खाद्य प्रसंस्करण उद्योग (Food Processing Industry) किसानों की आय दोगुनी करने में कैसे मदद कर सकता है?

 Q. खाद्य प्रसंस्करण उद्योग (Food Processing Industry) किसानों की आय दोगुनी करने में कैसे मदद कर सकता है?

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अशोक दलवई समिति (Ashok Dalwai Committee) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में किसानों की आय दोगुनी करने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि फसल कटाई के बाद के प्रबंधन और मूल्यवर्धन (Value Addition) पर ध्यान केंद्रित करना अनिवार्य है। भारत विश्व में खाद्यान्न, दुग्ध और बागवानी उत्पादों का अग्रणी उत्पादक है, परंतु वर्तमान में हमारे कुल कृषि उत्पादन का केवल 10% ही प्रसंस्कृत (Processed) हो पाता है, जबकि विकसित देशों में यह आंकड़ा 80% तक है। इस परिप्रेक्ष्य में, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग (Food Processing Industry - FPI) एक 'सनराइज सेक्टर' (Sunrise Sector) के रूप में उभरता है, जो कृषि और उद्योग के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी स्थापित करता है।

किसानों की आय दोगुनी करने में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग (FPI) की भूमिका

FPI कृषि क्षेत्र के संरचनात्मक परिवर्तन में उत्प्रेरक का कार्य कर सकता है। इसके बहुआयामी प्रभावों को निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत समझा जा सकता है:

1. आर्थिक सशक्तिकरण और आय वृद्धि (Economic Impact)

  • फसल कटाई के बाद के नुकसान (Post-Harvest Losses) में कमी: ICAR के एक अनुमान के अनुसार, अपर्याप्त भंडारण और प्रसंस्करण के अभाव में भारत में प्रतिवर्ष लगभग 92,000 करोड़ रुपये की कृषि उपज नष्ट हो जाती है। FPI के विकास से इस अपव्यय को रोककर सीधे किसानों की शुद्ध आय में वृद्धि की जा सकती है।

  • मूल्यवर्धन (Value Addition): कच्चे कृषि उत्पादों (जैसे- टमाटर) को प्रसंस्कृत उत्पादों (जैसे- केचप या प्यूरी) में बदलने से उत्पाद का बाजार मूल्य कई गुना बढ़ जाता है, जिसका लाभांश किसानों तक पहुँचता है।

  • मूल्य अस्थिरता (Price Volatility) से बचाव: बंपर पैदावार के दौरान बाजार में कीमतों के क्रैश होने (Distress Sale) की समस्या आम है। FPI अतिरिक्त उपज को अवशोषित कर बाजार में मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करता है।

2. सामाजिक और रोजगार सृजन (Social Impact)

  • ग्रामीण रोजगार: यह उद्योग अत्यधिक श्रम-गहन (Labor-intensive) है। गाँव के स्तर पर प्राथमिक प्रसंस्करण इकाइयाँ स्थापित होने से गैर-कृषि रोजगार के अवसर उत्पन्न होते हैं, जिससे कृषि पर जनसांख्यिकीय दबाव कम होता है और अतिरिक्त पारिवारिक आय सृजित होती है।

3. कृषि विविधीकरण (Agricultural Diversification)

  • पारंपरिक अनाज (गेहूँ-धान) चक्र से हटकर उच्च-मूल्य वाली फसलों (High-Value Crops) जैसे—बागवानी, डेयरी, पोल्ट्री, और मत्स्य पालन की ओर फसल विविधीकरण को प्रोत्साहन मिलता है, क्योंकि प्रसंस्करण उद्योग इन उत्पादों के लिए एक सुनिश्चित बाजार (Assured Market) प्रदान करता है।

4. तकनीकी और अवसंरचनात्मक एकीकरण (Technological Impact)

  • अनुबंध कृषि (Contract Farming): प्रसंस्करण कंपनियाँ किसानों के साथ अग्रिम अनुबंध करती हैं, जिससे किसानों को आधुनिक तकनीक, उच्च गुणवत्ता वाले बीज और सर्वोत्तम कृषि पद्धतियों तक पहुंच प्राप्त होती है।

क्षेत्र के समक्ष विद्यमान प्रमुख चुनौतियाँ (Challenges)

किसानों तक FPI का पूर्ण लाभ पहुँचाने में कई ढांचागत और नीतिगत बाधाएं मौजूद हैं:

  • आपूर्ति श्रृंखला की बाधाएं (Supply Chain Bottlenecks): कोल्ड स्टोरेज, रेफ्रिजरेटेड वैन और मेगा फूड पार्कों से खेतों तक निर्बाध कनेक्टिविटी (Farm-to-gate infrastructure) का अभाव।

  • ऋण तक पहुंच (Credit Accessibility): इस क्षेत्र में असंगठित सूक्ष्म और लघु उद्यमों (MSMEs) का वर्चस्व है, जिन्हें संस्थागत ऋण प्राप्त करने में कठिनाई होती है।

  • नियामक जटिलताएं: यद्यपि FSSAI ने मानकों को सुव्यवस्थित किया है, फिर भी राज्य-स्तर पर APMC कानूनों और भूमि अधिग्रहण से जुड़ी विसंगतियां निजी निवेश को हतोत्साहित करती हैं।

सरकार की प्रमुख सुधारात्मक पहलें

कृषि और उद्योग के बेहतर एकीकरण के लिए सरकार द्वारा कई रणनीतिक कदम उठाए गए हैं:

योजना / पहलमुख्य उद्देश्य और प्रभाव
PM किसान संपदा योजना (PMKSY)मेगा फूड पार्क, कोल्ड चेन, और क्लस्टर विकास के माध्यम से खेत से लेकर खुदरा बाजार तक आधुनिक बुनियादी ढाँचे का निर्माण।
PM FME योजना (आत्मनिर्भर भारत)'एक जिला एक उत्पाद' (ODOP) के दृष्टिकोण के साथ सूक्ष्म खाद्य उद्यमों का उन्नयन और औपचारिकीकरण।
PLI योजना (खाद्य प्रसंस्करण)वैश्विक खाद्य निर्माण चैंपियन बनाने और भारतीय ब्रांडों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन।
किसान रेल और कृषि उड़ानखराब होने वाले उत्पादों (Perishables) के त्वरित परिवहन के लिए राष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला का निर्माण।

आगे की राह (Way Forward)

किसानों की आय वृद्धि के लक्ष्य को साकार करने के लिए FPI क्षेत्र में बैकवर्ड और फॉरवर्ड लिंकेज (Backward and Forward Linkages) को सुदृढ़ करना अनिवार्य है:

  • FPOs (किसान उत्पादक संगठनों) का सुदृढ़ीकरण: किसानों को केवल कच्चे माल के आपूर्तिकर्ता तक सीमित रखने के बजाय, FPOs के माध्यम से उन्हें आपूर्ति श्रृंखला में सह-मालिक (Co-owners) बनाया जाना चाहिए, ताकि मूल्यवर्धन का सीधा लाभ उन्हें मिल सके।

  • हब एंड स्पोक मॉडल (Hub and Spoke Model): ग्राम पंचायत स्तर पर प्राथमिक प्रसंस्करण केंद्र (Spokes) और जिला स्तर पर उन्नत प्रसंस्करण इकाइयां (Hub) स्थापित की जानी चाहिए।

  • अनुसंधान एवं विकास (R&D): जलवायु-अनुकूल पैकेजिंग, खाद्य संरक्षण की स्वदेशी तकनीकों और ब्लॉकचेन आधारित ट्रेसेबिलिटी (Traceability) पर निवेश बढ़ाना चाहिए।

मजबूत खाद्य प्रसंस्करण उद्योग न केवल कृषि को एक लाभदायक उद्यम में परिवर्तित कर सकता है, बल्कि यह सतत विकास लक्ष्यों (SDG 1: गरीबी उन्मूलन, SDG 2: शून्य भुखमरी, और SDG 12: जिम्मेदारीपूर्ण उपभोग और उत्पादन) की प्राप्ति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। ग्रामीण अर्थव्यवस्था का यह औद्योगीकरण 'न्यू इंडिया 2047' और 'आत्मनिर्भर भारत' के दृष्टिकोण की आधारशिला सिद्ध होगा।

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