आर्थिक विकास बनाम पर्यावरण संरक्षणः क्या दोनों एक साथ संभव हैं?
Q. आर्थिक विकास बनाम पर्यावरण संरक्षणः क्या दोनों एक साथ संभव हैं?
Ans -
ब्रंटलैंड आयोग (1987) की रिपोर्ट 'अवर कॉमन फ्यूचर' (Our Common Future) ने पहली बार यह स्पष्ट किया कि आर्थिक संवृद्धि और पारिस्थितिक संतुलन परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। वर्तमान संदर्भ में, जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) की छठी मूल्यांकन रिपोर्ट (AR6) चेतावनी देती है कि अनियंत्रित आर्थिक विस्तार ने पृथ्वी की वहन क्षमता (Carrying Capacity) को गंभीर खतरे में डाल दिया है। भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था के समक्ष एक दोहरा नीतिगत असमंजस है: एक ओर उसे लाखों नागरिकों को गरीबी से बाहर निकालने के लिए तीव्र औद्योगीकरण की आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर वह जलवायु परिवर्तन के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील राष्ट्रों में से एक है।
आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के मध्य का यह संबंध 'जीरो-सम गेम' (Zero-Sum Game) नहीं है, बल्कि यह सतत विकास (Sustainable Development) की अवधारणा के माध्यम से एक साथ प्राप्त किया जा सकने वाला लक्ष्य है।
आर्थिक संवृद्धि और पर्यावरणीय क्षरण के मध्य अंतर्निहित द्वंद्व
परंपरागत रूप से, विकास के मॉडल संसाधन-गहन (Resource-intensive) रहे हैं, जिसके कारण अर्थशास्त्र और पारिस्थितिकी के बीच तनाव उत्पन्न हुआ है:
संसाधनों का अतिदोहन: जीडीपी वृद्धि अक्सर जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम) और प्राकृतिक संसाधनों के बेलगाम दोहन पर आधारित होती है, जो कार्बन उत्सर्जन और जैव विविधता की हानि का मुख्य कारण है।
नकारात्मक बाह्यताएं (Negative Externalities): औद्योगीकरण से उत्पन्न वायु और जल प्रदूषण की सामाजिक लागत (Social Cost) को अक्सर बाजार मूल्य में शामिल नहीं किया जाता है। विश्व बैंक के अनुसार, पर्यावरणीय क्षरण के कारण भारत को प्रतिवर्ष अपनी जीडीपी का लगभग 5.7% नुकसान होता है।
अवसंरचना बनाम पारिस्थितिकी तंत्र: हिमालयी क्षेत्र में अनियंत्रित निर्माण (जैसे जोशीमठ भू-धंसाव) और बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट विकास और पारिस्थितिकी के मध्य के सीधे टकराव को रेखांकित करते हैं।
द्वंद्व का बहुआयामी विश्लेषण (PESTLE दृष्टिकोण)
1. आर्थिक और तकनीकी (Economic & Technological)
पर्यावरणीय कुजनेट्स वक्र (Environmental Kuznets Curve): यह सिद्धांत सुझाता है कि विकास के प्रारंभिक चरण में प्रदूषण बढ़ता है, लेकिन एक निश्चित आय स्तर के बाद तकनीकी नवाचार से इसमें गिरावट आती है। हालांकि, जलवायु संकट की तात्कालिकता हमें इस प्राकृतिक सुधार की प्रतीक्षा करने की अनुमति नहीं देती है।
स्वच्छ प्रौद्योगिकियों की लागत: हरित ऊर्जा और कार्बन कैप्चर जैसी तकनीकी का प्रारंभिक पूंजीगत व्यय बहुत अधिक है, जो विकासशील राष्ट्रों की राजकोषीय क्षमता पर दबाव डालता है।
2. सामाजिक और विधिक (Social & Legal)
जलवायु न्याय (Climate Justice): पर्यावरणीय क्षरण का सबसे प्रतिकूल प्रभाव हाशिए पर रहने वाले समुदायों पर पड़ता है। विकास का लाभ समाज के उच्च वर्ग को मिलता है, जबकि प्रदूषण और विस्थापन की कीमत गरीब चुकाते हैं।
ईआईए (EIA) मानदंडों में शिथिलता: 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' (Ease of Doing Business) को बढ़ावा देने के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment) प्रक्रियाओं को शिथिल करने की प्रवृत्ति विधिक और पारिस्थितिक संतुलन को कमजोर करती है।
सह-अस्तित्व की संभावना: दोनों एक साथ कैसे संभव हैं?
नीतिगत नवाचार और संरचनात्मक बदलावों के माध्यम से आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण का सह-अस्तित्व न केवल संभव है, बल्कि भविष्य के लिए अनिवार्य भी है:
आर्थिक वृद्धि की डिकपलिंग (Decoupling): आर्थिक संवृद्धि को संसाधन खपत और कार्बन उत्सर्जन से पूर्णतः अलग करना (Absolute Decoupling)। यह ऊर्जा दक्षता बढ़ाकर और नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग से संभव है।
चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy): नीति आयोग चक्रीय अर्थव्यवस्था (Reduce, Reuse, Recycle, Refurbish) पर जोर दे रहा है, जो अपशिष्ट को संसाधन में बदलकर आर्थिक मूल्य उत्पन्न करता है और पर्यावरण को बचाता है।
ग्रीन अकाउंटिंग (Green GDP): राष्ट्रीय आय की गणना करते समय प्राकृतिक संसाधनों की कमी और पर्यावरणीय क्षति को जीडीपी से घटाकर 'ग्रीन जीडीपी' का आकलन करना, जिससे नीति-निर्माताओं को वास्तविक संवृद्धि का पता चल सके।
ईएसजी (ESG) अनुपालन और हरित वित्त: कॉरपोरेट क्षेत्र में पर्यावरण, सामाजिक और शासन (ESG) मानदंडों को लागू करना। भारत सरकार द्वारा सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड (Sovereign Green Bonds) जारी करना हरित अवसंरचना के वित्तपोषण का एक उत्कृष्ट साधन है।
भारत के नीतिगत और विधिक प्रयास (मूल्यवर्धन)
भारत ने विकास और पर्यावरण के संतुलन को अपने संवैधानिक और नीतिगत ढांचे में गहराई से पिरोया है:
संवैधानिक जनादेश: अनुच्छेद 48A (राज्य के नीति निदेशक तत्व) राज्य को पर्यावरण संरक्षण का निर्देश देता है, जबकि अनुच्छेद 51A(g) इसे नागरिकों का मौलिक कर्तव्य बनाता है।
सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण: एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत प्रदूषण मुक्त पर्यावरण को मौलिक अधिकार माना है। न्यायालय ने 'प्रदूषक भुगतान करे' (Polluter Pays) और 'सार्वजनिक न्यास सिद्धांत' (Public Trust Doctrine) को विधिक मान्यता दी है।
वैश्विक प्रतिबद्धता: COP-26 में भारत द्वारा घोषित 'पंचामृत' (Panchamrit) लक्ष्य (2070 तक नेट-जीरो) और LiFE मूवमेंट (पर्यावरण के लिए जीवन शैली) विकास को पारिस्थितिक सीमाओं के भीतर रखने के वैश्विक प्रयास हैं।
आगे की राह (Way Forward)
आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण को परस्पर विरोधी मानना एक संकीर्ण दृष्टिकोण है; वास्तविकता में दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता एक स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र पर ही निर्भर करती है। सतत विकास लक्ष्य-8 (उत्कृष्ट कार्य और आर्थिक वृद्धि) और SDG-13 (जलवायु कार्रवाई) के मध्य तालमेल स्थापित करने के लिए भारत को अपनी नीतियों में इको-सेंट्रिक (Eco-centric) दृष्टिकोण को प्राथमिकता देनी होगी। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) की अनुशंसाओं के अनुरूप पर्यावरणीय शासन को विकेंद्रीकृत और पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है।
अंततः, विकास का पैमाना केवल भौतिक संपदा का संचय नहीं हो सकता। 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें अंतर-पीढ़ीगत समता (Intergenerational Equity) को सुनिश्चित करना होगा। प्रकृति के साथ पूर्ण सामंजस्य स्थापित करके ही हम 'वसुधैव कुटुम्बकम' के सभ्यतागत दर्शन को यथार्थ रूप दे सकते हैं, जहाँ आर्थिक प्रगति मानव और पृथ्वी दोनों के लिए कल्याणकारी हो।