जल संकटः तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा।
Q. जल संकटः तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा।
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विश्व बैंक के पूर्व उपाध्यक्ष इस्माइल सेरागेल्डिन का यह प्रसिद्ध कथन कि "21वीं सदी के युद्ध पानी के लिए लड़े जाएंगे", वर्तमान वैश्विक पारिस्थितिकी और भू-राजनीतिक परिदृश्य में एक यथार्थपरक चेतावनी प्रतीत होता है। संयुक्त राष्ट्र विश्व जल विकास रिपोर्ट के अनुसार, विश्व की लगभग आधी आबादी वर्तमान में वर्ष के कुछ हिस्सों में गंभीर पानी की कमी का सामना कर रही है। भारत के संदर्भ में, नीति आयोग के समग्र जल प्रबंधन सूचकांक (CWMI) ने स्पष्ट किया है कि देश अपने इतिहास के सबसे गंभीर जल संकट से गुजर रहा है, जहाँ लाखों लोगों की स्वच्छ जल तक पहुँच सुनिश्चित नहीं है।
जल अब केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं रह गया है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और कूटनीतिक शक्ति का एक प्रमुख रणनीतिक उपकरण (Strategic Tool) बन चुका है।
जल संकट और संभावित संघर्ष के बहुआयामी कारण (PESTLE विश्लेषण)
जल संकट के उद्भव और इसके कारण उत्पन्न होने वाले संघर्षों की प्रकृति बहुआयामी है, जिसे निम्नलिखित आधारों पर समझा जा सकता है:
1. पर्यावरणीय और भौगोलिक (Environmental & Geographical)
जलवायु परिवर्तन और चरम मौसम: ग्लोबल वार्मिंग के कारण मानसून के पैटर्न में अनियमितता, ग्लेशियरों का पिघलना और लंबे समय तक चलने वाला सूखा जल स्रोतों को समाप्त कर रहा है।
भूजल का अतिदोहन: केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के अनुसार, भारत के कई ब्लॉक अति-दोहित (Over-exploited) श्रेणी में आ चुके हैं। जलभृतों (Aquifers) का सूखना स्थानीय स्तर पर समुदायों के मध्य हिंसक संघर्षों को जन्म दे रहा है।
2. आर्थिक और कृषि-संबंधी (Economic & Agricultural)
जल-सघन फसलों का प्रभुत्व: भारत में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और सब्सिडी संरचना का झुकाव धान और गन्ने जैसी जल-सघन फसलों की ओर रहा है। यह कृषि-पारिस्थितिकी (Agro-ecology) के प्रतिकूल है और वर्चुअल वाटर (Virtual Water) के भारी निर्यात का कारण बन रहा है।
औद्योगिक प्रदूषण: उद्योगों द्वारा बिना शोधित अपशिष्ट जल को नदियों में प्रवाहित करने से मीठे पानी के सीमित स्रोत भी उपयोग के अयोग्य हो रहे हैं।
3. राजनीतिक और भू-राजनीतिक (Political & Geopolitical)
अंतर्राष्ट्रीय 'हाइड्रो-हेजेमनी' (Hydro-Hegemony): ऊपरी तटवर्ती देश (Upper Riparian States) जल को एक राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग कर रहे हैं।
भारत-चीन संदर्भ: ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन द्वारा 'रन-ऑफ-द-रिवर' (RoR) और विशाल बांधों का निर्माण भारत के लिए रणनीतिक चिंता का विषय है, क्योंकि इससे जल प्रवाह को कृत्रिम रूप से नियंत्रित किया जा सकता है।
वैश्विक संदर्भ: नील नदी पर इथियोपिया का 'ग्रैंड रेनेसां डैम' (GERD विवाद) इथियोपिया और मिस्र के बीच युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न कर चुका है।
अंतर-राज्यीय जल विवाद: भारत के भीतर कावेरी (कर्नाटक-तमिलनाडु), सतलुज-यमुना लिंक नहर (पंजाब-हरियाणा) और महादयी नदी विवाद बढ़ते राजनीतिक ध्रुवीकरण और क्षेत्रीय तनाव का प्रमाण हैं।
4. विधिक और संस्थागत (Legal & Institutional)
विवाद समाधान तंत्र की विफलता: संविधान के अनुच्छेद 262 और अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत स्थापित ट्रिब्यूनल अक्सर लंबी न्यायिक प्रक्रिया और निर्णयों के क्रियान्वयन में राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण अप्रभावी रहे हैं।
संवैधानिक ढांचा और विधिक दृष्टिकोण (मूल्यवर्धन)
जल प्रबंधन और अधिकारों को लेकर भारतीय संविधान और न्यायपालिका का स्पष्ट दृष्टिकोण है:
मौलिक अधिकार: सर्वोच्च न्यायालय ने सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य (1991) मामले में स्पष्ट किया है कि प्रदूषण मुक्त जल तक पहुंच अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का अभिन्न अंग है।
विधायी अधिकार: जल राज्य सूची का विषय (प्रविष्टि 17) है, जबकि केंद्र सरकार अंतर-राज्यीय नदियों के विनियमन (प्रविष्टि 56) का अधिकार रखती है। इस शक्ति विभाजन के कारण अक्सर केंद्र और राज्यों के बीच नीतिगत समन्वय का अभाव दिखता है।
जल युद्ध की संभावना को टालने हेतु रणनीतिक समाधान
भविष्य के संघर्षों को रोकने के लिए 'हाइड्रो-पॉलिटिक्स' को 'हाइड्रो-डिप्लोमेसी' (जल-कूटनीति) में परिवर्तित करना अनिवार्य है:
संस्थागत सुधार: डॉ. मिहिर शाह समिति की अनुशंसाओं के अनुरूप, केंद्रीय जल आयोग (CWC) और केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) का विलय कर एक एकीकृत 'राष्ट्रीय जल आयोग' (NWC) का गठन किया जाना चाहिए, जो जल प्रबंधन को समग्र (Holistic) दृष्टिकोण से देखे।
कृषि पद्धतियों में बदलाव: 'पर ड्रॉप मोर क्रॉप' (Per Drop More Crop) के तहत सूक्ष्म सिंचाई (Micro-irrigation) को अनिवार्य बनाना और कृषि-जलवायु क्षेत्रों (Agro-climatic zones) के अनुसार फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को लागू करना।
चक्रीय जल अर्थव्यवस्था (Circular Water Economy): अपशिष्ट जल के शोधन और पुनरुपयोग (Wastewater recycling) को बढ़ावा देना। इजरायल का जल प्रबंधन मॉडल, जो अपने 85% से अधिक अपशिष्ट जल का पुनरुपयोग करता है, एक उत्कृष्ट वैश्विक प्रथा है।
सशक्त जल-कूटनीति: अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 'संयुक्त राष्ट्र जल-प्रवाह कन्वेंशन' (UN Watercourses Convention) जैसे विधिक ढांचों को मजबूत करना और पड़ोसियों के साथ डेटा-साझाकरण (Data sharing) को पारदर्शी बनाना।
जल संकट को लेकर तीसरा विश्व युद्ध कोई अपरिहार्य नियति नहीं है, बल्कि यह हमारे वर्तमान जल प्रबंधन की विफलताओं का एक संभावित परिणाम है। सतत विकास लक्ष्य-6 (SDG-6: स्वच्छ जल और स्वच्छता) की प्राप्ति केवल अवसंरचनात्मक विकास से नहीं, बल्कि जल शासन (Water Governance) में विकेंद्रीकरण, जनभागीदारी (जल शक्ति अभियान की तर्ज पर) और पारिस्थितिक बुद्धिमत्ता से ही संभव है। 'अमृत काल' में भारत को जल-तनाव ग्रस्त राष्ट्र से जल-सुरक्षित राष्ट्र की ओर बढ़ना होगा। नदियों को सीमाओं में बांटने के बजाय, उन्हें सभ्यताओं को जोड़ने वाले सूत्र के रूप में मान्यता देनी होगी, तभी हम 'वसुधैव कुटुम्बकम' के वास्तविक अर्थों को चरितार्थ करते हुए एक शांतिपूर्ण और सुरक्षित वैश्विक भविष्य का निर्माण कर सकेंगे।