प्रशांत महासागर की 'रिंग ऑफ फायर' (Ring of Fire) में ज्वालामुखी और भूकंपीय गतिविधियों के कारण क्या हैं?

 Q. प्रशांत महासागर की 'रिंग ऑफ फायर' (Ring of Fire) में ज्वालामुखी और भूकंपीय गतिविधियों के कारण क्या हैं?

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संयुक्त राज्य भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार, प्रशांत महासागर बेसिन के चारों ओर लगभग 40,000 किलोमीटर के घोड़े की नाल (Horseshoe) के आकार में विस्तृत क्षेत्र को 'रिंग ऑफ फायर' (परि-प्रशांत मेखला) कहा जाता है। यह विश्व का सबसे सक्रिय भूगर्भीय क्षेत्र है, जहाँ पृथ्वी के लगभग 75% सक्रिय ज्वालामुखी और 90% भूकंपीय घटनाएं दर्ज की जाती हैं। यह क्षेत्र कोई एकल भूवैज्ञानिक संरचना नहीं है, बल्कि विभिन्न विवर्तनिक प्लेटों (Tectonic Plates) की सीमाओं की एक जटिल शृंखला है।

प्रशांत महासागर की 'रिंग ऑफ फायर' में सक्रियता के प्रमुख कारण

भूवैज्ञानिक गतिविधियों की इस उच्च तीव्रता को प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत (Plate Tectonics Theory) के माध्यम से निम्नलिखित बहुआयामी दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है:

1. अभिसारी प्लेट सीमाएं और क्षेपण क्षेत्र (Subduction Zones)

  • प्लेटों का टकराव: रिंग ऑफ फायर मुख्य रूप से अभिसारी प्लेट सीमाओं (Convergent Boundaries) से निर्मित है। यहाँ विशाल और भारी प्रशांत प्लेट (Pacific Plate) अपने आस-पास की हल्की महाद्वीपीय प्लेटों (जैसे उत्तरी अमेरिकी, यूरेशियन और दक्षिण अमेरिकी प्लेट) के नीचे धंस रही है।

  • मैग्मा का निर्माण: जब एक प्लेट दूसरी के नीचे मेंटल (Mantle) में गहराई तक जाती है (क्षेपण या Subduction), तो अत्यधिक दबाव और तापमान के कारण चट्टानें पिघलकर मैग्मा का निर्माण करती हैं। यह मैग्मा प्लम के रूप में ऊपर उठकर हिंसक ज्वालामुखी विस्फोटों को जन्म देता है। माउंट फ्यूजी (जापान) और माउंट सेंट हेलेंस (अमेरिका) इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

2. रूपांतरण भ्रंश और तनाव का संचय (Transform Faults)

  • प्लेटों का घर्षण: जिन क्षेत्रों में प्लेटें एक-दूसरे के नीचे धंसने के बजाय क्षैतिज रूप से एक-दूसरे के समानांतर खिसकती हैं, वहाँ भारी मात्रा में यांत्रिक ऊर्जा (Mechanical Energy) संचित होती है।

  • भूकंप की उत्पत्ति: जब यह संचित तनाव चट्टानों की घर्षण सीमा को पार कर जाता है, तो ऊर्जा का अचानक विमोचन होता है, जिससे उथले केंद्र वाले (Shallow-focus) अत्यधिक विनाशकारी भूकंप आते हैं। कैलिफोर्निया का सैन एंड्रियास भ्रंश (San Andreas Fault) इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ प्रशांत प्लेट और उत्तरी अमेरिकी प्लेट एक-दूसरे के विपरीत दिशा में खिसक रही हैं।

3. महासागरीय खाइयां और ज्वालामुखीय चाप (Oceanic Trenches & Volcanic Arcs)

  • क्षेपण की प्रक्रिया दुनिया की सबसे गहरी महासागरीय खाइयों (जैसे मारियाना ट्रेंच और अलेउतियन ट्रेंच) का निर्माण करती है। इन खाइयों के समानांतर, महाद्वीपीय किनारों पर ज्वालामुखीय पर्वत शृंखलाएं (Volcanic Arcs) बनती हैं, जो इस क्षेत्र की निरंतर भूगर्भीय अस्थिरता का मुख्य कारण हैं।

4. अपसारी सीमाएं और समुद्री नितल प्रसरण (Sea-floor Spreading)

  • यद्यपि 'रिंग ऑफ फायर' में अभिसारी सीमाएं प्रमुख हैं, किंतु इसके पूर्वी भाग में ईस्ट पैसिफिक राइज़ (East Pacific Rise) जैसी अपसारी सीमाएं भी हैं। यहाँ प्लेटें एक-दूसरे से दूर जा रही हैं, जिससे दरारों के माध्यम से बेसाल्टिक लावा निरंतर बाहर आता है और नई भूपर्पटी का निर्माण करता है, जो सूक्ष्म भूकंपीय गतिविधियों का कारण बनता है।

रणनीतिक रूपरेखा और आगे की राह (आपदा न्यूनीकरण)

रिंग ऑफ फायर की भूगर्भीय उथल-पुथल मानव नियंत्रण से बाहर है, जिसके कारण सुनामी, बुनियादी ढांचे के विनाश और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान जैसी गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं। इस प्राकृतिक अनिवार्यता के प्रबंधन हेतु एक प्रो-एक्टिव (Pro-active) रणनीति की आवश्यकता है:

  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली: 'पैसिफिक सुनामी वार्निंग सेंटर' (PTWC) की तर्ज पर वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर रियल-टाइम निगरानी तंत्र को मजबूत करना।

  • आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना: भारत द्वारा शुरू किए गए आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI) के सिद्धांतों को अपनाते हुए भवन निर्माण संहिताओं (Building Codes) का कठोर अनुपालन सुनिश्चित करना।

  • स्थानीयकृत सूक्ष्म-नियोजन (Micro-Zonation): भारत भी हिमालयी क्षेपण क्षेत्र (Himalayan Subduction Zone) के कारण उच्च भूकंपीय जोखिम में है। इस संदर्भ में, विशेषकर पटना और बिहार के सभी जिलों (जो अत्यधिक संवेदनशील भूकंपीय ज़ोन IV और V में आते हैं) में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के दिशानिर्देशों के अनुरूप जन-जागरूकता और रेट्रोफिटिंग (Retrofitting) को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

भूगर्भीय आपदाएं भौगोलिक सीमाओं को नहीं पहचानती हैं। सेंडाई फ्रेमवर्क (Sendai Framework for DRR 2015-2030) और सतत विकास लक्ष्य 11 (SDG 11 - सुरक्षित और लचीले शहर) के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अंतरराष्ट्रीय तकनीकी हस्तांतरण और डेटा साझाकरण अनिवार्य है। भूगर्भीय जोखिमों का वैज्ञानिक शमन ही सुरक्षित वैश्विक भविष्य और 'विकसित भारत @2047' के संवहनीय विकास ढांचे की आधारशिला रख सकता है।

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