भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए वामपंथी उग्रवाद (Naxalism) सबसे बड़ा खतरा क्यों बना हुआ है? सरकार के प्रयासों की समीक्षा करें।

 Q. भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए वामपंथी उग्रवाद (Naxalism) सबसे बड़ा खतरा क्यों बना हुआ है? सरकार के प्रयासों की समीक्षा करें।

Ans - 

गृह मंत्रालय (MHA) की नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार, वामपंथी उग्रवाद (LWE) या नक्सलवाद का भौगोलिक प्रभाव (Red Corridor) भले ही हाल के वर्षों में सिमटा है, किंतु यह भारत के लोकतांत्रिक ढांचे, आंतरिक सुरक्षा और संवैधानिक मूल्यों के लिए एक गंभीर 'असममित खतरे' (Asymmetric Threat) के रूप में विद्यमान है। वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से उत्पन्न यह वैचारिक उग्रवाद, माओवादी विचारधारा (सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से सत्ता परिवर्तन) से प्रेरित है। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने इसे केवल कानून-व्यवस्था की समस्या न मानकर, विकास के घाटे और सामाजिक-आर्थिक वंचना का परिणाम माना है।

वामपंथी उग्रवाद आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा क्यों है?

इस खतरे की गंभीरता का आकलन एक बहुआयामी (PESTLE) दृष्टिकोण से किया जा सकता है:

1. राजनीतिक और प्रशासनिक शून्यता (Political & Administrative)

  • समानांतर सत्ता (Parallel Government): नक्सली सुदूर वन क्षेत्रों में 'जनताना सरकार' (जन-अदालतें) चलाते हैं, जो राज्य के संप्रभु प्राधिकार (Sovereign Authority) को सीधी चुनौती है।

  • शासन का निर्वात (Governance Vacuum): ये उग्रवादी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं (जैसे चुनावों का बहिष्कार) को बाधित करते हैं और पंचायत प्रतिनिधियों की हत्या कर स्थानीय स्वशासन को पंगु बना देते हैं।

2. आर्थिक विध्वंस और 'रंगदारी' अर्थव्यवस्था (Economic)

  • बुनियादी ढांचे का विनाश: स्कूलों, रेलवे पटरियों और दूरसंचार टावरों (Telecom Towers) को नष्ट करना इनकी रणनीति का हिस्सा है, ताकि क्षेत्र को विकास की मुख्यधारा से काटा जा सके।

  • लेवी (Levy) वसूली: खनन कंपनियों, ठेकेदारों और तेंदूपत्ता व्यापारियों से जबरन वसूली कर एक भूमिगत अर्थव्यवस्था चलाई जाती है, जो हथियारों की खरीद का मुख्य स्रोत है।

3. सामाजिक और भौगोलिक अलगाव (Social & Geographical)

  • 'जल, जंगल, ज़मीन' का शोषण: आदिवासी समुदायों में विस्थापन और वन अधिकारों के हनन से उत्पन्न असंतोष का लाभ उठाकर नक्सली उन्हें राज्य के विरुद्ध भड़काते हैं।

  • दुर्गम भौगोलिक क्षेत्र: दंडकारण्य (छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र का जंक्शन) जैसे घने जंगल और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां गुरिल्ला युद्ध (Guerrilla Warfare) के लिए सुरक्षित पनाहगाह प्रदान करती हैं।

4. बाह्य जुड़ाव और सामरिक रणनीति (Technological & Security)

  • उन्नत हथियारों का प्रयोग: IEDs (Improvised Explosive Devices) का व्यापक उपयोग और म्यांमार या नेपाल के सीमावर्ती उग्रवादी गुटों के साथ हथियारों की तस्करी के संभावित गठजोड़ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा हैं।

सरकार के प्रयासों की समीक्षा (समाधान और विकास)

भारत सरकार ने वामपंथी उग्रवाद से निपटने के लिए सुरक्षा और विकास का एक एकीकृत 'दोहरा दृष्टिकोण' (Twin-pronged Approach) अपनाया है:

दृष्टिकोण (Approach)प्रमुख पहलें और समीक्षा (Initiatives & Review)
सुरक्षा और सामरिक (Security)SAMADHAN (समाधान) सिद्धांत के तहत आक्रामक रणनीति अपनाई गई है। CRPF की CoBRA बटालियन, आंध्र प्रदेश की ग्रेहाउंड्स (Greyhounds) और छत्तीसगढ़ की DRG (District Reserve Guard) जैसे विशेष बलों ने शीर्ष नक्सली कमांडरों को निष्प्रभावी करने में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की है।
विकासात्मक (Developmental)सड़क आवश्यकता योजना (RRP-I) और LWE मोबाइल टॉवर प्रोजेक्ट ने कनेक्टिविटी बढ़ाई है। नीति आयोग का 'आकांक्षी जिला कार्यक्रम' (Aspirational Districts Programme) इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा संकेतकों में सुधार ला रहा है।
विधिक और अधिकार आधारित (Legal/Rights)वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 और पेसा (PESA) अधिनियम, 1996 के माध्यम से आदिवासी अधिकारों को सुरक्षित कर नक्सलियों के वैचारिक आधार को कमजोर किया गया है। इसके अतिरिक्त, आकर्षक 'आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीतियां' लागू की गई हैं।

इन प्रयासों के परिणामस्वरूप नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या में भारी गिरावट आई है। यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि विकास का लाभ केवल प्रमुख शहरी केंद्रों तक सीमित न रहे, बल्कि पटना और संपूर्ण बिहार के सभी जिलों सहित देश के अन्य वामपंथ प्रभावित सीमांत क्षेत्रों तक समान रूप से पहुँचे, जिससे उग्रवाद के पुनरुत्थान को रोका जा सके।

विद्यमान चुनौतियाँ

  • अंतर-राज्यीय समन्वय का अभाव: पुलिस राज्य सूची का विषय है, जिससे राज्यों (जैसे- छत्तीसगढ़ और ओडिशा) के बीच खुफिया जानकारी साझा करने में कई बार विलंब होता है।

  • अर्बन नक्सल नेटवर्क (Urban Naxals): शहरों में बैठे वैचारिक समर्थक जो कानूनी, वित्तीय और लॉजिस्टिक सहायता प्रदान करते हैं, उन पर अंकुश लगाना एक जटिल विधिक चुनौती है।

  • PESA और FRA का धीमा क्रियान्वयन: जमीनी स्तर पर वन अधिकारों को सौंपने में नौकरशाही की सुस्ती के कारण आदिवासियों का विश्वास पूर्णतः बहाल नहीं हो पाया है।

आगे की राह (Way Forward)

वामपंथी उग्रवाद के पूर्ण उन्मूलन के लिए द्वितीय एआरसी (2nd ARC) की अनुशंसाओं के अनुरूप राज्य पुलिस बलों की 'क्षमता निर्माण' (Capacity Building) और खुफिया तंत्र (Human Intelligence) को सुदृढ़ करना अनिवार्य है। इसके साथ ही, आदिवासी युवाओं के लिए रोजगार सृजन (जैसे- 'रोशनी' योजना) को और अधिक पारदर्शी एवं परिणामोन्मुखी बनाना होगा।

बल प्रयोग अंतिम विकल्प होना चाहिए, प्राथमिक विकल्प सदैव सुशासन (Good Governance) ही है। SDG 16 (शांति, न्याय और सशक्त संस्थाएं) के लक्ष्यों को धरातल पर उतार कर ही राज्य और नागरिकों के मध्य 'विश्वास की कमी' (Trust Deficit) को पाटा जा सकता है। एक समावेशी और उग्रवाद-मुक्त भारत का निर्माण ही 'नव भारत 2047' के विजन और 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के समग्र कल्याणकारी दर्शन को यथार्थ में परिवर्तित करेगा।

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