समुद्री संसाधनों (Blue Economy) के दोहन में भारत की संभावनाओं और चुनौतियों का विवरण दें।

 Q. समुद्री संसाधनों (Blue Economy) के दोहन में भारत की संभावनाओं और चुनौतियों का विवरण दें।

Ans - 

विश्व बैंक (World Bank) के अनुसार, 'ब्लू इकॉनमी' (नीली अर्थव्यवस्था) का तात्पर्य समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को संरक्षित करते हुए आर्थिक विकास, बेहतर आजीविका और रोजगार सृजन के लिए समुद्री संसाधनों का सतत उपयोग है। भारत की 7,516 किलोमीटर लंबी तटरेखा, 9 तटीय राज्य, और लगभग 2.37 मिलियन वर्ग किलोमीटर का विशाल विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) इसे एक स्वाभाविक समुद्री शक्ति बनाते हैं। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अनुसार, नीली अर्थव्यवस्था भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 4% का योगदान देती है। 'डीप ओशन मिशन' (Deep Ocean Mission) और मसौदा राष्ट्रीय नीली अर्थव्यवस्था नीति भारत की सामरिक और आर्थिक आकांक्षाओं को रेखांकित करने वाले महत्वपूर्ण कदम हैं।

समुद्री संसाधनों के दोहन की संभावनाएँ (Prospects)

भारत के लिए नीली अर्थव्यवस्था बहुआयामी अवसर प्रस्तुत करती है, जिन्हें निम्नलिखित क्षेत्रों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

1. आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा (Economic & Energy Security)

  • बहुधात्विक ग्रंथियां (Polymetallic Nodules - PMN): भारत को अंतर्राष्ट्रीय सीबेड अथॉरिटी (ISA) द्वारा मध्य हिंद महासागर बेसिन (CIOB) में अन्वेषण अधिकार प्राप्त हैं। यहाँ कोबाल्ट, निकल, मैंगनीज और तांबे के विशाल भंडार हैं, जो इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण और बैटरी तकनीक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

  • नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता: भारत की तटरेखा अपतटीय पवन ऊर्जा (Offshore Wind), ज्वारीय (Tidal) और महासागरीय तापीय ऊर्जा (OTEC) उत्पादन के लिए अपार संभावनाएं रखती है, जो जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करेगी।

2. खाद्य सुरक्षा और आजीविका (Food Security & Livelihood)

  • मत्स्यन एवं समुद्री कृषि (Aquaculture): भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मत्स्य उत्पादक देश है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के माध्यम से 'नीली क्रांति' को गति देकर लाखों मछुआरों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य है।

  • समुद्री जैव प्रौद्योगिकी (Marine Biotechnology): समुद्री शैवाल (Seaweed) की खेती और समुद्री सूक्ष्मजीवों का उपयोग फार्मास्यूटिकल्स, सौंदर्य प्रसाधन और औद्योगिक एंजाइमों के विकास में किया जा सकता है।

3. अवसंरचना और वैश्विक व्यापार (Trade & Infrastructure)

  • भारत का 95% विदेशी व्यापार (मात्रा के आधार पर) समुद्री मार्गों से होता है। 'सागरमाला' (Sagarmala) पहल के तहत 'बंदरगाह-नेतृत्व वाले विकास' (Port-led Development) और तटीय आर्थिक क्षेत्रों (CEZs) की स्थापना से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) में भारत की हिस्सेदारी बढ़ेगी।

नीली अर्थव्यवस्था के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ

असीम संभावनाओं के बावजूद, भारत को बहुआयामी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है:

चुनौती का आयाममुख्य विवरण
पर्यावरणीय (Environmental)कृषि अपवाह के कारण यूट्रोफिकेशन (Eutrophication), माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण, महासागरों का अम्लीकरण और प्रवाल भित्तियों (Coral Reefs) का विरंजन।
तकनीकी (Technological)6000 मीटर की गहराई पर अन्वेषण हेतु स्वदेशी मानवयुक्त पनडुब्बी (मत्स्य-6000) और उन्नत 'ऑटोनोमस अंडरवाटर व्हीकल' (AUV) जैसी अत्याधुनिक तकनीक के विकास में उच्च लागत और समय।
भू-राजनीतिक (Geopolitical)हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में समुद्री डकैती, चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' (String of Pearls) रणनीति और दक्षिण चीन सागर विवाद का अप्रत्यक्ष प्रभाव।
नियामक एवं विधिक (Regulatory)अवैध, गैर-सूचित और अनियमित मत्स्यन (IUU Fishing) के कारण बायोडायवर्सिटी का नुकसान। समुद्री क्षेत्र का प्रबंधन कई मंत्रालयों में बंटा होने से 'साइलो' (Silos) दृष्टिकोण की समस्या।

आगे की राह और सामरिक दृष्टि (Way Forward)

महासागर केवल संसाधनों के भंडार नहीं हैं, बल्कि ये वैश्विक जलवायु को नियंत्रित करने वाले प्रमुख कारक हैं। भारत को अपनी समुद्री क्षमता के इष्टतम उपयोग के लिए सतत विकास लक्ष्य-14 (जल के नीचे जीवन) के साथ पूर्ण सामंजस्य स्थापित करना होगा।

इस दिशा में 'समुद्री स्थानिक योजना' (Marine Spatial Planning - MSP) को संपूर्ण तटरेखा पर लागू करना तथा राष्ट्रीय समुद्री नवाचार केंद्र की स्थापना करना आवश्यक है। यह न केवल पारिस्थितिक संतुलन सुनिश्चित करेगा, बल्कि भारत के SAGAR (Security and Growth for All in the Region) विजन को भी मजबूती प्रदान करेगा। समुद्री कूटनीति (Blue Diplomacy) और सतत समुद्री दोहन का यह समन्वय ही 'विकसित भारत 2047' के आर्थिक लक्ष्यों को पूर्ण कर 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना को वैश्विक पटल पर यथार्थ रूप प्रदान करेगा।

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