वामपंथी उग्रवाद (LWE) के मूल कारण सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन में निहित हैं। स्पष्ट करें।
Q. वामपंथी उग्रवाद (LWE) के मूल कारण सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन में निहित हैं। स्पष्ट करें।
Ans -
भारत में वामपंथी उग्रवाद (Left Wing Extremism - LWE), जिसे सामान्यतः नक्सलवाद के रूप में जाना जाता है, देश के सम्मुख सबसे गंभीर आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में से एक रहा है। यद्यपि इसका जन्म 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी में एक कृषक विद्रोह के रूप में हुआ था, किंतु इसका विस्तार मुख्य रूप से मध्य और पूर्वी भारत के जनजातीय और दुर्गम क्षेत्रों (Red Corridor) में हुआ। योजना आयोग द्वारा गठित डी. बंद्योपाध्याय समिति (2006) की रिपोर्ट ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि वामपंथी उग्रवाद केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें गहरी सामाजिक-आर्थिक वंचना, प्रशासनिक शून्यता और जल-जंगल-जमीन के अलगाव में निहित हैं।
सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन: वामपंथी उग्रवाद का मूल कारण
इस समस्या के बहुआयामी मूल कारणों का विश्लेषण निम्नलिखित PESTLE (राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी, कानूनी और पर्यावरणीय) दृष्टिकोण से किया जा सकता है:
1. आर्थिक वंचना और भूमि अलगाव (Economic Deprivation)
भूमिहीनता और गरीबी: उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में अधिकांश आबादी सीमांत किसानों और भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की है। ऐतिहासिक भूमि सुधारों की विफलता ने आर्थिक असमानता को गहरा किया है।
विकास जनित विस्थापन (Development-induced Displacement): खनन परियोजनाओं, बांधों और भारी उद्योगों की स्थापना के कारण जनजातीय समुदायों का बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ है, और उन्हें पर्याप्त पुनर्वास एवं आजीविका (Rehabilitation) के अवसर नहीं मिले।
2. सामाजिक हाशिएकरण (Social Marginalization)
मानव विकास सूचकांक (HDI) में पिछड़ापन: उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव रहा है।
अस्मिता और गरिमा का हनन: आदिवासी और दलित समुदायों के पारंपरिक अधिकारों का उल्लंघन और उन्हें मुख्यधारा के विकास से कटे हुए महसूस कराना, उग्रवादी विचारधारा के प्रसार के लिए उपजाऊ जमीन तैयार करता है।
3. प्रशासनिक शून्यता और शासन का अभाव (Governance Deficit)
राज्य की अनुपस्थिति: दुर्गम और वनाच्छादित क्षेत्रों में पुलिस, नागरिक प्रशासन और न्याय प्रणाली की पहुँच न्यूनतम रही है। इस 'प्रशासनिक शून्यता' (Governance Vacuum) को वामपंथी उग्रवादियों ने 'जन अदालतों' (Kangaroo Courts) के माध्यम से भर दिया।
भ्रष्टाचार और शोषण: स्थानीय ठेकेदारों, वन अधिकारियों और साहूकारों द्वारा जनजातियों का शोषण एक आम व्यवस्था बन गई थी, जिसने राज्य के प्रति अविश्वास को जन्म दिया।
4. विधिक और पर्यावरणीय मुद्दे (Legal & Environmental Issues)
कानूनों का लचर क्रियान्वयन: यद्यपि संविधान की 5वीं अनुसूची, पेसा (PESA) अधिनियम, 1996 और वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 जनजातीय स्वायत्तता और संसाधन अधिकारों की रक्षा करते हैं, किंतु धरातल पर इनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो सका है।
संसाधन अभिशाप (Resource Curse): यह एक विडंबना है कि भारत के सर्वाधिक खनिज संपन्न क्षेत्र (छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा) ही सर्वाधिक गरीब और उग्रवाद से प्रभावित रहे हैं।
एक दुष्चक्र: पिछड़ापन और उग्रवाद
| कारण | प्रभाव |
| बुनियादी ढांचे का अभाव | उग्रवादियों द्वारा सड़कों, स्कूलों और मोबाइल टावरों का विनाश, ताकि राज्य की पहुँच न हो सके। |
| निवेश की कमी | सुरक्षा चिंताओं के कारण निजी क्षेत्र का निवेश नहीं होता, जिससे रोजगार के अवसर समाप्त हो जाते हैं। |
| मानव पूंजी का ह्रास | युवाओं का उग्रवाद की ओर ब्रेनवॉश किया जाना और उन्हें बाल-सैनिकों (Child Soldiers) के रूप में इस्तेमाल करना। |
सुधारात्मक उपाय और सरकारी पहलें
गृह मंत्रालय (MHA) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, सुरक्षा और विकास के दोहरे दृष्टिकोण (Security and Development Approach) से LWE प्रभावित जिलों की संख्या में भारी गिरावट आई है।
विकासात्मक पहल: नीति आयोग का आकांक्षी जिला कार्यक्रम (Aspirational Districts Programme) वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में शिक्षा, स्वास्थ्य और वित्तीय समावेशन पर केंद्रित है। इसके अतिरिक्त, 'रोशनी' (ROSHNI) योजना और LWE प्रभावित क्षेत्रों के लिए सड़क संपर्क परियोजना (RCPLWE) आधारभूत संरचना को सुदृढ़ कर रही हैं।
सुरक्षा और पुनर्वास: उग्रवादियों के वित्तपोषण को रोकने और आत्मसमर्पण-सह-पुनर्वास (Surrender-cum-Rehabilitation) नीतियों के माध्यम से उन्हें मुख्यधारा में लाया जा रहा है। सरकार का 'समाधान' (SAMADHAN) सिद्धांत इस दिशा में एक आक्रामक और स्मार्ट रणनीति है।
समावेशी क्षेत्रीय विकास का मॉडल: प्रशासनिक विकेंद्रीकरण और संसाधनों के न्यायसंगत वितरण की रणनीति के तहत, पटना और बिहार के सभी जिलों में जिस प्रकार से सुशासन और अधोसंरचना विकास (Governance and Infrastructure) के माध्यम से ऐतिहासिक नक्सल प्रभाव को सफलतापूर्वक समाप्त किया गया है, वह अन्य प्रभावित राज्यों के लिए एक अनुकरणीय सूक्ष्म-मॉडल (Micro-model) प्रस्तुत करता है।
आगे की राह (Way Forward)
द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने अपनी 'क्षमता निर्माण' संबंधी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि वामपंथी उग्रवाद का दीर्घकालिक समाधान 'सहानुभूतिपूर्ण प्रशासन' (Empathetic Administration) में निहित है।
सुरक्षा बलों की तैनाती आवश्यक है, किंतु यह केवल एक सक्षम वातावरण (Enabling Environment) तैयार कर सकती है। वास्तविक विजय तभी संभव है जब सतत विकास लक्ष्यों (SDG 1: गरीबी उन्मूलन, SDG 10: असमानता में कमी, और SDG 16: शांति, न्याय और सशक्त संस्थाएं) को इन क्षेत्रों में धरातल पर उतारा जाए। स्थानीय समुदायों को वन उपज का वास्तविक हितधारक बनाकर और उन्हें मुख्यधारा के आर्थिक विकास से जोड़कर ही भारत 'विकसित भारत 2047' के समावेशी लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है, जहाँ राज्य की शक्ति का उपयोग प्रभुत्व के लिए नहीं, बल्कि जनकल्याण के लिए हो।