'वसुधैव कुटुम्बकम': बहुध्रुवीय विश्व में भारत की कूटनीतिक शक्ति।
Q. 'वसुधैव कुटुम्बकम': बहुध्रुवीय विश्व में भारत की कूटनीतिक शक्ति।
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महोपनिषद से उद्घृत 'वसुधैव कुटुम्बकम' (अर्थात संपूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार है) केवल एक सांस्कृतिक आदर्श नहीं है, बल्कि समकालीन वैश्विक कूटनीति में भारत का एक रणनीतिक सिद्धांत (Strategic Doctrine) बन चुका है। हाल ही में संपन्न G-20 शिखर सम्मेलन में भारत ने इसे 'एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य' (One Earth, One Family, One Future) के रूप में विश्व पटल पर स्थापित किया।
वर्तमान में, जब विश्व एक 'पॉलीक्राइसिस' (Polycrisis) अर्थात् एक साथ कई संकटों—महामारी, जलवायु परिवर्तन, और भू-राजनीतिक संघर्षों—से जूझ रहा है, और वैश्विक व्यवस्था एकध्रुवीय (Unipolar) या द्विध्रुवीय (Bipolar) न होकर बहुध्रुवीय (Multipolar) हो चुकी है, तब 'वसुधैव कुटुम्बकम' का दर्शन भारत को एक अद्वितीय कूटनीतिक और नैतिक बढ़त प्रदान करता है।
बहुध्रुवीय विश्व में 'वसुधैव कुटुम्बकम' की प्रासंगिकता और कूटनीतिक अनुप्रयोग
जब अधिकांश राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को 'जीरो-सम गेम' (Zero-Sum Game - एक का लाभ, दूसरे की हानि) के रूप में देखते हैं, तब भारत का यह दर्शन एक 'पॉजिटिव-सम गेम' (Positive-Sum Game) की वकालत करता है। भारत अपनी कूटनीतिक शक्ति को बढ़ाने के लिए इसका उपयोग बहुआयामी स्तर पर कर रहा है, जिसे निम्नलिखित PESTLE (राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी, विधिक, पर्यावरणीय) दृष्टिकोण से समझा जा सकता है:
1. राजनीतिक और भू-रणनीतिक (Political & Geopolitical)
रणनीतिक स्वायत्तता और बहु-संरेखण (Strategic Autonomy & Multi-alignment): भारत गुटनिरपेक्षता की पारंपरिक नीति से आगे बढ़कर अब 'बहु-संरेखण' अपना रहा है। अमेरिका के साथ क्वाड (QUAD) में भागीदारी और रूस एवं चीन के साथ एससीओ (SCO) एवं ब्रिक्स (BRICS) में सदस्यता यह दर्शाती है कि भारत वैश्विक परिवार के सभी सदस्यों के साथ रचनात्मक संबंध स्थापित करने में सक्षम है।
वैश्विक दक्षिण की आवाज (Voice of the Global South): भारत ने दो बार 'वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट' का आयोजन कर विकासशील देशों की चिंताओं (ऋण संकट, खाद्य सुरक्षा) को वैश्विक मंचों पर उठाया है, जो एक जिम्मेदार पारिवारिक मुखिया की भूमिका को रेखांकित करता है।
2. आर्थिक और मानवीय (Economic & Humanitarian)
वैक्सीन मैत्री (Vaccine Maitri): कोविड-19 महामारी के दौरान 100 से अधिक देशों को टीकों की आपूर्ति कर भारत ने 'फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड' होने का दायित्व निभाया, जो विशुद्ध रूप से मानवीय कूटनीति का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण था।
लचीली आपूर्ति श्रृंखलाएं: भारत भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) जैसी पहलों के माध्यम से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को चीन-केंद्रित एकाधिकार से मुक्त कर एक समावेशी आर्थिक विकास को बढ़ावा दे रहा है।
3. सामाजिक और सांस्कृतिक (Social & Cultural)
सॉफ्ट पावर (Soft Power) का विस्तार: संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) द्वारा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को मान्यता देना और आयुर्वेद एवं बौद्ध परिपथ (Buddhist Circuit) का वैश्विक प्रचार भारतीय सांस्कृतिक कूटनीति के शांतिपूर्ण और सर्व-समावेशी स्वरूप को दर्शाता है।
4. तकनीकी और डिजिटल (Technological)
डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) का साझाकरण: भारत अपनी स्वदेशी तकनीकी सफलताओं—जैसे यूपीआई (UPI), कोविन (CoWIN), और इंडिया स्टैक (India Stack)—को ओपन-सोर्स प्लेटफॉर्म के रूप में विश्व के साथ साझा कर रहा है। यह तकनीकी राष्ट्रवाद (Techno-nationalism) के विपरीत तकनीकी वैश्वीकरण (Techno-globalization) का मॉडल है।
5. पर्यावरणीय और पारिस्थितिक (Environmental)
जलवायु नेतृत्व (Climate Leadership): अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे के लिए गठबंधन (CDRI) भारत द्वारा स्थापित ऐसे वैश्विक संस्थान हैं जो यह मानते हैं कि पर्यावरणीय संकटों की कोई सीमा नहीं होती।
मिशन लाइफ (Mission LiFE - Lifestyle for Environment): यह पहल सतत विकास लक्ष्य-13 (जलवायु कार्रवाई) की दिशा में एक वैश्विक जन आंदोलन है, जो मनुष्य और प्रकृति के बीच पारिवारिक सामंजस्य की मांग करता है।
'वसुधैव कुटुम्बकम' आधारित कूटनीति के समक्ष विद्यमान चुनौतियाँ
हार्ड पावर बनाम सॉफ्ट पावर: जोसेफ नाई (Joseph Nye) के अनुसार, कूटनीति में केवल 'सॉफ्ट पावर' (सांस्कृतिक/नैतिक शक्ति) पर्याप्त नहीं है। चीन की आक्रामक 'डेब्ट-ट्रैप कूटनीति' (Debt-Trap Diplomacy) और सीमा विवाद जैसी कठोर वास्तविकताओं के समक्ष केवल आदर्शवाद काम नहीं आ सकता।
वैश्विक संस्थानों का अलोकतांत्रिक स्वरूप: 'एक परिवार' की अवधारणा तब तक अधूरी है जब तक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC), विश्व व्यापार संगठन (WTO) और ब्रेटन वुड्स संस्थानों (IMF/World Bank) में भारत और अफ्रीकी संघ जैसे प्रमुख हितधारकों को समान प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं होता।
संरक्षणवाद और वि-वैश्वीकरण (Deglobalization): वर्तमान में राष्ट्रों का 'अमेरिका फर्स्ट' या संरक्षणवादी नीतियों की ओर मुड़ना एक वैश्विक परिवार की अवधारणा के लिए सीधा खतरा है।
आगे की राह (Way Forward)
बहुध्रुवीय विश्व में भारत को अपनी कूटनीतिक प्रभावशीलता बनाए रखने के लिए यथार्थवाद (Realism) और आदर्शवाद (Idealism) का संतुलन स्थापित करना होगा। 'वसुधैव कुटुम्बकम' के सांस्कृतिक दर्शन को सैन्य और आर्थिक आत्मनिर्भरता की 'हार्ड पावर' के साथ मिलाकर एक 'स्मार्ट पावर' (Smart Power) कूटनीति विकसित की जानी चाहिए।
इसके अतिरिक्त, सतत विकास लक्ष्य-17 (लक्ष्यों के लिए भागीदारी - Partnerships for the Goals) के अनुरूप भारत को नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था (Rule-based International Order) का नेतृत्व करना चाहिए।
वैश्विक व्यवस्था संक्रमण के दौर से गुजर रही है। ऐसे में, भारत की विदेश नीति का मूल उद्देश्य विश्व पर आधिपत्य स्थापित करना नहीं, बल्कि विश्व को दिशा दिखाना है। 'अमृत काल' की इस महत्वपूर्ण वेला में, भारत का 'विकसित भारत 2047' बनने का मार्ग अलगाववाद से नहीं, बल्कि एक मानव-केंद्रित वैश्वीकरण (Human-centric Globalization) से होकर गुजरता है। 'वसुधैव कुटुम्बकम' केवल एक प्राचीन उक्ति नहीं, बल्कि 21वीं सदी में वैश्विक शांति, सुरक्षा और समृद्धि के लिए भारत का अचूक रणनीतिक दिशा-सूचक (Strategic Compass) है।