • नीतिगत सुधार: खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2023 के माध्यम से 24 महत्वपूर्ण खनिजों के अन्वेषण और खनन में निजी क्षेत्र की भागीदारी को कानूनी मान्यता देना एक अत्यंत प्रगतिशील कदम है।

  • वैश्विक कूटनीति और रणनीतिक अधिग्रहण: खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL) के माध्यम से अर्जेंटीना और ऑस्ट्रेलिया में खदानों का अधिग्रहण तेज किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, भारत का खनिज सुरक्षा साझेदारी (Minerals Security Partnership - MSP) में शामिल होना 'चाइना प्लस वन' (China+1) आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने में सहायक होगा।

  • शहरी खनन (Urban Mining) और चक्रीय अर्थव्यवस्था: IEA का स्पष्ट अनुमान है कि ई-कचरे और पुरानी बैटरियों की प्रभावी रीसाइक्लिंग से मध्य शताब्दी तक महत्वपूर्ण खनिजों की नई खनन आवश्यकता को 25% से 40% तक कम किया जा सकता है। इसके लिए बैटरी अपशिष्ट प्रबंधन नियमों का कठोरता से पालन आवश्यक है।

आगामी दशकों में वैश्विक भू-राजनीतिक शक्ति संतुलन इस बात से तय होगा कि कौन सा देश 'महत्वपूर्ण खनिजों' की आपूर्ति श्रृंखला को नियंत्रित करता है। भारत को अपनी विशाल घरेलू मांग का लाभ उठाते हुए तकनीकी अनुसंधान और विकास (R&D) पर निवेश बढ़ाना चाहिए। सतत विकास लक्ष्य (SDG 7 - सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा) तथा 'वसुधैव कुटुम्बकम' के दर्शन के अनुरूप वैश्विक गठबंधनों को मजबूत करके ही भारत 'आत्मनिर्भर भारत 2047' के विजन को यथार्थ में परिवर्तित कर विश्व पटल पर एक प्रमुख हरित महाशक्ति (Green Superpower) के रूप में स्थापित हो सकता है।

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