संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रासंगिकताः क्या विश्व को एक नए वैश्विक संगठन की आवश्यकता है?
Q. संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रासंगिकताः क्या विश्व को एक नए वैश्विक संगठन की आवश्यकता है?
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द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका के पश्चात् वर्ष 1945 में स्थापित संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) का प्राथमिक उद्देश्य "आने वाली पीढ़ियों को युद्ध के प्रकोप से बचाना" था। लगभग आठ दशकों की यात्रा के पश्चात, आज विश्व एक 'पॉलीक्राइसिस' (Polycrisis) अर्थात् महामारी, जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीतिक संघर्षों के एक जटिल जाल में फंसा हुआ है। रूस-यूक्रेन संघर्ष और गाजा संकट में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की विफलता ने इसकी विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का यह कथन कि "वर्तमान वैश्विक संस्थाएं 1945 के विश्व का प्रतिनिधित्व करती हैं, 21वीं सदी का नहीं," इस बहस को जन्म देता है कि क्या विश्व को एक नए वैश्विक संगठन की आवश्यकता है।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र की घटती प्रासंगिकता के कारण
संयुक्त राष्ट्र की वर्तमान संरचना और कार्यप्रणाली में अंतर्निहित त्रुटियों का बहुआयामी विश्लेषण (PESTLE दृष्टिकोण) इस प्रकार है:
1. राजनीतिक और भू-रणनीतिक (Political & Geopolitical)
सुरक्षा परिषद (UNSC) का अलोकतांत्रिक स्वरूप: UNSC में P-5 (अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन) का वर्चस्व है। भारत (विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र), संपूर्ण अफ्रीकी महाद्वीप और लैटिन अमेरिका का स्थायी प्रतिनिधित्व न होना इसकी वैधता को कमजोर करता है।
वीटो (Veto) शक्ति का दुरुपयोग: महाशक्तियों द्वारा अपने भू-राजनीतिक हितों को साधने के लिए वीटो का निरंतर दुरुपयोग किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप सीरिया, यूक्रेन और गाजा में शांति स्थापना के प्रयास अवरुद्ध हुए हैं।
2. संस्थागत और विधिक (Institutional & Legal)
बाध्यकारी शक्ति का अभाव: संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के प्रस्ताव और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के निर्णय प्रायः बाध्यकारी नहीं होते। संप्रभु राष्ट्र अपनी सुविधानुसार अंतर्राष्ट्रीय विधिक ढांचों की अनदेखी करते हैं, जिससे यह संस्था एक 'टूथलेस टाइगर' (दंतहीन बाघ) प्रतीत होती है।
वित्तीय निर्भरता: संयुक्त राष्ट्र अपने बजट के लिए कुछ चुनिंदा विकसित राष्ट्रों पर अत्यधिक निर्भर है। अमेरिका या चीन जैसी शक्तियों द्वारा 'फंडिंग' रोकने की धमकी संस्थागत स्वायत्तता को सीमित करती है।
3. तकनीकी और समकालीन चुनौतियाँ (Technological & Contemporary)
आधुनिक युद्धक प्रणालियाँ: 1945 का यूएन चार्टर साइबर युद्ध (Cyber Warfare), कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित हथियारों, और अंतरिक्ष युद्ध जैसे समकालीन खतरों को विनियमित करने में असमर्थ है।
गैर-राज्य अभिकर्ता (Non-State Actors): अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद और बहुराष्ट्रीय निगमों के एकाधिकार जैसी समस्याओं से निपटने के लिए UN का पारंपरिक राज्य-केंद्रित (State-centric) ढांचा अपर्याप्त सिद्ध हो रहा है।
संयुक्त राष्ट्र की अपरिहार्यता: प्रासंगिकता के सशक्त प्रमाण
यद्यपि UN शांति और सुरक्षा (हार्ड सिक्योरिटी) के मोर्चे पर लड़खड़ाया है, परंतु 'सॉफ्ट इश्यूज' पर इसकी भूमिका आज भी निर्विवाद रूप से अपरिहार्य है:
मानवीय सहायता और विकास: विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP), यूनिसेफ (UNICEF) और WHO के माध्यम से इसने अकाल, कुपोषण और इबोला व कोविड-19 जैसी महामारियों से लड़ने में वैश्विक नेतृत्व प्रदान किया है।
जलवायु परिवर्तन: UNFCCC और पेरिस समझौता (Paris Agreement) एकमात्र ऐसा सार्वभौमिक मंच है जो जलवायु संकट के विरुद्ध राष्ट्रों को एकजुट करता है।
वैश्विक मानक निर्धारण: मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा से लेकर शरणार्थी संरक्षण (UNHCR) और सतत विकास लक्ष्यों (SDGs - एजेंडा 2030) तक, UN ने विकास का एक साझा वैश्विक खाका खींचा है।
क्या एक नए वैश्विक संगठन की आवश्यकता है?
एक नए वैश्विक संगठन का निर्माण न तो व्यावहारिक है और न ही वांछनीय। लीग ऑफ नेशंस (League of Nations) की विफलता का मुख्य कारण बड़ी शक्तियों का उससे अलग होना था। यदि आज एक नया संगठन बनाया जाता है, तो बिना सर्वसम्मति के वह भी गुटबाजी का शिकार हो जाएगा। समस्या संगठन के अस्तित्व में नहीं, बल्कि उसके पुराने हो चुके वास्तुकला (Outdated Architecture) में है। इसलिए, 'प्रतिस्थापन' (Replacement) के बजाय 'सुधारित बहुपक्षवाद' (Reformed Multilateralism) ही एकमात्र तार्किक और रणनीतिक विकल्प है।
आगे की राह (Way Forward)
वैश्विक शासन (Global Governance) को 21वीं सदी की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुकूल बनाने के लिए निम्नलिखित सुधार अनिवार्य हैं:
UNSC में व्यापक सुधार: भारत, ब्राजील, जापान और जर्मनी (G-4 राष्ट्र) के साथ-साथ 'एजुलविनी सर्वसम्मति' (Ezulwini Consensus) के तहत अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता प्रदान की जानी चाहिए। अंतर-सरकारी वार्ता (IGN) प्रक्रिया को 'टेक्स्ट-बेस्ड' बनाया जाना चाहिए।
वीटो शक्ति का लोकतंत्रीकरण: वीटो के प्रयोग को जनसंहार (Genocide) और गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों के मामलों में प्रतिबंधित करने हेतु विधिक तंत्र स्थापित करना।
समकालीन संधियों का निर्माण: साइबर सुरक्षा, बाहरी अंतरिक्ष और AI के नैतिक उपयोग को विनियमित करने के लिए नए अंतर्राष्ट्रीय प्रोटोकॉल अपनाए जाने चाहिए।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51 राज्य को अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का निर्देश देता है। विश्व व्यवस्था द्विध्रुवीय से बहुध्रुवीय (Multipolar) हो चुकी है, जिसमें 'ग्लोबल साउथ' (Global South) एक प्रमुख हितधारक बन कर उभरा है। सतत विकास लक्ष्य-16 (शांति, न्याय और सुदृढ़ संस्थाएं) की प्राप्ति के लिए एक पारदर्शी, उत्तरदायी और प्रतिनिधित्वपूर्ण संयुक्त राष्ट्र अपरिहार्य है।
वैश्विक संस्थाएं विश्व का नेतृत्व नहीं कर सकतीं, यदि वे स्वयं विश्व का सही प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। 'अमृत काल' में भारत का लक्ष्य वैश्विक व्यवस्था को खंडित करना नहीं, बल्कि 'विश्व मित्र' की भूमिका निभाते हुए उसे अधिक न्यायसंगत बनाना है। केवल एक सुधरा हुआ और सशक्त संयुक्त राष्ट्र ही 'वसुधैव कुटुम्बकम' (संपूर्ण विश्व एक परिवार है) के शाश्वत दर्शन को चरितार्थ करते हुए एक सुरक्षित और समावेशी वैश्विक भविष्य का निर्माण कर सकता है।