भूजल की कमी और संदूषण भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है। टिप्पणी करें।
Q. भूजल की कमी और संदूषण भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है। टिप्पणी करें।
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केंद्रीय ग्राउंड वाटर बोर्ड (CGWB) और नीति आयोग की कम्पोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स (CWMI) रिपोर्ट के अनुसार, भारत विश्व का सर्वाधिक भूजल निष्कर्षण करने वाला देश है, जो वैश्विक कुल निष्कर्षण का लगभग 25% है। भारत अपनी कृषि सिंचाई आवश्यकताओं का लगभग 60% और पेयजल आवश्यकताओं का 80% भूजल पर निर्भर करता है। वर्तमान में अनियोजित दोहन और संदूषण (Contamination) के कारण देश की जल तालिका तेजी से गिर रही है, जो प्रत्यक्ष तौर पर सतत विकास लक्ष्य (SDG) 2 (शून्य भूख) और SDG 6 (स्वच्छ जल और स्वच्छता) के लक्ष्यों को चुनौती देते हुए भारत की दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा के लिए एक अस्तित्वगत संकट बन चुका है।
खाद्य सुरक्षा पर भूजल संकट का बहुआयामी प्रभाव
भूजल की कमी और संदूषण कृषि उत्पादकता, मृदा स्वास्थ्य और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को निम्नलिखित माध्यमों से प्रभावित कर रहे हैं:
1. कृषि उत्पादकता और सिंचाई सुरक्षा में व्यवधान
सिंचाई का संकट: देश के हरित क्रांति क्षेत्र (विशेषकर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश) में धान और गेहूं जैसी जल-सघन (Water-intensive) फसलों के कारण भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे चला गया है। जल स्रोतों के सूखने से सिंचित भूमि के असिंचित क्षेत्र में बदलने का गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।
खाद्य उत्पादन में गिरावट: केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, यदि भूजल संकट का समाधान नहीं किया गया, तो आगामी दशकों में प्रमुख खाद्यान्न फसलों के उत्पादन में 20% तक की भारी गिरावट आ सकती है, जिससे भारत की 'खाद्य आत्मनिर्भरता' प्रभावित होगी।
2. भूजल संदूषण और मृदा-फसल विषाक्तता (Chemical Contamination)
आर्सेनिक और फ्लोराइड का प्रकोप: गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन में भूजल के अति-दोहन के कारण भू-परत के नीचे रासायनिक असंतुलन पैदा हुआ है, जिससे जल में आर्सेनिक, फ्लोराइड, कैडमियम और यूरेनियम जैसे भारी धातुओं की सांद्रता बढ़ गई है।
खाद्य श्रृंखला संदूषण (Food Chain Bioaccumulation): संदूषित भूजल से सिंचाई करने पर ये विषैले तत्व फसलों और अनाजों (विशेषकर धान और सब्जियों) के माध्यम से मानव खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर रहे हैं, जिससे कैंसर और तंत्रिका तंत्र संबंधी गंभीर बीमारियां फैल रही हैं।
3. आर्थिक और सामाजिक अस्थिरता (Economic Distress)
बढ़ती इनपुट लागत: किसानों को गहरे नलकूप (Tube wells) खोदने और डीजल पंपों के संचालन के लिए भारी वित्तीय व्यय करना पड़ रहा है, जिससे सीमांत और लघु किसान ऋण के दुष्चक्र में फंस रहे हैं।
कृषि संकट और पलायन: बार-बार सूखे जैसी स्थितियों और जल संकट के कारण ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों की ओर जलवायु-प्रेरित प्रवासन (Climate-induced Migration) बढ़ रहा है।
भूजल संकट के प्रमुख कारण: एक विश्लेषण
| कारण का आयाम | विवरण |
| नीतिगत और मूल्यगत विसंगतियाँ | मुफ्त या अत्यधिक रियायती बिजली आपूर्ति के कारण किसानों द्वारा भूजल का अनियंत्रित और अत्यधिक उपयोग (Over-pumping)। |
| फसल विविधीकरण का अभाव | न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की व्यवस्था के कारण जल-अकुशल फसलों (धान और गेहूं) का अत्यधिक उत्पादन। |
| औद्योगिक और शहरी अपशिष्ट | बिना उपचारित (Untreated) औद्योगिक effluents और शहरी सीवेज का भूजल भंडारों में रिसना (Leaching)। |
| संस्थागत और विधिक सीमाएं | भूजल के दोहन को विनियमित करने वाले कानूनों का कमजोर क्रियान्वयन और जल निकायों (Traditional Water Bodies) का अतिक्रमण। |
सुधार की दिशा और रणनीतिक उपाय
भूजल प्रबंधन और खाद्य सुरक्षा के संरक्षण के लिए सरकार ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जिन्हें व्यापक स्तर पर लागू करने की आवश्यकता है:
मांग पक्ष का प्रबंधन (Demand-side Management): पारंपरिक बाढ़ सिंचाई (Flood Irrigation) के स्थान पर सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा देना। 'प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना - हर खेत को पानी' और 'पर ड्रॉप मोर क्रॉप' इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल हैं।
फसल विविधीकरण (Crop Diversification): नीति आयोग की सिफारिशों के अनुरूप, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में किसानों को धान के स्थान पर मोटे अनाजों (श्री अन्न/Millets) और दलहनों की खेती के लिए प्रोत्साहन (Incentives) देना।
भूजल पुनर्भरण (Aquifer Recharge): 'अटल भूजल योजना' के तहत समुदाय-आधारित जल प्रबंधन को बढ़ावा देना तथा वर्षा जल संचय (Rainwater Harvesting) को शहरी और ग्रामीण निर्माण कार्यों में कानूनी रूप से अनिवार्य करना।
कानूनी और विधिक सुदृढ़ीकरण: केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (CGHA) के विनिमयों को सख्त करना तथा जल को समवर्ती सूची में शामिल करने के लिए राष्ट्रीय आम सहमति बनाना, ताकि भूजल के दोहन को पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जा सके।
आगे की राह (Way Forward)
खाद्य सुरक्षा का प्रश्न केवल खाद्यान्न के पर्याप्त भंडारण का नहीं, बल्कि उसे उपजाने वाले पारिस्थितिकी तंत्र के दीर्घकालिक स्वास्थ्य का है। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने अपने पर्यावरण और शासन संबंधी प्रतिवेदनों में जल संसाधनों के विकेंद्रीकृत और सहभागी प्रबंधन पर विशेष बल दिया है।
जल को एक 'सार्वजनिक संपदा' (Public Good) मानते हुए इसके विवेकपूर्ण उपयोग और संरक्षण की संस्कृति विकसित करनी होगी। 'विकसित भारत 2047' के विजन के अंतर्गत, जब देश अपनी आजादी की शताब्दी मना रहा होगा, तब खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता बनाए रखने के लिए जल सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के केंद्र में रखना होगा। भूजल संरक्षण के प्रति यह प्रतिबद्धता 'वसुधैव कुटुंबकम' के वैश्विक दायित्व को निभाते हुए भावी पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित, समृद्ध और पोषणीय भविष्य की गारंटी सुनिश्चित करेगी।