'गरीबी कहीं भी हो, वह हर जगह की समृद्धि के लिए खतरा है।'
Q. 'गरीबी कहीं भी हो, वह हर जगह की समृद्धि के लिए खतरा है।'
Ans -
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के फिलाडेल्फिया घोषणापत्र (1944) से उद्धृत यह युगांतरकारी कथन केवल एक नैतिक आदर्श नहीं है, बल्कि वैश्वीकृत विश्व का एक कठोर भू-राजनीतिक और आर्थिक यथार्थ है। वर्तमान समय में, जब विश्व एक परस्पर निर्भर 'वैश्विक ग्राम' (Global Village) में परिवर्तित हो चुका है, किसी एक क्षेत्र की गरीबी, भुखमरी और वंचना भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहती। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) 2023 के अनुसार, आज भी विश्व के 1.1 अरब लोग गंभीर बहुआयामी गरीबी में जीवन यापन कर रहे हैं। यह वंचना न केवल उन वंचितों के लिए त्रासदी है, बल्कि यह प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से वैश्विक शांति, स्थिरता और विकसित राष्ट्रों की समृद्धि (Prosperity) के लिए एक गहरा संकट उत्पन्न करती है।
गरीबी किस प्रकार सर्वव्यापी समृद्धि के लिए खतरा है? (PESTLE विश्लेषण)
गरीबी के 'स्पिलओवर प्रभाव' (Spillover Effects) बहुआयामी हैं, जो एक स्थानीय समस्या को वैश्विक संकट में बदल देते हैं:
1. राजनीतिक और सुरक्षात्मक अस्थिरता (Political)
कट्टरपंथ और आतंकवाद का प्रसार: गरीबी और बेरोजगारी युवाओं में हताशा को जन्म देती है, जिससे वे आसानी से चरमपंथी विचारधाराओं (Radicalization) और गैर-राज्य अभिनेताओं (Non-state actors) के शिकार हो जाते हैं। मध्य पूर्व और अफ्रीका के साहेल क्षेत्र (Sahel Region) की गरीबी ने वैश्विक आतंकवाद और समुद्री डकैती (जैसे- सोमालिया) को बढ़ावा दिया है, जिसने अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों को असुरक्षित कर दिया है।
लोकतांत्रिक संस्थाओं का पतन: अत्यधिक गरीबी राजनीतिक अस्थिरता, तख्तापलट और गृहयुद्ध (जैसे- सूडान, यमन) को जन्म देती है, जो क्षेत्रीय भू-राजनीतिक संतुलन को बाधित करता है।
2. आर्थिक दुष्परिणाम और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान (Economic)
वैश्विक मांग और बाजार में संकुचन: यदि विश्व का एक बड़ा हिस्सा गरीब रहता है, तो उनकी क्रय शक्ति (Purchasing Power) नगण्य होती है, जिससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विकसित राष्ट्रों के लिए नए बाजारों का विस्तार रुक जाता है।
मानव पूंजी का ह्रास: कुपोषण और अशिक्षा के कारण एक बड़ी आबादी 'जनसांख्यिकीय लाभांश' (Demographic Dividend) के बजाय 'जनसांख्यिकीय बोझ' बन जाती है, जिससे वैश्विक जीडीपी (Global GDP) को अपूरणीय क्षति होती है।
3. सामाजिक संकट और अनियंत्रित प्रवासन (Social)
शरणार्थी संकट (Refugee Crisis): आर्थिक विपन्नता लोगों को अवैध और खतरनाक प्रवासन (Illegal Migration) के लिए विवश करती है। भूमध्य सागर पार कर यूरोप पहुंचने वाले प्रवासियों का संकट विकसित देशों के सामाजिक ताने-बाने, जनसांख्यिकी और कल्याणकारी बजट (Welfare Budget) पर अत्यधिक दबाव डालता है।
वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा (Global Health Security): गरीब क्षेत्रों में कमजोर स्वास्थ्य ढांचा संक्रामक रोगों का केंद्र बन सकता है। इबोला (Ebola) और कोविड-19 (COVID-19) महामारी ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब तक सभी सुरक्षित नहीं हैं, तब तक कोई भी सुरक्षित नहीं है।
4. पर्यावरणीय क्षरण (Environmental)
असंतुलित संसाधन दोहन: जीवित रहने की जद्दोजहद में गरीब समुदाय प्रायः वनों की कटाई, अवैध शिकार और अस्थिर कृषि प्रथाओं (Unsustainable agricultural practices) का सहारा लेने को विवश होते हैं। इसके परिणामस्वरूप होने वाला जलवायु परिवर्तन (Climate Change) विकसित और समृद्ध राष्ट्रों को भी समान रूप से प्रभावित करता है।
गरीबी उन्मूलन एवं वैश्विक समृद्धि सुनिश्चित करने हेतु संस्थागत उपाय
इस वैश्विक खतरे से निपटने के लिए भारत और विश्व स्तर पर बहुआयामी हस्तक्षेप किए जा रहे हैं, जिन्हें और अधिक सुदृढ़ करने की आवश्यकता है:
संवैधानिक और नीतिगत प्रतिबद्धता: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 38 (कल्याणकारी राज्य की स्थापना) और अनुच्छेद 39 (संसाधनों का समान वितरण) राज्य को गरीबी उन्मूलन हेतु निर्देशित करते हैं। नीति आयोग के हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत ने पिछले नौ वर्षों में लगभग 24.82 करोड़ लोगों को बहुआयामी गरीबी से बाहर निकाला है, जो एक वैश्विक बेंचमार्क है।
प्रत्यक्ष हस्तक्षेप और सुरक्षा जाल: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA), राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM), और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से समावेशी विकास को गति दी जा रही है।
सुधारित बहुपक्षवाद (Reformed Multilateralism): विकासशील देशों के ऋण संकट (Debt Trap) को सुलझाने और जलवायु वित्तपोषण ($100 Billion pledge) के वादों को पूरा करने के लिए ब्रेटन वुड्स संस्थानों (विश्व बैंक, IMF) में संरचनात्मक सुधार अनिवार्य हैं।
चुनौती और समाधान मैट्रिक्स (Action Plan Matrix)
| चुनौती का आयाम (Threat Dimension) | प्रभाव क्षेत्र (Impact Area) | लक्षित समाधान एवं SDG लिंकेज (Intervention & SDGs) |
| आर्थिक वंचना | वैश्विक बाजार का संकुचन | वित्तीय समावेशन (JAM Trinity); SDG 1 (No Poverty) |
| असमानता एवं प्रवासन | विकसित देशों में सामाजिक तनाव | क्षमता निर्माण एवं कौशल विकास; SDG 10 (Reduced Inequalities) |
| स्वास्थ्य एवं कुपोषण | वैश्विक महामारियों का खतरा | 'वन हेल्थ' (One Health) दृष्टिकोण; SDG 3 (Good Health) |
| तकनीकी विभाजन (Digital Divide) | ज्ञान अर्थव्यवस्था से बहिष्करण | डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) का वैश्वीकरण |
आगे की राह
गरीबी का उन्मूलन केवल एक परोपकारी या चैरिटी का कार्य नहीं है, बल्कि यह वैश्विक सुरक्षा, आर्थिक प्रगति और पर्यावरणीय स्थिरता के लिए एक 'रणनीतिक अनिवार्यता' (Strategic Imperative) है। 'ग्लोबल नॉर्थ' (विकसित देशों) को यह समझना होगा कि वे स्वयं को ऊँची दीवारों के पीछे सुरक्षित नहीं रख सकते, यदि उन दीवारों के बाहर भुखमरी और हताशा व्याप्त है।
भारत का 'सबका साथ, सबका विकास' का मॉडल इस दिशा में एक अनुकरणीय खाका प्रस्तुत करता है। सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त करने के लिए विश्व समुदाय को संकीर्ण संरक्षणवाद से परे हटकर, 'वसुधैव कुटुंबकम' (विश्व एक परिवार है) की शाश्वत भावना को अपनाना होगा। तभी हम वर्ष 2047 के 'नये और विकसित भारत' के साथ-साथ एक ऐसे सुरक्षित और समृद्ध विश्व का निर्माण कर सकेंगे, जहाँ कोई भी पीछे न छूटे (Leave no one behind)।