मध्य पूर्व (पश्चिम एशिया) में भारत की 'लुक वेस्ट' नीति की सफलताओं का मूल्यांकन करें।

 Q. मध्य पूर्व (पश्चिम एशिया) में भारत की 'लुक वेस्ट' नीति की सफलताओं का मूल्यांकन करें।

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पश्चिम एशिया में भारत की 'लुक वेस्ट' नीति: सफलताओं और रणनीतिक आयामों का मूल्यांकन

भारत की विदेश नीति में पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) पारंपरिक रूप से 'विस्तारित पड़ोस' (Extended Neighbourhood) का एक महत्वपूर्ण अंग रहा है। वर्ष 2005 में औपचारिक रूप से प्रारंभ की गई 'लुक वेस्ट' (Look West) नीति ने पिछले एक दशक में एक अधिक सक्रिय और परिणामोन्मुखी 'थिंक वेस्ट' (Think West) या 'एक्ट वेस्ट' (Act West) नीति का रूप धारण कर लिया है। हाल ही में घोषित भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) और I2U2 (भारत, इज़राइल, अमेरिका, यूएई) जैसे रणनीतिक गठजोड़ इस बात का प्रमाण हैं कि भारत अब इस क्षेत्र में केवल एक निष्क्रिय क्रेता नहीं, बल्कि एक प्रमुख भू-राजनीतिक हितधारक बन चुका है।

नीतिगत सफलताओं का बहुआयामी (PESTLE) विश्लेषण

भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) को बनाए रखते हुए पश्चिम एशिया में अभूतपूर्व सफलताएं अर्जित की हैं, जिनका विश्लेषणात्मक मूल्यांकन निम्नलिखित है:

  • राजनीतिक एवं कूटनीतिक सफलताएं (Political):

    • वि-योजक नीति (De-hyphenation Policy): भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक विजय इज़राइल और फिलिस्तीन के साथ अपने संबंधों को एक-दूसरे से स्वतंत्र रखना है। भारत ने रामल्लाह (फिलिस्तीन) और तेल अवीव (इज़राइल) दोनों के साथ बिना किसी वैचारिक पूर्वाग्रह के मजबूत संबंध स्थापित किए हैं।

    • बहु-संरेखण (Multi-alignment) का सफल क्रियान्वयन: भारत ने पश्चिम एशिया के तीन प्रमुख और परस्पर विरोधी ध्रुवों—सऊदी अरब, ईरान और इज़राइल—के साथ सफलतापूर्वक सामंजस्य स्थापित किया है। यह भारत की परिपक्व कूटनीति का परिचायक है।

  • आर्थिक एवं वाणिज्यिक एकीकरण (Economic):

    • व्यापार और निवेश: यूएई के साथ व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (CEPA) ऐतिहासिक है, जिससे द्विपक्षीय व्यापार के 100 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की संभावना है। सऊदी अरब और यूएई अब भारत में बुनियादी ढांचे और राष्ट्रीय निवेश और अवसंरचना कोष (NIIF) में शीर्ष निवेशकों में से हैं।

    • ऊर्जा सुरक्षा से परे: पारंपरिक रूप से तेल कूटनीति तक सीमित संबंधों का अब विविधीकरण हुआ है। ऊर्जा संबंधों को 'क्रेता-विक्रेता' मॉडल से आगे बढ़ाकर 'रणनीतिक साझेदारी' में बदला गया है (जैसे- महाराष्ट्र के रत्नागिरी में सऊदी अरामको का प्रस्तावित निवेश और भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार में खाड़ी देशों की भागीदारी)।

    • विप्रेषण (Remittances): विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया में कार्यरत लगभग 85-90 लाख भारतीय प्रवासी देश के कुल प्रेषण (लगभग 125 बिलियन डॉलर) का एक बड़ा हिस्सा भेजते हैं, जो भारत के चालू खाता घाटे (CAD) को प्रबंधित करने में सहायक है।

  • सुरक्षा एवं रक्षा सहयोग (Security/Technological):

    • आतंकवाद और समुद्री सुरक्षा: रक्षा सहयोग अब केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है। खाड़ी देशों (विशेषकर यूएई और सऊदी अरब) के साथ खुफिया जानकारी साझाकरण, प्रत्यर्पण संधियों (Extradition Treaties) का क्रियान्वयन, और अदन की खाड़ी में समुद्री डकैती विरोधी अभियानों ने हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) की सुरक्षा को सुदृढ़ किया है।

    • संयुक्त सैन्य अभ्यास (यथा- जायद तलवार, अल-मोहद अल-हिंदी) इस बढ़ते विश्वास के प्रतीक हैं।

  • सामाजिक-सांस्कृतिक और सॉफ्ट पावर (Socio-Cultural):

    • खाड़ी देशों में भारतीय प्रवासियों को 'सॉफ्ट पावर' के सबसे प्रभावी उपकरण के रूप में मान्यता मिली है।

    • इस्लामी देशों द्वारा भारतीय प्रधानमंत्री को सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्रदान करना और यूएई में BAPS हिंदू मंदिर का निर्माण, भारत की सांस्कृतिक कूटनीति की असाधारण सफलता को रेखांकित करता है।

रणनीतिक साझेदारी का संस्थागत स्वरूप

गठबंधन / पहलरणनीतिक उद्देश्य एवं प्रभाव
I2U2 (पश्चिम एशियाई क्वाड)जल, ऊर्जा, परिवहन, अंतरिक्ष, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा में संयुक्त निवेश को बढ़ावा देना।
IMEC (आर्थिक गलियारा)चीन की 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) के एक पारदर्शी और व्यवहार्य विकल्प के रूप में आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करना।
चाबहार बंदरगाह (ईरान)पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया (INSTC के माध्यम से) तक निर्बाध कनेक्टिविटी सुनिश्चित करना।

विद्यमान भू-राजनीतिक चुनौतियाँ

सफलताओं के बावजूद, 'लुक वेस्ट' नीति के समक्ष कई गंभीर संरचनात्मक और भू-राजनीतिक चुनौतियां विद्यमान हैं:

  • क्षेत्रीय अस्थिरता और संघर्ष: गाजा संकट और इज़राइल-हमास संघर्ष ने I2U2 और IMEC जैसी पहलों की प्रगति को अस्थायी रूप से बाधित किया है। क्षेत्रीय अस्थिरता सीधे तौर पर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासियों की सुरक्षा को खतरे में डालती है।

  • चीन का बढ़ता प्रभाव: चीन द्वारा सऊदी अरब और ईरान के बीच राजनयिक समझौते की मध्यस्थता करना और क्षेत्र में बड़े पैमाने पर आर्थिक निवेश (BRI के तहत), भारत के रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र के लिए एक सीधी चुनौती है।

  • श्रम नीतियों में परिवर्तन: खाड़ी देशों द्वारा स्वदेशीकरण की नीतियां (जैसे सऊदी अरब की 'निताकत' प्रणाली और कुवैत का नया श्रम कानून) भारतीय कामगारों के रोजगार और प्रेषण पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं।

आगे की राह और वैश्विक दृष्टिकोण

पश्चिम एशिया भारत की 'विस्तारित सुरक्षा छतरी' का अनिवार्य हिस्सा है। 'लुक वेस्ट' नीति की सफलता इस बात में निहित है कि भारत ने इस क्षेत्र को वैचारिक चश्मे के बजाय विशुद्ध यथार्थवादी (Realpolitik) और पारस्परिक लाभ के दृष्टिकोण से देखा है।

बदलते वैश्विक परिदृश्य में, भारत को सतत विकास लक्ष्यों (विशेषकर SDG 7 और 13) के अनुरूप ऊर्जा कूटनीति को जीवाश्म ईंधन से हरित हाइड्रोजन और नवीकरणीय ऊर्जा सहयोग की ओर स्थानांतरित करना चाहिए। 'न्यू इंडिया 2047' के विजन को साकार करने के लिए, भारत को पश्चिम एशिया में केवल एक 'आर्थिक भागीदार' के रूप में नहीं, बल्कि 'सुरक्षा प्रदाता' (Net Security Provider) के रूप में अपनी क्षमता का विस्तार करना होगा। 'वसुधैव कुटुंबकम' के सिद्धांत पर आधारित भारत की समावेशी कूटनीति इस संघर्ष-ग्रस्त क्षेत्र में स्थिरता और साझी संवृद्धि का एक विश्वसनीय आधार सिद्ध हो सकती है।

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