गिग इकॉनमी और आधुनिक गुलामी: भारतीय युवाओं का भविष्य ।
Q. गिग इकॉनमी और आधुनिक गुलामी: भारतीय युवाओं का भविष्य ।
Ans -
नीति आयोग की रिपोर्ट 'इंडियाज बूमिंग गिग एंड प्लेटफॉर्म इकॉनमी' (India's Booming Gig and Platform Economy) के अनुसार, वर्ष 2029-30 तक भारत में गिग श्रमिकों की संख्या लगभग 2.35 करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है, जो गैर-कृषि कार्यबल का लगभग 6.7% होगा। गिग इकॉनमी (Gig Economy) ने एक ओर रोजगार सृजन, कार्य की लोचशीलता (Flexibility) और वित्तीय समावेशन के नए द्वार खोले हैं, वहीं दूसरी ओर सामाजिक सुरक्षा के अभाव और कार्य की शोषणकारी प्रकृति ने इसे 'आधुनिक गुलामी' (Modern Slavery) के एक नए स्वरूप के रूप में परिचयात्मक विमर्श के केंद्र में ला दिया है।
भारत, जो विश्व के सबसे बड़े युवा कार्यबल का प्रतिनिधित्व करता है, के जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) को सुरक्षित रखने के लिए इस दोहरे चरित्र का सूक्ष्म विश्लेषण अत्यंत आवश्यक है।
गिग इकॉनमी और आधुनिक गुलामी: अंतर्निहित शोषण का बहुआयामी विश्लेषण
गिग अर्थव्यस्था में अंतर्निहित भेद्यता और शोषण की प्रवृत्तियों को PESTLE (राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी, विधिक) दृष्टिकोण से निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है:
1. विधिक और संस्थागत शून्यता (Legal & Institutional)
भ्रामक वर्गीकरण (Misclassification): प्लेटफॉर्म कंपनियां गिग श्रमिकों को विधिक रूप से 'कर्मचारी' (Employee) के बजाय 'स्वतंत्र ठेकेदार' (Independent Contractor) या 'पार्टनर' के रूप में वर्गीकृत करती हैं। इससे श्रमिक औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 और न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के तहत प्राप्त संरक्षण से वंचित हो जाते हैं।
संवैधानिक अधिकारों का हनन: सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (IFAT) बनाम भारत संघ मामले में यह तर्क दिया गया है कि आर्थिक मजबूरी के तहत शोषणकारी शर्तों पर काम करना अनुच्छेद 23 (बलात श्रम/मजबूरी का श्रम) का उल्लंघन है और यह अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार) के विरुद्ध है।
2. आर्थिक शोषण (Economic)
सामाजिक सुरक्षा का अभाव: गिग श्रमिकों को भविष्य निधि (EPF), ग्रेच्युटी, सवेतन अवकाश, मातृत्व लाभ और स्वास्थ्य बीमा जैसी बुनियादी संस्थागत सुरक्षा प्राप्त नहीं है।
आय की अनिश्चितता और अप्रत्यक्ष लागत: ईंधन, वाहन के रखरखाव और इंटरनेट की लागत का वहन श्रमिक को स्वयं करना पड़ता है। प्रतिस्पर्धा बढ़ने और प्रोत्साहन (Incentives) कम होने से वास्तविक आय (Real Income) न्यूनतम मजदूरी से भी नीचे चली जाती है।
3. तकनीकी तानाशाही (Technological)
एल्गोरिथम नियंत्रण (Algorithmic Control): आधुनिक गुलामी का सबसे बड़ा हथियार 'एल्गोरिथम' है, जो बिना किसी मानवीय संवेदना के श्रमिकों के कार्य के घंटे, लक्ष्य और पुरस्कार तय करता है।
अपारदर्शी रेटिंग प्रणाली: ग्राहकों द्वारा दी गई रेटिंग कार्य आवंटन का निर्धारण करती है। एक खराब रेटिंग श्रमिक को प्लेटफॉर्म से 'डी-लॉग' (निष्कासित) कर सकती है, जिसमें सुनवाई का कोई विधिक तंत्र मौजूद नहीं है।
4. सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव (Social)
मानसिक तनाव और असुरक्षा: लक्ष्य पूरा करने (Target-based work) का दबाव और निरंतर निगरानी (Surveillance) युवाओं में उच्च स्तर का तनाव, अवसाद और नींद की कमी (Sleep Deprivation) उत्पन्न कर रही है।
कौशल विकास का अभाव: गिग कार्य मुख्य रूप से निम्न-कौशल (Low-skill) आधारित हैं। इसमें 'अपस्किलिंग' (Upskilling) की कोई संभावना न होने के कारण यह युवाओं को करियर के एक दुष्चक्र (Dead-end job) में फंसा देता है।
गिग इकॉनमी के विनियमन हेतु किए गए नीतिगत प्रयास
सामाजिक सुरक्षा संहिता (Code on Social Security), 2020: भारत वैश्विक स्तर पर उन गिने-चुने देशों में है, जिसने इस संहिता की धारा 2(35) में 'गिग वर्कर' को कानूनी रूप से परिभाषित किया है और उनके लिए एक राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड (National Social Security Board) के गठन का प्रावधान किया है।
ई-श्रम (e-Shram) पोर्टल: असंगठित और गिग श्रमिकों का राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार किया जा रहा है, ताकि लक्षित कल्याणकारी योजनाएं लागू की जा सकें।
राजस्थान मॉडल: राजस्थान गिग वर्कर्स (पंजीकरण और कल्याण) अधिनियम, 2023 देश का पहला ऐसा कानून है, जो प्लेटफॉर्म आधारित लेन-देन पर उपकर (Cess) लगाकर श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा कोष का निर्माण करता है।
आगे की राह (Way Forward)
भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश को जनसांख्यिकीय आपदा (Demographic Disaster) में बदलने से रोकने के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण अपरिहार्य है, जो नवाचार को भी बचाए और श्रम अधिकारों को भी:
त्रिपक्षीय तंत्र की स्थापना: सरकार, एग्रीगेटर कंपनियों और श्रमिक संघों के बीच संवाद का एक संस्थागत मंच बनाया जाना चाहिए।
'फेयरवर्क' (Fairwork) सिद्धांतों का अनुपालन: न्यूनतम उचित वेतन, उचित कार्य स्थिति, उचित प्रबंधन और निष्पक्ष प्रतिनिधित्व को अनिवार्य मानक बनाया जाए।
डेटा संप्रभुता और पारदर्शिता: एल्गोरिथम की कार्यप्रणाली (विशेषकर पेनल्टी और डी-रजिस्ट्रेशन के मामले में) को पारदर्शी बनाना और उसमें मानवीय अपील का विकल्प जोड़ना आवश्यक है।
सामाजिक सुरक्षा कोष का संचालन: सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के प्रावधानों को राज्यों द्वारा अविलंब लागू किया जाना चाहिए, जिसमें प्लेटफॉर्म कंपनियों के राजस्व का एक निश्चित प्रतिशत (1-2%) श्रमिक कल्याण कोष में जमा हो।
गिग इकॉनमी 21वीं सदी के डिजिटल रोजगार परिदृश्य की एक अपरिहार्य वास्तविकता है। यह नवाचार और आर्थिक गतिशीलता का एक सशक्त माध्यम है, परंतु इसे विधिक शून्यता की आड़ में 'आधुनिक गुलामी' का पर्याय बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती। सतत विकास लक्ष्य-8 (SDG-8: उत्कृष्ट कार्य और आर्थिक वृद्धि) की प्राप्ति के लिए पूंजी और श्रम के बीच एक न्यायसंगत संतुलन स्थापित करना होगा। 'विकसित भारत 2047' का स्वप्न केवल तकनीकी प्रगति से नहीं, बल्कि एक सुरक्षित, गरिमापूर्ण और सशक्त युवा कार्यबल के कंधों पर ही साकार हो सकता है।