भारतीय मानसून तंत्र को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों (जैसे अल नीनो, ला नीना, IOD) का विश्लेषण करें।

 Q. भारतीय मानसून तंत्र को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों (जैसे अल नीनो, ला नीना, IOD) का विश्लेषण करें।

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भारतीय मानसून केवल एक मौसम विज्ञान संबंधी परिघटना नहीं है, बल्कि यह भारतीय अर्थव्यवस्था और कृषि का जीवन आधार है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के शब्दों में, "मानसून भारत का वास्तविक वित्त मंत्री है।" विशेषकर बिहार जैसे राज्य में, जहाँ लगभग 70% से अधिक आबादी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है (आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार), मानसून की अनिश्चितता राज्य के समग्र विकास को सीधे प्रभावित करती है।

भारतीय मानसून एक अत्यंत जटिल तंत्र है, जिसे केवल स्थानीय कारकों द्वारा नहीं, बल्कि वैश्विक महासागरीय और वायुमंडलीय परिघटनाओं द्वारा नियंत्रित किया जाता है।

भारतीय मानसून तंत्र को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक

मानसून को प्रभावित करने वाले कारकों को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है: वैश्विक दूर-संयोजन (Global Teleconnections) और पारंपरिक भौगोलिक कारक।

1. वैश्विक महासागरीय-वायुमंडलीय कारक (Global Teleconnections)

भारतीय मानसून के संदर्भ में यह सबसे निर्णायक भूमिका निभाते हैं:

  • अल नीनो (El Niño): यह पूर्वी प्रशांत महासागर (पेरू तट) के सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने की घटना है।

    • प्रभाव: इसके कारण वॉकर सेल (Walker Cell) कमजोर हो जाता है, जिससे हिंद महासागर में उच्च वायुदाब का क्षेत्र क्षीण हो जाता है। परिणामस्वरूप, भारत में मानसूनी हवाएं कमजोर हो जाती हैं और सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है।

    • उदाहरण: वर्ष 2014 और 2015 में अल नीनो के कारण भारत और विशेषकर दक्षिण बिहार में गंभीर सूखे का सामना करना पड़ा था।

  • ला नीना (La Niña): यह अल नीनो के ठीक विपरीत स्थिति है, जिसमें पूर्वी प्रशांत महासागर का जल असामान्य रूप से ठंडा हो जाता है।

    • प्रभाव: यह वॉकर सर्कुलेशन को मजबूत करता है, जिससे हिंद महासागर के ऊपर उच्च दाब अधिक तीव्र हो जाता है। यह भारतीय मानसून को सशक्त बनाता है और सामान्य से अधिक वर्षा लाता है।

  • हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole - IOD): इसे 'भारतीय नीनो' भी कहा जाता है। यह पश्चिमी हिंद महासागर (अरब सागर) और पूर्वी हिंद महासागर (इंडोनेशिया के पास) के समुद्री सतह के तापमान में अंतर है।

    • सकारात्मक IOD (Positive IOD): अरब सागर का जल गर्म होता है, जो भारतीय मानसून को मजबूत करता है (अल नीनो के नकारात्मक प्रभाव को भी बेअसर कर सकता है, जैसे 1997 में)।

    • नकारात्मक IOD (Negative IOD): यह मानसूनी वर्षा को कम करता है।



  • मैडेन-जूलियन दोलन (Madden-Julian Oscillation - MJO): यह भूमध्य रेखा के पास पूर्व की ओर बढ़ने वाला बादलों, वर्षा और हवाओं का एक समुद्री-वायुमंडलीय विक्षोभ है। जब यह हिंद महासागर के ऊपर होता है, तो मानसूनी वर्षा को बढ़ाता है।

2. पारंपरिक एवं भौगोलिक कारक

  • ITCZ का खिसकाव (Shift of Inter-Tropical Convergence Zone): ग्रीष्म ऋतु में सूर्य के उत्तरायण होने के कारण ITCZ गंगा के मैदान (विशेषकर बिहार और उत्तर प्रदेश) के ऊपर खिसक कर 'मानसून गर्त' (Monsoon Trough) का निर्माण करता है, जो दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं को आकर्षित करता है।

  • जेट स्ट्रीम (Jet Streams):

    • उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट (Sub-tropical Westerly Jet): जब तक यह हिमालय के दक्षिण में रहती है, मानसून का आगमन नहीं होता। इसका उत्तर की ओर खिसकना मानसून के प्रस्फोट (Burst of Monsoon) के लिए अनिवार्य है।

    • उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट (Tropical Easterly Jet): तिब्बत के पठार के गर्म होने से उत्पन्न यह जेट स्ट्रीम भारत में मानसूनी हवाओं को सतह पर धकेलने (Rain-bearing winds) का कार्य करती है।

  • तिब्बत के पठार का तापन: ग्रीष्म ऋतु में यह एक तीव्र 'हीट इंजन' के रूप में कार्य करता है, जो मध्य क्षोभमंडल में उच्च दाब का निर्माण कर हिंद महासागर की ओर हवाओं को धकेलता है।

बिहार के विशेष संदर्भ में प्रभाव एवं चुनौतियाँ

मानसून की इन वैश्विक परिघटनाओं का बिहार की भौगोलिक और आर्थिक स्थिति पर द्विआयामी प्रभाव पड़ता है:

  • उत्तरी बिहार में बाढ़ की विभीषिका: ला नीना या मजबूत मानसून के वर्षों में, ITCZ के हिमालय की तलहटी में स्थापित होने से नेपाल और उत्तर बिहार में भारी वर्षा होती है। कोसी, गंडक और बागमती जैसी नदियाँ उफान पर आ जाती हैं, जिससे बड़े पैमाने पर कृषि और बुनियादी ढांचे का विनाश होता है।

  • दक्षिणी बिहार में सूखा: अल नीनो के प्रभाव वाले वर्षों में, गया, औरंगाबाद, और नवादा जैसे वृष्टि-छाया (Rain-shadow) और पठारी सीमांत क्षेत्रों में भयंकर सूखा पड़ता है।

  • खरीफ फसल पर संकट: मानसून में देरी या अनियमितता से धान की रोपाई सीधे तौर पर प्रभावित होती है, जो राज्य की खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती है।

आगे की राह (Way Forward)

  • जलवायु अनुकूल कृषि (Climate Resilient Agriculture): अल नीनो/ला नीना के सटीक पूर्वानुमान के आधार पर किसानों को सूखा-प्रतिरोधी (Drought-resistant) या बाढ़-सहने वाली धान की किस्में (जैसे स्वर्णा सब-1) उगाने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

  • पूर्वानुमान अवसंरचना का सुदृढ़ीकरण: मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा हाल ही में शुरू किए गए 'मिशन मौसम' (Mission Mausam) का उपयोग करते हुए पंचायत स्तर पर मौसम आधारित एग्रो-एडवाइजरी जारी की जानी चाहिए।

  • जल संरक्षण: बिहार सरकार की 'जल-जीवन-हरियाली' योजना एक उत्कृष्ट कदम है। इसे सूक्ष्म सिंचाई (Micro-irrigation) और वर्षा जल संचयन के साथ और अधिक व्यापक बनाने की आवश्यकता है।

बदलते जलवायु परिदृश्य में भारतीय मानसून तंत्र की जटिलता और बढ़ गई है। सतत विकास लक्ष्य (SDG 13: Climate Action) को प्राप्त करने के लिए यह अनिवार्य है कि हम केवल मानसून पर निर्भर न रहें, बल्कि वैज्ञानिक पूर्वानुमान और मजबूत नीतिगत ढांचे के माध्यम से अपनी कृषि और अर्थव्यवस्था को 'मानसून-प्रूफ' बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ें।

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