भारत के राष्ट्रपति की विवेकाधीन शक्तियों (Discretionary Powers) का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।

 Q. भारत के राष्ट्रपति की विवेकाधीन शक्तियों (Discretionary Powers) का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।

Ans - 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 52 के अंतर्गत स्थापित राष्ट्रपति का पद ब्रिटिश राजशाही के समान मात्र एक 'स्वर्णिम शून्य' (Golden Cipher) या 'रबर स्टैंप' नहीं है। यद्यपि अनुच्छेद 74 के तहत राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद (CoM) की 'सहायता और सलाह' से कार्य करने हेतु बाध्य है (42वें और 44वें संविधान संशोधन के पश्चात), तथापि संविधान निर्माता डॉ. बी.आर. अंबेडकर के अनुसार राष्ट्रपति को शासन में एक 'मार्गदर्शक और सतर्ककर्ता' की भूमिका निभानी होती है। इसी परिप्रेक्ष्य में, राष्ट्रपति की विवेकाधीन शक्तियां (Discretionary Powers) संसदीय लोकतंत्र की स्थिरता और संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण ढाल का कार्य करती हैं।

राष्ट्रपति की विवेकाधीन शक्तियों का वर्गीकरण

संसदीय शासन प्रणाली में राष्ट्रपति के विवेकाधिकार को मुख्यतः दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

विवेकाधिकार का प्रकारविधिक/संवैधानिक आधार एवं विवरण
संवैधानिक विवेकाधिकार (Constitutional)

अनुच्छेद 111 (वीटो शक्तियां): विधेयकों को पुनर्विचार हेतु लौटाना (Suspensive Veto) या अपने पास सुरक्षित रख लेना (Pocket Veto)।


अनुच्छेद 78: प्रधानमंत्री से प्रशासनिक एवं विधायी मामलों में सूचना मांगना।

परिस्थितिजन्य विवेकाधिकार (Situational)

त्रिशंकु संसद (Hung Parliament): स्पष्ट बहुमत न होने पर प्रधानमंत्री की नियुक्ति।


अल्पमत सरकार: विश्वास मत खोने पर मंत्रिपरिषद की बर्खास्तगी तथा लोकसभा का विघटन।

शक्तियों का महत्व: 'क्यों' और 'कैसे' (सकारात्मक प्रभाव)

राष्ट्रपति के विवेकाधिकार राजनीतिक और विधिक संरचना में एक सुदृढ़ नियंत्रण एवं संतुलन (Checks and Balances) स्थापित करते हैं:

  • विधिक एवं विधायी संयम (Legal & Legislative): राष्ट्रपति का निलंबनकारी वीटो (Suspensive Veto) जल्दबाजी या राजनीतिक पूर्वाग्रह में पारित कानूनों पर पुनर्विचार का अवसर देता है। (जैसे- डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा 'लाभ के पद' (Office of Profit) विधेयक, 2006 को लौटाना)। इसी प्रकार, ज्ञानी जैल सिंह ने 1986 में भारतीय डाकघर संशोधन विधेयक पर जेबी वीटो (Pocket Veto) का प्रयोग कर प्रेस की स्वतंत्रता (नागरिक अधिकारों) की रक्षा की थी।

  • राजनीतिक स्थिरता (Political): त्रिशंकु लोकसभा की स्थिति में सही प्रधानमंत्री का चयन कर राष्ट्रपति देश को बार-बार चुनावों के आर्थिक और प्रशासनिक बोझ से बचाता है।

  • संघीय ढांचे का संरक्षण: यद्यपि अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) मंत्रिपरिषद की सलाह पर लगाया जाता है, परंतु राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने 1997 में उत्तर प्रदेश और 1998 में बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाने की कैबिनेट की सिफारिशों को पुनर्विचार हेतु लौटाकर एस.आर. बोम्मई वाद (1994) के सिद्धांतों और संघीय ढांचे (Federalism) को व्यावहारिक रूप से सुरक्षित किया।

  • प्रशासनिक पारदर्शिता (Governance): अनुच्छेद 78 के तहत सूचना का अधिकार राष्ट्रपति को सरकार के कार्यों की समीक्षा करने और वाल्टर बैजहॉट के सिद्धांत— 'सलाह देने, प्रोत्साहित करने और चेतावनी देने का अधिकार'— को चरितार्थ करने का अवसर देता है।

आलोचनात्मक मूल्यांकन: विधिक और राजनीतिक चुनौतियां

विवेकाधीन शक्तियों के प्रयोग में अस्पष्टता और राजनीतिकरण के कारण कई गंभीर चुनौतियां भी उत्पन्न होती हैं:

  • संवैधानिक मौन (Constitutional Silence) और देरी: अनुच्छेद 111 राष्ट्रपति को विधेयक पर निर्णय लेने के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं करता। इसका दुरुपयोग कर किसी भी प्रगतिशील विधेयक को अनिश्चित काल तक लंबित रखा जा सकता है, जो विधायिका के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण है।

  • बहुमत परीक्षण में मनमानी: जब किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तब प्रधानमंत्री नियुक्त करने की कोई स्पष्ट लिखित नियमावली नहीं है। हालांकि सरकारिया आयोग (Sarkaria Commission) और पूंछी आयोग (Punchhi Commission) ने चुनाव-पूर्व गठबंधन और सबसे बड़े दल को बुलाने का क्रम निर्धारित किया है, परंतु व्यवहार में अक्सर राजनीतिक पक्षपात के आरोप लगते हैं।

  • संस्थागत टकराव: कई बार राष्ट्रपति की सक्रियता निर्वाचित सरकार के जनादेश के साथ सीधे टकराव की स्थिति उत्पन्न कर देती है। शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974) वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि राष्ट्रपति की विवेकाधीन शक्तियां अपवाद स्वरूप हैं, नियम नहीं।

आगे की राह

राष्ट्रपति का पद भारतीय गणतंत्र की गरिमा, एकता और अखंडता का प्रतीक है। विवेकाधीन शक्तियों का उद्देश्य संसदीय लोकतंत्र की कमियों को दूर करना है, न कि समानांतर सत्ता का निर्माण करना।

संस्थागत सुदृढ़ीकरण और सतत विकास लक्ष्य (SDG) 16 (शांति, न्याय और सशक्त संस्थाएं) की प्राप्ति के लिए, संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग (NCRWC) की सिफारिशों के अनुरूप त्रिशंकु संसद की स्थिति में प्रधानमंत्री की नियुक्ति के लिए 'परिपार्टियों' (Conventions) को संहिताबद्ध (Codify) किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, वीटो शक्ति के प्रयोग के लिए एक तार्किक समय-सीमा पर विमर्श आवश्यक है। 'नया भारत 2047' के विजन को साकार करने हेतु यह अनिवार्य है कि राष्ट्रपति दलगत राजनीति से ऊपर उठकर एक निष्पक्ष 'संवैधानिक मध्यस्थ' (Constitutional Umpire) के रूप में कार्य करे, जिससे लोकतंत्र की जड़ें और अधिक गहरी हो सकें।

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