भारत में चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता लाने के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड योजना पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विश्लेषण करें।

 Q. भारत में चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता लाने के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड योजना पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विश्लेषण करें।

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चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता और इलेक्टोरल बॉन्ड पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय: एक विश्लेषणात्मक मूल्यांकन

स्वस्थ और परिपक्व लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव अपरिहार्य हैं, जिसकी आधारशिला पारदर्शी चुनावी वित्तपोषण (Electoral Funding) पर टिकी है। हाल ही में, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) बनाम भारत संघ (2024) वाद में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय देते हुए वर्ष 2018 में लागू 'इलेक्टोरल बॉन्ड योजना' (EBS) को असंवैधानिक घोषित कर दिया। यह निर्णय चुनावी शुचिता को बहाल करने और राजनीतिक वित्तपोषण में काले धन तथा 'क्रोनी कैपिटलिज़्म' (Crony Capitalism) के गठजोड़ को समाप्त करने की दिशा में एक युगांतकारी कदम है।

इलेक्टोरल बॉन्ड योजना का वैधानिक परिप्रेक्ष्य और न्यायालय का विश्लेषण

इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को वित्त अधिनियम 2017 के माध्यम से जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA) 1951, कंपनी अधिनियम 2013 और आयकर अधिनियम 1961 में संशोधन कर लागू किया गया था। इसका घोषित उद्देश्य दानकर्ताओं की गोपनीयता बनाए रखते हुए नकद चंदे को हतोत्साहित करना था। परंतु, सर्वोच्च न्यायालय ने इसका सघन परीक्षण करते हुए इसे निम्नलिखित आधारों पर निरस्त किया:

  • सूचना के अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(a)) का उल्लंघन: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मतदाता को यह जानने का मौलिक अधिकार है कि राजनीतिक दलों को वित्तपोषण कहाँ से प्राप्त हो रहा है। वित्तपोषण के स्रोत नीतियों को प्रभावित करते हैं, अतः गोपनीयता मतदाता के 'जानने के अधिकार' का हनन है।

  • अनुपातिकता का सिद्धांत (Doctrine of Proportionality): काले धन पर अंकुश लगाने का उद्देश्य वैध है, परंतु इसके लिए पूर्ण गोपनीयता (Absolute Anonymity) का मार्ग अपनाना अनुपातिक नहीं है। चुनावी ट्रस्ट (Electoral Trusts) जैसे कम प्रतिबंधात्मक विकल्प पहले से मौजूद हैं।

  • कंपनी अधिनियम (धारा 182) में संशोधन रद्द: कंपनियों द्वारा अपने शुद्ध लाभ के 7.5% की सीमा को समाप्त करने वाले संशोधन को न्यायालय ने मनमाना माना। इससे घाटे में चल रही कंपनियों (Shell Companies) द्वारा 'क्विड प्रो को' (Quid Pro Quo - लेन-देन के बदले लाभ) की संभावना बढ़ गई थी।

निर्णय का बहुआयामी प्रभाव (Multidimensional Impact - PESTLE)

इस ऐतिहासिक निर्णय के प्रभाव राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था के व्यापक फलक पर देखे जा सकते हैं:

  • राजनीतिक (Political):

    • समान अवसर (Level Playing Field): यह निर्णय सत्ताधारी दलों (जिन्हें अमूमन बॉन्ड का बड़ा हिस्सा मिलता था) और विपक्षी दलों के बीच वित्तीय असमानता को कम करेगा।

    • ज़मीनी लोकतंत्र का सशक्तिकरण: पारदर्शी फंडिंग व्यवस्था से पटना और बिहार के सभी ज़िलों जैसे राजनीतिक रूप से जागरूक क्षेत्रों में क्षेत्रीय दलों और ज़मीनी राजनीतिक आंदोलनों को कॉर्पोरेट धनबल के अनुचित प्रभाव से बचाया जा सकेगा, जिससे स्थानीय प्रतिनिधित्व सुदृढ़ होगा।

  • आर्थिक (Economic): कॉरपोरेट घरानों और राजनीतिक दलों के बीच अपारदर्शी सांठगांठ पर रोक लगेगी। इससे नीति-निर्माण (Policy formulation) में कॉरपोरेट एकाधिकार कम होगा और निविदाओं (Tenders) एवं लाइसेंस आवंटन में आर्थिक शुचिता सुनिश्चित होगी।

  • विधिक एवं विनियामक (Legal & Regulatory): यह निर्णय निर्वाचन आयोग (ECI) की शक्तियों को पुनर्स्थापित करता है और अनुच्छेद 324 के तहत स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने के उसके अधिदेश को बल प्रदान करता है।

चुनावी फंडिंग की वर्तमान संरचना: पूर्व स्थिति बनाम सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

मापदंडइलेक्टोरल बॉन्ड योजना (पूर्व स्थिति)सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय (वर्तमान स्थिति)
गोपनीयतादानकर्ता और प्राप्तकर्ता की पूर्ण गुमनामी।SBI को ECI के समक्ष सारा डेटा सार्वजनिक करने का आदेश।
कॉर्पोरेट चंदा सीमा7.5% की सीमा समाप्त, असीमित चंदा।असीमित चंदे की व्यवस्था निरस्त, पारदर्शिता अनिवार्य।
RTI का दायरासूचना के अधिकार से पूर्णतः बाहर।मतदाता का मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(a)) घोषित।

विद्यमान चुनौतियां (Existing Challenges)

यद्यपि बॉन्ड योजना रद्द हो गई है, परंतु चुनावी फंडिंग को पूर्णतः पारदर्शी बनाने में अभी भी कई संस्थागत बाधाएं हैं:

  • नकद चंदे की समस्या: RPA, 1951 की धारा 29C के तहत ₹20,000 से कम के चंदे का स्रोत बताने की अनिवार्यता नहीं है। दल इसका लाभ उठाकर बड़े चंदों को छोटी-छोटी राशियों में बांटकर (Smurfing) दिखा सकते हैं।

  • अघोषित धन (Black Money) का प्रयोग: चुनाव प्रचार, रैलियों और वोटरों को प्रभावित करने के लिए ज़मीनी स्तर पर नकदी, शराब और मुफ्त उपहारों (Freebies) का अनियंत्रित उपयोग जारी है।

  • चुनावी ट्रस्ट की सीमाएं: इलेक्टोरल ट्रस्ट प्रणाली में भी, कॉरपोरेट चंदे को विभिन्न दलों में बांटने की प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता का अभाव रहता है।

आगे की राह (Way Forward)

चुनावी वित्तपोषण में व्यवस्थागत सुधार हेतु निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए:

  • राष्ट्रीय चुनाव कोष (National Electoral Fund): पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों द्वारा अनुशंसित 'राष्ट्रीय चुनाव कोष' की स्थापना की जानी चाहिए, जहाँ कोई भी नागरिक या कंपनी दान कर सके और उस निधि का आवंटन दलों को उनके प्रदर्शन (Vote Share) के आधार पर किया जाए।

  • RTI अधिनियम के अंतर्गत राजनीतिक दल: विधि आयोग (Law Commission) की 255वीं रिपोर्ट की अनुशंसा के अनुरूप राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI), 2005 के तहत 'सार्वजनिक प्राधिकरण' (Public Authority) घोषित किया जाना चाहिए।

  • राज्य वित्तपोषण (State Funding of Elections): इंद्रजीत गुप्ता समिति (1998) की सिफारिशों के आधार पर, मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के लिए आंशिक राज्य वित्तपोषण (जैसे- मुफ्त एयरटाइम, मतदाता सूचियां, प्रचार सामग्री) की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।

  • डिजिटल और ऑडिटेड लेनदेन: राजनीतिक दलों के खातों का CAG (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) द्वारा स्वतंत्र और अनिवार्य ऑडिट होना चाहिए तथा सभी वित्तीय लेनदेन डिजिटल माध्यम से सुनिश्चित किए जाने चाहिए।

लोकतांत्रिक व्यवस्था की शक्ति उसकी पारदर्शिता और जनता के विश्वास में निहित है। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय चुनावी सुधारों के मार्ग में एक मील का पत्थर है। सतत विकास लक्ष्य 16 (SDG 16 - शांति, न्याय और सुदृढ़ संस्थाएं) के विज़न के अनुरूप, भारत को ऐसे चुनावी वित्तपोषण मॉडल की ओर बढ़ना होगा जो पूर्णतः जवाबदेह हो। धनबल के प्रभाव को कम करके ही हम 'न्यू इंडिया 2047' के उस संकल्प को साकार कर सकते हैं जहाँ लोकतंत्र केवल प्रक्रियाओं में नहीं, बल्कि अपने मूल स्वरूप में जीवंत हो।

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