साइबर आतंकवाद (Cyber Terrorism) और क्रिटिकल इंफॉर्मेशन इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा पर एक निबंध लिखें।

 Q. साइबर आतंकवाद (Cyber Terrorism) और क्रिटिकल इंफॉर्मेशन इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा पर एक निबंध लिखें।

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वर्तमान डिजिटल युग में युद्ध और संघर्ष का स्वरूप भौगोलिक सीमाओं (थल, जल, वायु और अंतरिक्ष) से परे जाकर पांचवें आयाम—'साइबर स्पेस' तक विस्तृत हो गया है। विश्व आर्थिक मंच (WEF) की ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट लगातार साइबर हमलों और साइबर आतंकवाद को वैश्विक सुरक्षा के लिए शीर्ष खतरों में से एक मानती है।

साइबर आतंकवाद का तात्पर्य राजनीतिक, वैचारिक या धार्मिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कंप्यूटर नेटवर्क, प्रणालियों और सूचना अवसंरचना पर जानबूझकर किए गए विध्वंसकारी हमलों से है, जिनका उद्देश्य सरकार या आम जनता में भय पैदा करना है। वहीं, क्रिटिकल इंफॉर्मेशन इंफ्रास्ट्रक्चर (CII) से तात्पर्य उन प्रणालियों से है, जिनके नष्ट या अक्षम होने से राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा पर गंभीर और विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है (जैसे—पावर ग्रिड, बैंकिंग प्रणाली, और रक्षा नेटवर्क)।

साइबर आतंकवाद: बहुआयामी प्रभाव (PESTLE विश्लेषण)

साइबर आतंकवाद पारंपरिक युद्ध की तुलना में एक 'असममित युद्ध' (Asymmetric Warfare) है, जिसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ता है:

  • राजनीतिक (Political): राज्य-प्रायोजित हैकर्स (State-sponsored actors) द्वारा चुनाव प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप, राष्ट्रीय संप्रभुता का उल्लंघन और सरकारी डेटाबेस की चोरी कूटनीतिक दबाव का माध्यम बनती है।

  • आर्थिक (Economic): वित्तीय संस्थानों पर रैनसमवेयर और मैलवेयर हमलों से भारी आर्थिक क्षति होती है। बैंकिंग सर्वर ठप होने से संपूर्ण वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र पंगु हो सकता है।

  • सामाजिक (Social): महत्वपूर्ण सेवाओं (जैसे जल आपूर्ति और अस्पताल) को बाधित कर जनता में व्यापक दहशत फैलाना। AIIMS (नई दिल्ली) पर हुआ हालिया रैनसमवेयर हमला इसका ज्वलंत उदाहरण है, जिसने स्वास्थ्य सेवाओं को बाधित किया।

  • तकनीकी (Technological): बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) की चोरी और अनुसंधान डेटा का विनाश तकनीकी प्रगति को धीमा करता है।

  • कानूनी (Legal): साइबर स्पेस की सीमारहित प्रकृति के कारण अपराधियों की पहचान करना और उन पर अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) स्थापित करना एक जटिल विधिक चुनौती है।

क्रिटिकल इंफॉर्मेशन इंफ्रास्ट्रक्चर (CII) की सुरक्षा में विद्यमान चुनौतियां

  • विरासत और आधुनिक प्रणालियों का एकीकरण: कई CII (जैसे पावर ग्रिड) पुरानी तकनीक पर आधारित हैं। इन्हें आधुनिक इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) से जोड़ने पर 'शून्य-दिन भेद्यता' (Zero-day vulnerability) का खतरा बढ़ जाता है।

  • आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) पर निर्भरता: भारत हार्डवेयर और महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए आयात पर निर्भर है। शत्रु देशों से आयातित उपकरणों में 'बैकडोर' (Backdoors) होने की आशंका राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है।

  • मानव संसाधन का अभाव: डेटा सुरक्षा परिषद (DSCI) के अनुसार, भारत में कुशल साइबर सुरक्षा पेशेवरों की भारी कमी है, जो उन्नत AI-संचालित साइबर हमलों को विफल करने में एक बाधा है।

  • निजी क्षेत्र की भागीदारी: अधिकांश क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर (जैसे दूरसंचार, बैंकिंग) निजी क्षेत्र के स्वामित्व में हैं, जहां अक्सर सुरक्षा की तुलना में मुनाफे को प्राथमिकता दी जाती है।

समाधान के लिए संस्थागत और विधिक ढांचा

भारत सरकार ने CII की सुरक्षा और साइबर आतंकवाद से निपटने के लिए एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किया है:

विधिक एवं संस्थागत ढांचामुख्य कार्य और उत्तरदायित्व
सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000धारा 66F साइबर आतंकवाद को परिभाषित करती है (आजीवन कारावास का प्रावधान) और धारा 70 CII को वैधानिक सुरक्षा प्रदान करती है।
NCIIPCराष्ट्रीय महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना संरक्षण केंद्र, CII की सुरक्षा के लिए नोडल एजेंसी है। यह रक्षा, ऊर्जा, वित्त आदि क्षेत्रों की निगरानी करती है।
CERT-Inभारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल, साइबर सुरक्षा खतरों के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर की नोडल एजेंसी है।
I4Cभारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र, साइबर अपराधों से निपटने के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच समन्वय स्थापित करता है।

आगे की राह (Way Forward)

साइबर आतंकवाद से निपटने के लिए एक सक्रिय (Proactive) और भविष्योन्मुखी दृष्टिकोण की आवश्यकता है:

  • जीरो ट्रस्ट आर्किटेक्चर (Zero Trust Architecture): "कभी भरोसा न करें, हमेशा सत्यापित करें" (Never trust, always verify) के सिद्धांत पर आधारित ZTA को सभी सरकारी और निजी CII नेटवर्कों में अनिवार्य रूप से लागू किया जाना चाहिए।

  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP): द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) की सिफारिशों के अनुरूप, संकट प्रबंधन और सूचना साझा करने के लिए सरकार और निजी क्षेत्र के बीच एक 'संयुक्त साइबर कमांड' की स्थापना होनी चाहिए।

  • क्षमता निर्माण और स्वदेशीकरण: साइबर सुरक्षा में अनुसंधान एवं विकास (R&D) को बढ़ावा देना तथा महत्वपूर्ण हार्डवेयर निर्माण में आत्मनिर्भरता (जैसे PLI योजना का विस्तार) हासिल करना आवश्यक है।

  • वैश्विक सहयोग: चूंकि साइबर स्पेस की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती, इसलिए भारत को बुडापेस्ट कन्वेंशन जैसे अंतरराष्ट्रीय साइबर संधियों के सकारात्मक विकल्पों का नेतृत्व करना चाहिए और एक 'वैश्विक साइबर कानून' के निर्माण की दिशा में काम करना चाहिए।

सतत विकास लक्ष्य (SDG 9 और 16) सुरक्षित बुनियादी ढांचे और शांतिपूर्ण संस्थानों की मांग करते हैं। 'विकसित भारत @2047' (New India 2047) का स्वप्न तभी साकार हो सकता है जब हम अपनी डिजिटल संप्रभुता को अक्षुण्ण रखें। साइबर स्पेस को युद्ध के मैदान के बजाय एक 'ग्लोबल कॉमन्स' (Global Commons) के रूप में विकसित करने के लिए भारत को 'वसुधैव कुटुंबकम' के दर्शन को साइबर कूटनीति का आधार बनाना होगा।

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