कृषि में तकनीक का उपयोगः भारतीय किसानों की दशा और दिशा बदलने का साधन ।

 Q. कृषि में तकनीक का उपयोगः भारतीय किसानों की दशा और दिशा बदलने का साधन ।

Ans - 

आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय कृषि क्षेत्र देश के लगभग 45% कार्यबल को रोजगार प्रदान करता है, परंतु सकल मूल्य वर्धन (GVA) में इसका योगदान लगभग 18% तक ही सीमित है। वर्तमान में भारतीय कृषि कम उत्पादकता, खंडित जोत, बिचौलियों के प्रभुत्व और जलवायु परिवर्तन के त्रिकोणीय संकट से जूझ रही है। इस संदर्भ में, अशोक दलवई समिति (किसानों की आय दोगुनी करने पर समिति) ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया था कि पारंपरिक कृषि से 'कृषि 4.0' (Agriculture 4.0) की ओर संक्रमण, यानी तकनीकी हस्तक्षेप, अब कोई विकल्प नहीं बल्कि एक रणनीतिक अनिवार्यता है।

कृषि में तकनीक का समावेश न केवल खेती की पद्धतियों (दिशा) को आधुनिक बना रहा है, बल्कि कृषकों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति (दशा) में भी एक प्रतिमान विस्थापन (Paradigm Shift) ला रहा है।

तकनीकी एकीकरण: किसानों की दशा और दिशा में परिवर्तन (बहुआयामी प्रभाव)

तकनीक का अनुप्रयोग कृषि मूल्य श्रृंखला (Agriculture Value Chain) के हर चरण—बुवाई से लेकर बाजार तक—को सुव्यवस्थित कर रहा है। इसे निम्नलिखित PESTLE (राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी, विधिक, पर्यावरणीय) दृष्टिकोण से समझा जा सकता है:

1. तकनीकी और आर्थिक रूपांतरण (Technological & Economic)

  • सटीक कृषि (Precision Farming): कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) आधारित सेंसर मृदा की नमी और पोषक तत्वों की सटीक जानकारी देते हैं। इससे इनपुट लागत में कमी आती है और उत्पादकता बढ़ती है।

  • मूल्य खोज (Price Discovery) और बाजार पहुँच: राष्ट्रीय कृषि बाजार (e-NAM) और 'एगमार्कनेट' (AGMARKNET) जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म किसानों को अखिल भारतीय बाजार तक पहुँच प्रदान कर बिचौलियों के एकाधिकार को समाप्त कर रहे हैं।

  • ड्रोन प्रौद्योगिकी का उद्भव: 'किसान ड्रोन' (Kisan Drones) के माध्यम से कीटनाशकों का लक्षित छिड़काव, फसल मूल्यांकन और भू-अभिलेखों का डिजिटलीकरण (स्वामित्व योजना के तहत) श्रम लागत और समय की भारी बचत कर रहा है।

2. सामाजिक और संस्थागत सशक्तिकरण (Social)

  • सूचना विषमता (Information Asymmetry) का अंत: स्मार्टफोन की बढ़ती पैठ और 'किसान ई-मित्र' (AI चैटबॉट) जैसी सुविधाओं ने दूरदराज के क्षेत्रों में स्थित 86% छोटे और सीमांत किसानों को मौसम, मंडी भाव और सरकारी योजनाओं की रीयल-टाइम जानकारी से सशक्त किया है।

  • वित्तीय समावेशन: ब्लॉकचेन तकनीक और फिनटेक (FinTech) स्टार्टअप्स के माध्यम से किसानों को त्वरित कृषि ऋण और फसल बीमा (PMFBY के तहत सैटेलाइट इमेजरी द्वारा दावों का शीघ्र निपटान) तक निर्बाध पहुँच मिल रही है।

3. पर्यावरणीय और पारिस्थितिक स्थिरता (Environmental)

  • जलवायु-स्मार्ट कृषि (Climate-Smart Agriculture): 'मेघदूत' (Meghdoot) ऐप जैसे मौसम पूर्वानुमान मॉडल किसानों को जलवायु परिवर्तन की अनिश्चितताओं के प्रति लचीला (Resilient) बना रहे हैं।

  • संसाधन दक्षता: 'पर ड्रॉप मोर क्रॉप' (Per Drop More Crop) के तहत माइक्रो-इरिगेशन (सूक्ष्म सिंचाई) तकनीक जल उपयोग दक्षता (Water Use Efficiency) को बढ़ा रही है, जो भूजल के गिरते स्तर को रोकने में अत्यंत कारगर है।

तकनीकी क्रांति के मार्ग में विद्यमान संरचनात्मक चुनौतियाँ

  • डिजिटल डिवाइड (Digital Divide): ग्रामीण भारत में आज भी विश्वसनीय इंटरनेट कनेक्टिविटी, निर्बाध बिजली आपूर्ति और डिजिटल साक्षरता का अभाव एक बड़ी बाधा है।

  • पूंजीगत बाधाएं: सीमांत किसानों के लिए एग्री-ड्रोन, सेंसर या स्मार्ट ट्रैक्टर जैसी उन्नत तकनीकों की उच्च प्रारंभिक लागत (High Capital Cost) वहन करना अव्यावहारिक है।

  • विधिक और डेटा गोपनीयता (Data Privacy): एग्रीस्टैक (AgriStack) जैसी पहलों के माध्यम से डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) तैयार किया जा रहा है, परंतु किसानों के संवेदनशील कृषि-डेटा की सुरक्षा और मुद्रीकरण के संदर्भ में एक मजबूत विधिक ढांचे का अभाव है।

  • विखंडित जोत (Fragmented Landholdings): भारत में औसत कृषि जोत का आकार 1.08 हेक्टेयर रह गया है, जहाँ मशीनीकरण और बड़े पैमाने की तकनीकी परियोजनाओं को लागू करना व्यावसायिक रूप से कठिन है।

आगे की राह (Way Forward)

कृषि में तकनीक के लोकतंत्रीकरण (Democratization of Technology) के लिए एक बहुआयामी संस्थागत और नीतिगत दृष्टिकोण की आवश्यकता है:

  • FPOs को 'तकनीकी हब' के रूप में विकसित करना: उच्च लागत वाली तकनीक को वहनीय बनाने के लिए किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को कस्टम हायरिंग सेंटर (Custom Hiring Centres - CHC) के रूप में सशक्त किया जाना चाहिए, जिससे 'पे-पर-यूज' (Pay-per-use) मॉडल पर छोटी जोत वाले किसान भी तकनीक का लाभ ले सकें।

  • अनुसंधान और विकास (R&D) में निवेश: नीति आयोग के अनुसार, एग्रीटेक स्टार्टअप्स और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) को बढ़ावा देकर स्थानीयकृत और सस्ती तकनीकी (Frugal Innovation) का निर्माण किया जाना चाहिए।

  • एग्री-डिजिटल अवसंरचना (Digital Public Infrastructure): 'डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन' के तहत कृषि-डेटा शासन (Agri-Data Governance) नीतियों को स्पष्ट करते हुए एक सुरक्षित और पारदर्शी एग्रीस्टैक का शीघ्र क्रियान्वयन सुनिश्चित करना।

कृषि में तकनीक का समावेश केवल उत्पादन बढ़ाने का यांत्रिक उपकरण नहीं है, बल्कि यह कृषक कल्याण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के कायाकल्प का एक व्यापक दर्शन है। सतत विकास लक्ष्य-2 (शून्य भुखमरी) और SDG-1 (गरीबी उन्मूलन) की प्राप्ति बिना कृषि के आधुनिकीकरण के संभव नहीं है। 'अमृत काल' की इस वेला में, तकनीकी हस्तक्षेपों का प्रभावी क्रियान्वयन ही वह निर्णायक सेतु है, जो भारतीय किसान को पारंपरिक 'अन्नदाता' से आधुनिक 'स्मार्ट कृषक' और 'ऊर्जादाता' में रूपांतरित कर 'विकसित भारत 2047' के राष्ट्रीय संकल्प को यथार्थ में परिवर्तित करेगा।

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