पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद (Insurgency) के मूल कारण क्या हैं? इसके समाधान के लिए उठाए गए कदमों की चर्चा करें।

 Q. पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद (Insurgency) के मूल कारण क्या हैं? इसके समाधान के लिए उठाए गए कदमों की चर्चा करें।

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पूर्वोत्तर भारत, जो अपनी सीमाओं का लगभग 99% हिस्सा (5,484 किलोमीटर) म्यांमार, चीन, भूटान और बांग्लादेश के साथ साझा करता है, भारत की 'एक्ट ईस्ट नीति' (Act East Policy) का रणनीतिक प्रवेश द्वार है। सामरिक और संसाधनगत दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होने के बावजूद, यह क्षेत्र दशकों तक उग्रवाद, जातीय संघर्ष और अलगाववाद की चपेट में रहा है। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) की 7वीं रिपोर्ट में इस क्षेत्र की अशांति को 'शासन के अभाव' और 'विश्वास की कमी' (Trust Deficit) का परिणाम बताया गया था। वर्तमान में, उग्रवाद में भारी गिरावट आई है, किंतु इसके मूल कारणों और समाधानों का सूक्ष्म विश्लेषण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपरिहार्य है।

पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद के मूल कारण (P.E.S.T.L.E. विश्लेषण)

1. ऐतिहासिक एवं भौगोलिक अलगाव

  • भौगोलिक बाधाएं: मुख्य भूमि भारत से यह क्षेत्र केवल 22 किलोमीटर संकीर्ण 'सिलीगुड़ी कॉरिडोर' (चिकन नेक) द्वारा जुड़ा है। इस भौगोलिक अलगाव ने मनोवैज्ञानिक दूरी को जन्म दिया।

  • औपनिवेशिक नीतियां: ब्रिटिश शासन की 'इनर लाइन परमिट' (ILP) जैसी 'बहिष्कृत क्षेत्र' नीतियों ने पूर्वोत्तर के समुदायों को शेष भारत की मुख्यधारा से अलग-थलग रखा, जिससे स्वतंत्रता के पश्चात एकीकरण में बाधा उत्पन्न हुई।

2. सामाजिक-सांस्कृतिक और जनसांख्यिकीय संकट

  • पहचान का भय: इस क्षेत्र में 250 से अधिक जनजातीय समूह निवास करते हैं। अपनी विशिष्ट भाषा, संस्कृति और पारंपरिक भूमि अधिकारों के खोने के निरंतर भय ने उप-राष्ट्रवाद (Sub-nationalism) को प्रेरित किया।

  • अवैध प्रवासन: पड़ोसी देशों (विशेषकर बांग्लादेश) से हुए अनियंत्रित प्रवासन ने स्थानीय जनसांख्यिकी को परिवर्तित कर दिया। यह जनसांख्यिकीय दबाव असम आंदोलन (1979-1985) और तत्पश्चात विभिन्न उग्रवादी गुटों (जैसे- ULFA) के उदय का प्रमुख कारण बना।

3. आर्थिक विषमता एवं विकासात्मक शून्यता

  • अवसंरचनात्मक अभाव: औद्योगीकरण की कमी, खराब कनेक्टिविटी (सड़क, रेल, संचार) और निजी निवेश के अभाव ने इस क्षेत्र को विकास की दौड़ में पीछे छोड़ दिया।

  • संसाधनों का दोहन (Internal Colonialism): स्थानीय समुदायों में यह धारणा व्याप्त रही कि उनके प्राकृतिक संसाधनों (चाय, तेल, कोयला) का दोहन मुख्य भूमि के लाभ के लिए किया जा रहा है, जबकि उन्हें इसका उचित आर्थिक प्रतिफल नहीं मिल रहा है।

4. बाह्य एवं भू-राजनीतिक कारक

  • सरंध्र सीमाएं (Porous Borders): घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों वाली खुली सीमाओं ने उग्रवादियों को सुरक्षित पनाहगाह और प्रशिक्षण शिविर (विशेषकर म्यांमार और पूर्ववर्ती पूर्वी पाकिस्तान में) स्थापित करने में सहायता की।

  • स्वर्ण त्रिभुज (Golden Triangle) की समीपता: म्यांमार के 'स्वर्ण त्रिभुज' के निकट होने के कारण मादक पदार्थों और अवैध हथियारों की तस्करी आसान हुई, जिसने उग्रवादी समूहों को मजबूत वित्तीय आधार (Narco-Terrorism) प्रदान किया।

समाधान के लिए उठाए गए कदम एवं रणनीतिक पहलें

भारत सरकार ने उग्रवाद को समाप्त करने के लिए 'शून्य सहिष्णुता' (Zero Tolerance) और 'विकास के माध्यम से शांति' का बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया है।

1. राजनीतिक और संवैधानिक समाधान (शांति समझौते)

सरकार ने सैन्य बल के बजाय संवाद और संवैधानिक रियायतों को प्राथमिकता दी है। हाल के वर्षों में कई ऐतिहासिक त्रिपक्षीय शांति समझौते संपन्न हुए हैं:

समझौता / वर्षसंबंधित राज्यमुख्य बिंदु
बोडो शांति समझौता (2020)असमबोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र (BTR) का विस्तार और विकास पैकेज।
कार्बी आंगलोंग समझौता (2021)असम1000 से अधिक उग्रवादियों का आत्मसमर्पण, स्वायत्तता में वृद्धि।
ब्रू-रियांग समझौता (2020)त्रिपुरा-मिजोरम23 वर्षों से विस्थापित 37,000 ब्रू शरणार्थियों का स्थायी पुनर्वास।
ULFA शांति समझौता (2023)असमउल्फा (वार्ता समर्थक गुट) द्वारा हिंसा का त्याग और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में प्रवेश।

2. सुरक्षा एवं प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण

  • AFSPA की वापसी: शांति बहाली के परिणामस्वरूप, सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) अधिनियम (AFSPA), 1958 को असम, नागालैंड, मणिपुर और मेघालय के बड़े हिस्सों से चरणबद्ध तरीके से हटा लिया गया है, जो सामान्य होती स्थिति का परिचायक है।

  • सीमा प्रबंधन: व्यापक एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली (CIBMS) के तहत स्मार्ट फेंसिंग, और म्यांमार के साथ 'फ्री मूवमेंट रिजीम' (FMR) की हालिया समीक्षा की गई है।

3. आर्थिक एवं अवसंरचनात्मक विकास

  • संस्थागत समर्थन: पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय (MDoNER) और पूर्वोत्तर परिषद (NEC) के माध्यम से त्वरित बजटीय आवंटन।

  • PM-DevINE योजना: केंद्रीय बजट में घोषित 'पूर्वोत्तर के लिए प्रधानमंत्री विकास पहल' (PM-DevINE) का उद्देश्य बुनियादी ढांचे और सामाजिक विकास परियोजनाओं को शत-प्रतिशत केंद्रीय वित्तपोषण प्रदान करना है।

  • कनेक्टिविटी: बोगीबील ब्रिज, ढोला-सदिया पुल, तथा म्यांमार के रास्ते दक्षिण-पूर्व एशिया को जोड़ने वाली कलादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट परियोजना इस क्षेत्र के आर्थिक अलगाव को समाप्त कर रही हैं।

4. संवैधानिक संरक्षण

  • छठी अनुसूची (Sixth Schedule) और अनुच्छेद 371 (A से G) के तहत जनजातीय क्षेत्रों की संस्कृति, भूमि और पारंपरिक शासन प्रणालियों (Autonomous District Councils) को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान की गई है।

आगे की राह (Way Forward)

पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद में आई ऐतिहासिक कमी (वर्ष 2014 से 2023 के बीच हिंसक घटनाओं में 73% की गिरावट) एक अत्यंत सकारात्मक संकेत है। स्थायी शांति सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं:

  • समझौतों का त्वरित क्रियान्वयन: हस्ताक्षरित शांति समझौतों के तहत घोषित आर्थिक पैकेजों और राजनीतिक वादों का समयबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित करना, ताकि 'विश्वास की कमी' (Trust Deficit) को स्थायी रूप से पाटा जा सके।

  • सीमा प्रबंधन कूटनीति: SDG 16 (शांति, न्याय और सशक्त संस्थाएं) के अनुरूप, पड़ोसी देशों (विशेषकर म्यांमार में वर्तमान अस्थिरता के संदर्भ में) के साथ कूटनीतिक और खुफिया सहयोग बढ़ाना।

  • सतत विकास और रोजगार: युवाओं को उग्रवाद से दूर रखने के लिए स्टार्ट-अप इकोसिस्टम और पर्यटन (Eco-Tourism) को बढ़ावा देना।

पूर्वोत्तर क्षेत्र का समग्र एकीकरण न केवल आंतरिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह 'विकसित भारत @2047' और भारत को एक वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनाने की दिशा में पूर्वोत्तर को वास्तविक 'अष्टलक्ष्मी' के रूप में स्थापित करने का मार्ग भी प्रशस्त करेगा।

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