क्रिस्पर (CRISPR-Cas9) जीन एडिटिंग तकनीक के चिकित्सा और कृषि में अनुप्रयोग तथा इससे जुड़े नैतिक मुद्दे।
Q. क्रिस्पर (CRISPR-Cas9) जीन एडिटिंग तकनीक के चिकित्सा और कृषि में अनुप्रयोग तथा इससे जुड़े नैतिक मुद्दे।
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क्रिस्पर-कैस9 (CRISPR-Cas9) एक युगांतरकारी जीन-संपादन (Gene Editing) तकनीक है, जो डीएनए (DNA) के विशिष्ट अनुक्रमों को अत्यंत सटीकता के साथ काटने, हटाने या संशोधित करने की सुविधा प्रदान करती है। इसे 'आणविक कैंची' (Molecular Scissors) के रूप में जाना जाता है। वर्ष 2020 में इस तकनीक के विकास के लिए इमैनुएल शारपेंटियर और जेनिफर डौडना को रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। आधुनिक विज्ञान में यह तकनीक चौथी औद्योगिक क्रांति (4IR) के जैविक आयाम का नेतृत्व कर रही है।
चिकित्सा और कृषि में अनुप्रयोग
चिकित्सा क्षेत्र में (SDG 3: उत्तम स्वास्थ्य)
आनुवंशिक रोगों का स्थायी उपचार: क्रिस्पर के माध्यम से सिकल सेल एनीमिया, थैलेसीमिया और सिस्टिक फाइब्रोसिस जैसी वंशानुगत बीमारियों का उपचार संभव है। (हाल ही में यूके और अमेरिका द्वारा सिकल सेल के लिए Casgevy थेरेपी को मंजूरी दी गई है)।
कैंसर अनुसंधान और थेरेपी: CAR-T सेल थेरेपी में टी-कोशिकाओं (T-cells) को आनुवंशिक रूप से संशोधित कर ट्यूमर कोशिकाओं की पहचान करने और उन्हें नष्ट करने के लिए अधिक सक्षम बनाया जा रहा है।
संक्रामक रोगों पर नियंत्रण: एचआईवी (HIV) और हेपेटाइटिस बी जैसे जटिल वायरल संक्रमणों के वायरस-डीएनए को नष्ट करने में इसके सकारात्मक परिणाम देखे गए हैं।
लक्षित औषधि वितरण (Personalized Medicine): व्यक्ति के व्यक्तिगत जीनोम के आधार पर सटीक और लक्षित दवाएं विकसित करने में सहायक।
कृषि क्षेत्र में (SDG 2: शून्य भुखमरी)
जलवायु-अनुकूल फसलें: ग्लोबल वार्मिंग के परिप्रेक्ष्य में सूखा, लवणता और अत्यधिक तापमान सहने में सक्षम (Climate-resilient) फसलों का विकास।
जैव-सुदृढ़ीकरण (Bio-fortification): फसलों के पोषण मूल्य में वृद्धि करना, जैसे विटामिन या प्रोटीन से भरपूर बीजों का निर्माण, जो छिपी हुई भूख (Hidden Hunger) को समाप्त कर सके।
कीट और रोग प्रतिरोधक क्षमता: ऐसी फसलों का विकास जिन्हें कीटनाशकों या उर्वरकों की कम आवश्यकता हो, जिससे जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग (ZBNF) और पर्यावरणीय स्थिरता को बल मिले।
खाद्य सुरक्षा और उच्च उपज: पौधों की प्रकाश संश्लेषण क्षमता को बढ़ाकर उपज दर में गुणात्मक वृद्धि करना।
क्रिस्पर तकनीक से जुड़े प्रमुख नैतिक और सुरक्षा मुद्दे
'डिज़ाइनर बेबी' और यूजेनिक्स (Eugenics): बुद्धि, रंग या शारीरिक बनावट के आधार पर आनुवंशिक बदलाव करने से 'डिज़ाइनर बेबी' की अवधारणा जन्म लेती है। चीन के हे जियानकुई (He Jiankui) का विवादास्पद प्रयोग मानव गरिमा और प्राकृतिक विकास के नियमों का स्पष्ट उल्लंघन था।
ऑफ़-टारगेट म्यूटेशन (Off-Target Effects): यदि 'कैंची' गलत डीएनए अनुक्रम को काट देती है, तो इसके परिणामस्वरूप अनपेक्षित उत्परिवर्तन हो सकता है, जिससे नई और अज्ञात बीमारियां उत्पन्न होने का खतरा है।
जर्मलाइन संपादन (Germline Editing): दैहिक (Somatic) कोशिकाओं के विपरीत, जर्मलाइन (शुक्राणु/अंडाणु) में किए गए बदलाव आने वाली पीढ़ियों में स्थानांतरित होते हैं। इसके दीर्घकालिक पारिस्थितिक और जैविक परिणाम अभी भी अज्ञात हैं।
जेनेटिक डिवाइड (सामाजिक-आर्थिक विषमता): यह तकनीक अत्यंत महंगी है। पेटेंट और वाणिज्यिकरण के कारण इसका लाभ केवल धनाढ्य वर्ग तक सीमित रह सकता है, जिससे समाज में एक नया 'जैविक विभाजन' (Biological Haves and Have-nots) पैदा होगा।
जैव-हथियार (Bioweapons): तकनीक के दुरुपयोग से सुपर-रोगजनकों (Super-pathogens) का निर्माण किया जा सकता है, जो राष्ट्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा है।
आगे की राह (Way Forward)
तकनीकी प्रगति और नैतिक सीमाओं के मध्य एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना समय की मांग है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा जारी 'मानव जीनोम संपादन के लिए वैश्विक सुशासन फ्रेमवर्क' को सभी राष्ट्रों द्वारा अपनाया जाना चाहिए। भारत में जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाने की आवश्यकता है।
विज्ञान का मूल उद्देश्य 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' (सभी सुखी हों) होना चाहिए। अतः क्रिस्पर तकनीक का उपयोग एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय नियामक ढांचे के अधीन, पारदर्शी और समावेशी तरीके से किया जाना चाहिए, ताकि यह मानवता के लिए भस्मासुर के बजाय एक वरदान सिद्ध हो सके।