शिक्षा का व्यवसायीकरण और समाज पर इसके दूरगामी प्रभाव।
Q. शिक्षा का व्यवसायीकरण और समाज पर इसके दूरगामी प्रभाव।
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शिक्षा का व्यवसायीकरण और समाज पर इसके दूरगामी प्रभाव
शिक्षा, जो ऐतिहासिक रूप से एक पवित्र 'सार्वजनिक कल्याण' (Public Good) और सामाजिक उत्थान का साधन मानी जाती थी, वर्तमान नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों के प्रभाव में तीव्र गति से एक लाभ-संचालित 'पण्य वस्तु' (Commodity) में परिवर्तित हो रही है। भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने मोहिनी जैन बनाम कर्नाटक राज्य (1992) और उन्नीकृष्णन मामले (1993) में स्पष्ट रूप से स्थापित किया था कि "शिक्षा कोई व्यापार या व्यवसाय नहीं है।" इसके बावजूद, निजीकरण, 'एड-टेक' (EdTech) कंपनियों के अभूतपूर्व विस्तार और समानांतर कोचिंग संस्कृति ने शिक्षा के व्यवसायीकरण को एक संस्थागत स्वरूप दे दिया है, जिसके भारतीय समाज और इसके जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) पर अत्यंत गहरे व बहुआयामी प्रभाव पड़ रहे हैं।
शिक्षा के व्यवसायीकरण के अंतर्निहित कारक
सार्वजनिक निवेश की कमी: कोठारी आयोग (1966) और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 द्वारा शिक्षा पर GDP का 6% व्यय करने की सिफारिश के बावजूद, वास्तविक सार्वजनिक व्यय 3% के आसपास सीमित रहा है, जिसने निजी क्षेत्र के लिए एक शून्य (Vacuum) का निर्माण किया।
अवसंरचना और गुणवत्ता का अंतराल: सरकारी विद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों (HEIs) में सीमित सीटों और गुणवत्ता संबंधी चिंताओं ने मध्यवर्गीय अभिभावकों को निजी संस्थानों की ओर धकेला है।
अत्यधिक प्रतिस्पर्धी प्रवेश परीक्षाएं: IIT-JEE, NEET और UPSC जैसी परीक्षाओं के स्वरूप ने एक समानांतर 'छाया शिक्षा प्रणाली' (Shadow Education System) या कोचिंग उद्योग को जन्म दिया है।
समाज पर व्यवसायीकरण के दूरगामी प्रभाव (PESTLE विश्लेषण)
शिक्षा के व्यवसायीकरण का समाज पर प्रभाव केवल नकारात्मक नहीं है, बल्कि यह कुछ सकारात्मक आर्थिक प्रवृत्तियों को भी जन्म देता है, जिन्हें एक बहुआयामी दृष्टिकोण से समझा जा सकता है:
1. सामाजिक एवं नैतिक प्रभाव (Social & Ethical)
असमानता और 'डिजिटल डिवाइड': व्यवसायीकरण ने समाज को 'Haves' (संसाधन संपन्न) और 'Have-nots' (संसाधन विहीन) में विभाजित कर दिया है। यह संविधान के अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) की समतामूलक भावना के प्रतिकूल है।
गुरु-शिष्य परंपरा का क्षरण: शिक्षा के बाजारीकरण ने ज्ञान के पवित्र रिश्ते को 'सेवा-प्रदाता' (Service Provider) और 'उपभोक्ता' (Consumer) के लेन-देन में बदल दिया है।
मानसिक स्वास्थ्य संकट: लाभ-केंद्रित कोचिंग संस्थानों द्वारा उत्पन्न अत्यधिक दबाव के कारण छात्रों में अवसाद और आत्महत्या की दर में वृद्धि हुई है (जैसे- कोटा, राजस्थान के हालिया NCRB आँकड़े)।
2. आर्थिक प्रभाव (Economic)
'आउट-ऑफ़-पॉकेट' व्यय में वृद्धि: शिक्षा का बढ़ता खर्च निम्न और मध्यम आय वाले परिवारों को ऋण जाल (Debt Trap) में धकेल रहा है।
सकारात्मक पक्ष: निजी क्षेत्र के प्रवेश से शिक्षा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI), अत्याधुनिक अवसंरचना का विकास और हजारों युवाओं के लिए रोजगार (Teaching and Non-teaching staff) का सृजन हुआ है।
3. शैक्षणिक गुणवत्ता और तकनीकी प्रभाव (Technological & Quality)
रटंत विद्या (Rote Learning) बनाम आलोचनात्मक सोच: व्यावसायिक संस्थान मौलिक अनुसंधान (Fundamental Research) और नवाचार के बजाय केवल 'परीक्षा उत्तीर्ण करने' के मॉडल पर काम करते हैं।
विषयों का चयनात्मक विकास: बाज़ार की मांग के अनुरूप केवल STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, गणित) और प्रबंधन पाठ्यक्रमों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे मानविकी (Humanities) और सामाजिक विज्ञान की उपेक्षा हो रही है।
सुधारात्मक रणनीति और संस्थागत हस्तक्षेप (Action Plan Matrix)
शिक्षा के व्यवसायीकरण के दुष्प्रभावों को कम करने हेतु नीतिगत और विनियामक सुधारों की तत्काल आवश्यकता है:
| चिंता का क्षेत्र (Domain) | वर्तमान स्थिति | लक्षित सुधार (Intervention) |
| विनियमन (Regulation) | मनमानी फीस और भ्रामक विज्ञापन | शिक्षा मंत्रालय के 'कोचिंग सेंटर दिशानिर्देश 2024' का राज्यों द्वारा कड़ाई से प्रवर्तन; विज्ञापन मानक परिषद (ASCI) की निगरानी। |
| सार्वजनिक शिक्षा | कमजोर अवसंरचना एवं विश्वास का अभाव | PM-SHRI योजना का विस्तार; सरकारी स्कूलों को उत्कृष्ट केंद्रों (Centres of Excellence) के रूप में विकसित करना। |
| गुणवत्ता व मूल्यांकन | रटंत परीक्षा प्रणाली | NEP 2020 के तहत 'परख' (PARAKH) के माध्यम से रचनात्मक मूल्यांकन (Formative Assessment) लागू करना। |
| समावेशन (Inclusion) | समाज के हाशिए के वर्गों का बहिष्करण | निजी संस्थानों में RTE अधिनियम के तहत 25% ईडब्ल्यूएस (EWS) आरक्षण का पारदर्शी एवं सख्त अनुपालन सुनिश्चित करना। |
आगे की राह
शिक्षा का व्यवसायीकरण अपने आप में समस्या नहीं है, बशर्ते इसे मुनाफे की अंधी दौड़ के बजाय सामाजिक उत्तरदायित्व (Social Responsibility) के साथ संरेखित किया जाए। निजी क्षेत्र को शिक्षा में एक 'प्रतिद्वंद्वी' के बजाय राज्य के 'पूरक' के रूप में कार्य करना चाहिए।
राष्ट्र-निर्माण के इस अहम पड़ाव पर, भारत को एक ऐसे हाइब्रिड मॉडल (PPP) की आवश्यकता है, जहाँ सरकार शिक्षा के नियमन और विस्तार का दायित्व संभाले तथा निजी क्षेत्र गुणवत्ता व नवाचार में निवेश करे। सतत विकास लक्ष्य (SDG 4: समावेशी और न्यायसंगत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा) को प्राप्त करके ही भारत अपने युवाओं को वास्तविक रूप से सशक्त बना सकता है। ज्ञान को एक 'वैश्विक सार्वजनिक वस्तु' (Global Public Good) मानकर ही हम 'वसुधैव कुटुंबकम' के मूल्यों को पोषित कर सकते हैं और वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' (Viksit Bharat) के स्वप्न को यथार्थ में परिवर्तित कर सकते हैं।