भारत में भूस्खलन और हिमनद झील फटने (GLOF) जैसी हिमालयी आपदाओं के प्रबंधन की विवेचना करें।

 Q. भारत में भूस्खलन और हिमनद झील फटने (GLOF) जैसी हिमालयी आपदाओं के प्रबंधन की विवेचना करें।

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हिमालयी क्षेत्र विश्व का सबसे नवीन और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील पर्वत तंत्र है। अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC) की हालिया रिपोर्टों के अनुसार, वैश्विक तापन (Global Warming) के कारण हिमालयी क्रायोस्फीयर (हिमनद) तीव्र गति से पिघल रहे हैं, जिससे हिमनद झील फटने (Glacial Lake Outburst Flood - GLOF) और भूस्खलन जैसी आपदाओं की आवृत्ति में घातांकीय वृद्धि हुई है। हाल ही में सिक्किम (ल्होनक झील GLOF), चमोली त्रासदी और जोशीमठ भू-धंसाव ने इसके भयावह स्वरूप को उजागर किया है। हिमालयी क्षेत्र में होने वाली इन आपदाओं का व्यापक प्रभाव न केवल पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित रहता है, बल्कि मैदानी नदी घाटियों—विशेष रूप से पटना और संपूर्ण बिहार के सभी जिलों—पर भी इसके अनुप्रवाह (Downstream) विनाशकारी बाढ़ और सिल्टेशन (Siltation) के रूप में दिखाई पड़ता है।

हिमालयी आपदाओं (भूस्खलन और GLOF) के प्रमुख कारण

इन आपदाओं के उद्भव के मूल में प्राकृतिक सुभेद्यता और अनियोजित मानव-जनित गतिविधियों का एक जटिल अंतर्संबंध विद्यमान है:

कारण (PESTLE परिप्रेक्ष्य)विशिष्ट कारक एवं विश्लेषण
भौगोलिक एवं पर्यावरणीयहिमालय भूकंपीय क्षेत्र IV और V में स्थित है। हिमनदों के तेजी से पिघलने से नई 'मोराइन-डैम' (Moraine-dammed) झीलों का निर्माण हो रहा है, जिनकी दीवारें कच्चे मलबे से बनी होने के कारण अत्यंत कमजोर होती हैं।
विकासात्मक एवं ढांचागतघाटियों की वहनीय क्षमता (Carrying Capacity) का वैज्ञानिक आकलन किए बिना बड़े पैमाने पर जलविद्युत परियोजनाओं (Run-of-the-river) और 'चार धाम' जैसे सड़क चौड़ीकरण प्रोजेक्ट्स के लिए पर्वतीय ढलानों का अवैज्ञानिक कटान।
प्रशासनिक एवं विधिकपर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) मानदंडों का शिथिल अनुपालन, नदी के बाढ़-मैदानों (Floodplains) में अवैध निर्माण, और जोशीमठ के संदर्भ में मिश्रा समिति (1976) जैसी रिपोर्टों की ऐतिहासिक अनदेखी।
जलवायु परिवर्तनचरम मौसमी घटनाओं (Extreme Weather Events) जैसे 'क्लाउडबर्स्ट' (बादल फटना) के कारण अल्पावधि में अत्यधिक वर्षा, जो मिट्टी को असंतृप्त कर भारी भूस्खलन को प्रेरित करती है।

आपदाओं का बहुआयामी प्रभाव

  • आर्थिक और अवसंरचनात्मक: अरबों डॉलर के बुनियादी ढांचे (पुल, बांध, राष्ट्रीय राजमार्ग) का विनाश। पर्यटन, जो हिमालयी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, का पूर्णतः ठप हो जाना।

  • सामाजिक और जनसांख्यिकीय: व्यापक जन-धन की हानि और स्थानीय समुदायों का विस्थापन, जिससे 'जलवायु शरणार्थियों' (Climate Refugees) का संकट उत्पन्न हो रहा है।

  • पारिस्थितिक अनुप्रवाह (Downstream Impact): GLOF के कारण नदियों के प्रवाह मार्ग में अचानक परिवर्तन होता है, जो निचले मैदानी राज्यों (जैसे बिहार, यूपी) की कृषि भूमि में जलभराव और भारी सिल्ट जमाव (Siltation) का कारण बनता है।

प्रबंधन और शमन की रणनीतियां (NDMA दिशा-निर्देशों के आलोक में)

आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) के लिए सेंडाई फ्रेमवर्क (Sendai Framework) के अनुरूप बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है:

तकनीकी और संरचनात्मक उपाय

  • झीलों का प्रबंधन: अतिसंवेदनशील हिमनद झीलों (जैसे दक्षिण ल्होनक) के जल स्तर को कृत्रिम रूप से कम करने के लिए साइफन (Siphoning) या पंपिंग तकनीक का उपयोग करना।

  • ढलान स्थिरीकरण: भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में 'सॉइल नेलिंग' (Soil Nailing), रिटेनिंग वॉल्स और माइक्रो-पाइलिंग (Micro-piling) जैसी उन्नत जियो-इंजीनियरिंग तकनीकों का क्रियान्वयन।

  • उपग्रह आधारित निगरानी: कार्टोसैट (Cartosat) और सिंथेटिक एपर्चर रडार (SAR) की सहायता से नई बन रही हिमनद झीलों की नियमित 3D मैपिंग एवं इन्वेंट्री तैयार करना।

गैर-संरचनात्मक और संस्थागत उपाय

  • पूर्व-चेतावनी प्रणाली (EWS): सेंसर आधारित 'ऑटोमैटिक वाटर लेवल रिकॉर्डर' और डॉपलर वेदर रडार (DWR) का एक सघन नेटवर्क स्थापित करना, जिससे आपदा पूर्व 'लास्ट-माइल कनेक्टिविटी' सुनिश्चित हो सके।

  • विनियमन और नीतिगत सुधार: पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESZ) में भारी निर्माण को सख्ती से प्रतिबंधित करना और एक 'पर्वतीय हरित भवन संहिता' (Mountain Green Building Code) लागू करना।

  • स्थानीय क्षमता निर्माण: स्थानीय समुदायों को शामिल कर 'आपदा प्रतिक्रिया बल' का गठन करना, क्योंकि आपदा के समय स्थानीय नागरिक ही प्रथम उत्तरदाता (First Responders) होते हैं।

आगे की राह (Way Forward)

हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप की पर्यावरणीय और जल सुरक्षा का मूलाधार है। विकास और पारिस्थितिकी के मध्य टकराव के बजाय, एक 'सस्टेनेबल हिमालयन डेवलपमेंट मॉडल' को अपनाना समय की मांग है।

SDG 11 (टिकाऊ शहर और समुदाय) तथा SDG 13 (जलवायु कार्रवाई) के लक्ष्यों को केंद्र में रखकर, 'प्रकृति पर विजय' के बजाय 'प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व' की नीति अपनानी होगी। यह समग्र और समावेशी दृष्टिकोण न केवल 'विकसित भारत 2047' के लिए एक जलवायु-प्रत्यास्थी (Climate-resilient) अवसंरचना सुनिश्चित करेगा, बल्कि 'वसुधैव कुटुम्बकम्' (संपूर्ण पृथ्वी एक परिवार है) के दर्शन के अनुरूप भावी पीढ़ियों के धारणीय भविष्य का मार्ग भी प्रशस्त करेगा।

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