भारत का जनसांख्यिकीय लाभांशः एक अवसर या टाइम बम?

 Q. भारत का जनसांख्यिकीय लाभांशः एक अवसर या टाइम बम?

Ans - 

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) के अनुसार, जनसांख्यिकीय लाभांश का तात्पर्य उस आर्थिक संवृद्धि की संभावना से है, जो किसी देश की जनसंख्या की आयु संरचना में बदलाव के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती है। यह स्थिति तब निर्मित होती है जब कार्यशील आयु की आबादी (15-64 वर्ष) आश्रित आबादी (बच्चों और बुजुर्गों) से अधिक हो जाती है। वर्तमान में, भारत की औसत आयु मात्र 28 वर्ष है और इसकी लगभग 68% आबादी कार्यशील आयु वर्ग में है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत के लिए यह जनसांख्यिकीय अवसर की खिड़की वर्ष 2055 तक खुली है, जो इसे एक वैश्विक आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने का एक अद्वितीय अवसर प्रदान करती है।

जनसांख्यिकीय लाभांश: एक अभूतपूर्व रणनीतिक अवसर

भारत की वर्तमान जनसांख्यिकीय संरचना बहुआयामी विकास के लिए निम्नलिखित अवसर प्रस्तुत करती है:

  • आर्थिक विकास और पूंजी निर्माण: उच्च कार्यशील जनसंख्या प्रत्यक्ष रूप से प्रति व्यक्ति आय और राष्ट्रीय बचत दर में वृद्धि करती है। इससे पूंजी निर्माण को बढ़ावा मिलता है, जो 'मेक इन इंडिया' और उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) जैसी पहलों के लिए आवश्यक वित्तीय तरलता एवं सस्ता श्रम प्रदान करता है।

  • वैश्विक जनसांख्यिकीय विषमता का लाभ: जब जापान, चीन और अधिकांश पश्चिमी राष्ट्र 'वृद्ध होती आबादी' (Aging Population) की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं, भारत विश्व की 'मानव संसाधन राजधानी' के रूप में उभर सकता है। भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्थाओं को कुशल श्रम का निर्यात कर सकता है।

  • प्रौद्योगिकी और नवाचार: भारत की युवा आबादी डिजिटल रूप से साक्षर और तकनीकी रूप से अनुकूलनीय है। यह जनसांख्यिकीय आधार ही वह प्रमुख कारण है जिससे भारत आज विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है।

  • सामाजिक गतिशीलता: शहरीकरण और आर्थिक स्वतंत्रता के परिणामस्वरूप छोटे परिवारों का चलन बढ़ा है। इससे प्रति बच्चा शिक्षा और स्वास्थ्य पर होने वाले निवेश (Human Capital Investment) में गुणात्मक सुधार हो रहा है।

टाइम बम के रूप में जनसांख्यिकीय लाभांश: प्रमुख चुनौतियाँ

यदि इस विशाल मानव संसाधन का उचित और समयबद्ध प्रबंधन नहीं किया गया, तो यह अवसर एक 'जनसांख्यिकीय आपदा' (Demographic Disaster) में बदल सकता है। इसका PESTLE (राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी, विधिक, पर्यावरणीय) विश्लेषण निम्नलिखित है:

1. आर्थिक चुनौतियाँ (Economic)

  • रोजगारविहीन संवृद्धि (Jobless Growth): भारत की जीडीपी संवृद्धि दर उच्च रही है, परंतु उस अनुपात में रोजगार का सृजन नहीं हुआ है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि उच्च शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी दर चिंताजनक स्तर पर है।

  • अनौपचारिक क्षेत्र का प्रभुत्व: भारत का लगभग 90% कार्यबल असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है, जहाँ रोजगार स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा (Social Security) का सर्वथा अभाव है।

2. सामाजिक चुनौतियाँ (Social)

  • रोजगार योग्यता (Employability) का संकट: इंडिया स्किल्स रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 50% से भी कम स्नातक उद्योग की माँग के अनुरूप सीधे रोजगार के योग्य हैं। अकादमिक शिक्षा और औद्योगिक आवश्यकताओं के बीच एक गहरा संरचनात्मक अंतर है।

  • महिला श्रम बल भागीदारी दर (FLFPR): यद्यपि हाल के आंकड़ों में मामूली सुधार दिखा है, फिर भी भारतीय महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी (लगभग 37%) वैश्विक मानकों की तुलना में काफी कम है। यह देश की आधी आबादी की उत्पादक क्षमता के अवमूल्यन को दर्शाता है।

  • स्वास्थ्य और पोषण का बोझ: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के आंकड़े दर्शाते हैं कि बच्चों और महिलाओं में कुपोषण, स्टंटिंग एवं एनीमिया का उच्च स्तर एक स्वस्थ और उत्पादक मानव पूंजी के विकास में बहुत बड़ी बाधा है।

3. तकनीकी चुनौतियाँ (Technological)

  • उद्योग 4.0 और स्वचालन (Automation): कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स, और मशीन लर्निंग के व्यापक प्रसार से पारंपरिक और कम-कौशल वाली (Low-skilled) नौकरियों के लुप्त होने का गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।

4. राजनीतिक एवं विधिक चुनौतियाँ (Political & Legal)

  • सामाजिक अशांति और कानून-व्यवस्था: बढ़ती बेरोजगारी और आय की असमानता युवाओं में गहरी हताशा पैदा कर सकती है। यह असंतोष अपराध, उग्रवाद और हिंसक विरोध प्रदर्शनों के रूप में प्रकट हो सकता है, जो राज्य के विधिक ढांचे और आंतरिक सुरक्षा पर भारी दबाव डालता है।

जनसांख्यिकीय अवसर को भुनाने हेतु रणनीतिक समाधान

  • शिक्षा और कौशल का पुनर्गठन: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के प्रावधानों के तहत व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Training) को विद्यालयी स्तर से ही मुख्यधारा में एकीकृत करना अनिवार्य है। नीति आयोग के 'स्किल इंडिया मिशन' को भविष्य की तकनीकों (Deep Tech) के प्रति उन्मुख करने की आवश्यकता है।

  • श्रम सुधारों का त्वरित क्रियान्वयन: निवेश और औपचारिक रोजगार सृजन को बढ़ावा देने के लिए संसद द्वारा पारित चार श्रम संहिताओं (Labour Codes) का राज्यों द्वारा प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

  • स्वास्थ्य अवसंरचना सुदृढ़ीकरण: आयुष्मान भारत और पोषण अभियान 2.0 के माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार करना आवश्यक है, ताकि सतत विकास लक्ष्य-3 (उत्तम स्वास्थ्य) को प्राप्त किया जा सके।

  • MSME क्षेत्र का सशक्तिकरण: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) भारत में रोजगार सृजन के प्राथमिक इंजन हैं। इन्हें संस्थागत ऋण, तकनीकी सहायता और वैश्विक बाजारों तक पहुँच प्रदान करना अर्थव्यवस्था की रीढ़ को मजबूत करेगा।

भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश अपने आप में कोई स्वत: प्राप्त होने वाला प्रतिफल नहीं है, बल्कि यह केवल एक समयबद्ध संभावना है। यदि राज्य इस युवा ऊर्जा को शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल के माध्यम से सही दिशा देने में विफल रहता है, तो यह निःसंदेह एक विनाशकारी टाइम बम सिद्ध होगा। सतत विकास लक्ष्य-8 (उत्कृष्ट कार्य और आर्थिक वृद्धि) की प्राप्ति के लिए मानव पूंजी में लक्षित निवेश अपरिहार्य है। 'अमृत काल' की इस महत्वपूर्ण वेला में, केवल दूरदर्शी संरचनात्मक सुधारों और नीतिगत दृढ़ता के माध्यम से ही भारत अपनी जनसांख्यिकीय क्षमता को यथार्थ में परिवर्तित कर सकता है, और वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' के अपने राष्ट्रीय संकल्प को सिद्ध कर सकता है।

🛍️ ऑनलाइन शॉपिंग करें
Amazon, Flipkart, Myntra और AJIO पर खरीदारी करें
यहाँ से खरीदारी करने पे एक्स्ट्रा डिस्काउंट मिल सकता है।
Next Post Previous Post
हमसे जुड़ें
1