गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) की प्रासंगिकता शीत युद्ध के बाद के युग में कितनी रह गई है?
Q. गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) की प्रासंगिकता शीत युद्ध के बाद के युग में कितनी रह गई है?
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बांडुंग सम्मेलन (1955) की नींव पर बेलग्रेड (1961) में स्थापित गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) शीत युद्ध के दौरान नव-स्वतंत्र राष्ट्रों के लिए द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था (अमेरिका और सोवियत संघ) की गुटबाजी से बचने का एक रणनीतिक ढाल था। 1991 में सोवियत संघ के विघटन और शीत युद्ध की समाप्ति के बाद, अंतरराष्ट्रीय राजनीति बहुध्रुवीय (Multipolar) स्वरूप में परिवर्तित हो गई। इस भू-राजनीतिक बदलाव ने NAM के मूल अस्तित्व और उसकी समकालीन प्रासंगिकता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
शीत युद्ध के पश्चात NAM की प्रासंगिकता पर उठते प्रश्न (चुनौतियां)
द्विध्रुवीय विश्व का अंत: शीत युद्ध की समाप्ति के साथ ही 'गुटों' का अस्तित्व समाप्त हो गया, जिससे तकनीकी रूप से 'गुटनिरपेक्ष' रहने का मूल आधार ही कमजोर हो गया।
वैकल्पिक बहुपक्षीय मंचों का उदय: वर्तमान आर्थिक और रणनीतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए राष्ट्र अब G20, BRICS, QUAD और SCO जैसे अधिक लक्षित और प्रभावी मंचों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
आंतरिक विरोधाभास और वैचारिक भटकाव: NAM के 120 सदस्य देशों के बीच आर्थिक असमानताएं और सीमा विवाद (जैसे भारत-पाकिस्तान, ईरान-इराक) इसके सामूहिक निर्णय लेने की क्षमता को पंगु बनाते हैं।
संस्थागत तंत्र का अभाव: संयुक्त राष्ट्र या यूरोपीय संघ के विपरीत, NAM के पास एक स्थायी सचिवालय और बाध्यकारी विवाद निवारण तंत्र का अभाव है, जिससे इसके प्रस्ताव केवल घोषणात्मक (Declaratory) बनकर रह जाते हैं।
21वीं सदी में NAM की अपरिहार्यता और बहुआयामी प्रासंगिकता
अपने पारंपरिक स्वरूप के अप्रासंगिक होने के बावजूद, NAM के मूल सिद्धांत वर्तमान वैश्विक चुनौतियों के संदर्भ में एक नया आकार ले रहे हैं:
1. राजनीतिक और रणनीतिक आयाम (सामरिक स्वायत्तता)
नई गुटबाजी (Cold War 2.0) का प्रतिरोध: अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के सैन्यीकरण के बीच, NAM विकासशील देशों को 'सामरिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) बनाए रखने का मंच प्रदान करता है। हालिया रूस-यूक्रेन संघर्ष में भारत का स्वतंत्र कूटनीतिक रुख इसी दर्शन का विस्तार है।
'ग्लोबल साउथ' (Global South) का स्वर: यह मंच विकासशील और अल्पविकसित देशों को विश्व पटल पर एक सामूहिक सौदेबाजी (Collective Bargaining) की शक्ति प्रदान करता है।
2. आर्थिक और तकनीकी आयाम (नव-उपनिवेशवाद का विरोध)
असमान आर्थिक नीतियां: विश्व व्यापार संगठन (WTO) की वार्ताओं में बौद्धिक संपदा अधिकारों (TRIPS), कृषि सब्सिडी और तकनीकी हस्तांतरण पर विकसित देशों के एकाधिकारवादी रवैये का विरोध करने के लिए NAM एक दबाव समूह के रूप में कार्य करता है।
डिजिटल और तकनीकी संप्रभुता: साइबर सुरक्षा, डेटा गवर्नेंस और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग में नव-तकनीकी उपनिवेशवाद से बचने के लिए सदस्य देशों के मध्य तकनीकी सहयोग अत्यंत आवश्यक है।
3. पर्यावरणीय और गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियाँ
जलवायु परिवर्तन: NAM राष्ट्र UNFCCC के मंच पर 'समान लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व' (CBDR-RC) के सिद्धांत की वकालत करते हुए विकसित देशों पर जलवायु वित्तपोषण (Climate Finance) का दबाव बनाते हैं।
अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद: भारत द्वारा प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक सम्मेलन (CCIT) को पारित कराने और आतंकवाद के राज्य-प्रायोजन के विरुद्ध वैश्विक जनमत तैयार करने में NAM की भूमिका अहम है।
4. वैश्विक शासन संरचनाओं का लोकतंत्रीकरण
NAM संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) और ब्रेटन वुड्स संस्थानों (World Bank, IMF) में सुधार की निरंतर वकालत करता है, ताकि वे 1945 की भू-राजनीति के बजाय 21वीं सदी की वास्तविकताओं (जैसे अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी प्रतिनिधित्व) को प्रतिबिंबित कर सकें।
रणनीतिक रूपरेखा और आगे की राह
गुटनिरपेक्ष आंदोलन को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए स्वयं को 'अलगाववाद' (Isolationism) के प्रतीक से हटाकर 'बहु-संरेखण' (Multi-Alignment) और 'मुद्दा-आधारित संरेखण' (Issue-based Alignment) के आधुनिक ढांचे में ढालना होगा।
NAM 2.0 का निर्माण: एक स्थायी सचिवालय की स्थापना और आर्थिक सहयोग (दक्षिण-दक्षिण सहयोग) को राजनीतिक बयानबाजी से अधिक प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) का एकीकरण: NAM को गरीबी उन्मूलन (SDG 1), जलवायु कार्रवाई (SDG 13) और वैश्विक साझेदारी (SDG 17) को अपने मुख्य एजेंडे में शामिल करना चाहिए।
भारत के लिए NAM अब निष्क्रिय गुटनिरपेक्षता नहीं, बल्कि एक सक्रिय कूटनीतिक उपकरण है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में, 'ग्लोबल साउथ' के एक स्वाभाविक नेता के रूप में भारत NAM का उपयोग 'वसुधैव कुटुम्बकम्' (विश्व एक परिवार है) के आदर्श को स्थापित करने और 'विकसित भारत @2047' के विजन के अनुरूप एक न्यायसंगत, बहुध्रुवीय और समावेशी विश्व व्यवस्था के निर्माण में कर सकता है।