भारत में लौह और इस्पात उद्योग के पूर्वी भारत में केंद्रित होने के क्या कारण हैं?
Q. भारत में लौह और इस्पात उद्योग के पूर्वी भारत में केंद्रित होने के क्या कारण हैं?
Ans -
अल्फ्रेड वेबर के 'औद्योगिक अवस्थिति सिद्धांत' (Weber's Theory of Industrial Location) के अनुसार, लौह और इस्पात जैसे 'वजन ह्रासमान' (Weight-losing) उद्योगों की स्थापना अनिवार्य रूप से कच्चे माल के स्रोतों के निकट होती है। वर्तमान में, विश्व इस्पात संघ (World Steel Association) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक देश है। भारत में इस उद्योग का सर्वाधिक संकेंद्रण पूर्वी भारत, विशेषकर छोटानागपुर के पठार (झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और उत्तरी छत्तीसगढ़) में है, जिसे भौगोलिक और आर्थिक दृष्टि से 'भारत का रूर' (Ruhr of India) भी कहा जाता है।
पूर्वी भारत में लौह और इस्पात उद्योग के संकेंद्रण के बहुआयामी कारक
पूर्वी भारत में इस भारी उद्योग के केंद्रीकरण को निम्नलिखित आयामों (भौगोलिक, आर्थिक, जनसांख्यिकीय और नीतिगत) के माध्यम से समझा जा सकता है:
1. कच्चे माल की प्रचुरता और भौगोलिक निकटता (Geographical Factors)
वजन ह्रासमान प्रकृति: एक टन तैयार इस्पात के निर्माण के लिए लगभग 2 टन लौह अयस्क, 1.5 टन कोकिंग कोल और 0.5 टन चूना पत्थर की आवश्यकता होती है। परिवहन लागत को न्यूनतम करने के लिए उद्योग का खदानों के पास होना आर्थिक रूप से व्यवहार्य है।
लौह अयस्क: सिंहभूम (झारखंड), मयूरभंज और क्योंझर (ओडिशा) तथा बैलाडीला (छत्तीसगढ़) में उच्च कोटि के हेमेटाइट (Hematite) और मैग्नेटाइट अयस्क के विशाल भंडार मौजूद हैं।
धातुकर्म कोयला (Metallurgical Coal): झरिया, बोकारो और रानीगंज (पश्चिम बंगाल) की खदानों से इस्पात को गलाने के लिए आवश्यक उत्तम कोटि के कोकिंग कोयले की निर्बाध आपूर्ति होती है।
मिश्रण सामग्री: सुंदरगढ़ (ओडिशा) और पलामू जैसे निकटवर्ती क्षेत्रों से चूना पत्थर, डोलोमाइट और मैंगनीज आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।
2. जल संसाधन और ऊर्जा अवसंरचना (Environmental & Infrastructural)
जल की उपलब्धता: इस्पात संयंत्रों में भट्टियों के शीतलन (Cooling) और लौह अयस्क की धुलाई के लिए भारी मात्रा में जल की आवश्यकता होती है। पूर्वी भारत में सुवर्णरेखा, दामोदर, शंख और ब्राह्मणी जैसी सदानीरा नदियाँ इस मांग की पूर्ति करती हैं।
सस्ती ऊर्जा: दामोदर घाटी निगम (DVC), हीराकुंड जलविद्युत परियोजना और स्थानीय ताप विद्युत संयंत्रों (Thermal Power Plants) से इन बड़े उद्योगों को निर्बाध और किफायती बिजली प्राप्त होती है।
3. जनसांख्यिकीय और सामाजिक-आर्थिक लाभ (Demographic & Social)
सस्ते और प्रचुर श्रम की उपलब्धता: पूर्वी भारत (विशेष रूप से बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश) उच्च जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्र हैं। यहाँ से भारी मात्रा में अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित होती है, जो उत्पादन लागत (Cost of Production) को कम रखने में सहायक है।
4. परिवहन और वैश्विक कनेक्टिविटी (Economic Connectivity)
रेल अवसंरचना: पूर्वी रेलवे और दक्षिण-पूर्वी रेलवे का सघन जाल कच्चे माल की ढुलाई को सुगम बनाता है।
बंदरगाहों की निकटता: कोलकाता, हल्दिया और पारादीप बंदरगाहों की उपस्थिति न केवल तैयार इस्पात के निर्यात को सुगम बनाती है, बल्कि ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से उच्च गुणवत्ता वाले कोकिंग कोयले और भारी मशीनरी के आयात को भी लॉजिस्टिक रूप से व्यवहार्य बनाती है।
5. ऐतिहासिक और नीतिगत समर्थन (Political & Historical)
महालानोबिस मॉडल: द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-61) के तहत भारी उद्योगों पर जोर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप विदेशी सहयोग (सोवियत संघ, ब्रिटेन, जर्मनी) से भिलाई, दुर्गापुर और राउरकेला में विशाल इस्पात संयंत्र स्थापित किए गए।
मालभाड़ा समकारी नीति (Freight Equalization Policy): यद्यपि यह नीति अब समाप्त कर दी गई है, किंतु इसने ऐतिहासिक रूप से पूर्वी भारत में भारी उद्योगों के आरंभिक संकेंद्रण को एक वैधानिक और आर्थिक सुरक्षा प्रदान की थी।
पूर्वी भारत के प्रमुख इस्पात संयंत्र और उनका अवस्थिति-आधार:
| प्रमुख इस्पात संयंत्र | राज्य | कच्चे माल का मुख्य स्रोत | जलापूर्ति / नदियाँ |
| टिस्को (TISCO), जमशेदपुर | झारखंड | नोवामुंडी (लौह) / झरिया (कोयला) | सुवर्णरेखा और खरकई नदी |
| राउरकेला इस्पात संयंत्र | ओडिशा | सुंदरगढ़ (लौह) / झरिया (कोयला) | शंख और कोयल नदियाँ |
| भिलाई इस्पात संयंत्र | छत्तीसगढ़ | दल्ली-राजहरा (लौह) / कोरबा (कोयला) | तांदुला नहर / महानदी बेसिन |
यद्यपि पूर्वी भारत ऐतिहासिक रूप से लौह और इस्पात उद्योग का हृदय स्थल रहा है, किंतु वर्तमान में परिवहन तकनीक में सुधार के साथ विशाखापत्तनम (पोर्ट-आधारित) और सेलम (दक्षिण भारत) जैसे नए केंद्रों का उदय हो रहा है। इसके अतिरिक्त, इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF) पर आधारित 'मिनी स्टील प्लांट' पूरे देश में विकेंद्रीकृत हो रहे हैं। राष्ट्रीय इस्पात नीति (National Steel Policy) 2017 के तहत 2030 तक 300 मिलियन टन उत्पादन क्षमता का लक्ष्य रखा गया है। भारतीय इस्पात क्षेत्र को अब कार्बन उत्सर्जन कम करने हेतु 'ग्रीन स्टील' (Green Steel) और 'सर्कुलर इकॉनमी' की ओर संक्रमण करना होगा। सतत विकास लक्ष्य 9 (SDG 9 - उद्योग, नवाचार और बुनियादी ढांचा) को समाहित करते हुए यह रणनीतिक बदलाव भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का एक अपरिहार्य अंग बनाएगा, जो 'आत्मनिर्भर भारत' और 'विकसित भारत @2047' के आर्थिक विजन को साकार करने का एक सुदृढ़ स्तंभ सिद्ध होगा।